लघुकथा
दिल के किसी कोने में
डॉ रीटा अरोड़ा
“तुम्हें पता है, तुम बहुत ज़िद्दी हो!” राधा ने नाराज़ होकर कहा।
“और तुम बहुत जल्दी रूठ जाती हो,” मोहन ने जवाब दिया।
“हर बार मैं ही क्यों समझूँ? कभी तुम भी तो मेरी खामोशी समझने की कोशिश करो।”
मोहन चुपचाप अख़बार उठाकर दूसरे कमरे में चला गया।
राधा खिड़की के पास बैठ गई। इतने वर्षों के साथ के बाद भी क्या वह उसकी भावनाएँ नहीं समझ पाया था? कितनी बार उसने अपनी तकलीफ़ बताई, मगर हर बार बात अधूरी रह गई।
रात को मोहन ने चाय का कप उसके पास रखते हुए पूछा, “अभी भी नाराज़ हो?”
“तुम्हें क्या फ़र्क पड़ता है?” राधा ने बिना उसकी ओर देखे कहा।
“फ़र्क पड़ता है, तभी तो पूछ रहा हूँ।”
“फ़र्क पड़ता है तो समझते क्यों नहीं?”
मोहन कुछ पल उसे देखता रहा, फिर बोला, “हर बात का जवाब देना ज़रूरी है क्या?”
राधा ने उसकी ओर देखा। आँखों में शिकायत थी, मगर कहीं एक उम्मीद भी बाकी थी।
“जवाब नहीं, मोहन… कभी-कभी बस इतना चाहिए कि तुम मेरी बात समझने की कोशिश करो।”
मोहन ने कुछ कहना चाहा, लेकिन तभी उसका फ़ोन बज उठा। वह उठकर दूसरे कमरे में चला गया।
राधा की नज़र मेज़ पर रखी चाय पर टिक गई। कप से भाप उठनी बंद हो चुकी थी। उसने चाय का एक घूँट लिया और खिड़की के बाहर देखने लगी।
कुछ देर बाद मोहन वापस आया। उसने देखा, राधा अब भी वहीं बैठी थी।
“राधा, कल मंदिर चलोगी?” उसने सहजता से पूछा।
राधा ने उसकी ओर देखा, जैसे कुछ कहना चाहती हो। फिर उसकी नज़र सामने रखे चाय के खाली कप पर चली गई।
“पता नहीं, मोहन…” उसने धीमे से कहा।
मोहन कुछ पल वहीं खड़ा रहा। फिर उसने कुर्सी खींची और उसके सामने बैठ गया।
“राधा, एक बात पूछूँ?”
वह चुप रही।
“तुम मुझसे इतनी दूर क्यों होती जा रही हो, जबकि हम एक ही घर में रहते हैं?”
राधा ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा। होंठ हिले, लेकिन शब्द बाहर नहीं आए।
बाहर हवा से पर्दा धीरे-धीरे हिल रहा था। कमरे में दोनों आमने-सामने बैठे थे-और उनके बीच जाने कितनी अनकही बातें ठहरी हुई थीं…
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