बड़ी डिग्रियां, पिछड़ी सोच
गुरमीत अंबाला
अक्सर उच्च डिग्री धारक के बारे में यह विचार हरेक के मन में रहता है कि उस का मानसिक स्तर भी उच्च स्तर का होगा,उसका दृष्टिकोण परिवार,समाज ,देश में व्याप्त समस्याओं के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला होगा,परंतु व्यवहारिक स्तर पर ज्यादातर पढ़े लिखे लोग इस कसौटी पर खरे उतरते नहीं दिखते।
हम समाज में आस पास नजर डालें तो पता चलता है कि समाज की समस्याओं के प्रति ही नहीं, व्यक्तिगत जीवन में भी ज्यादातर लोग जीवन की समस्याओं के प्रति भी वैज्ञानिक/मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं रखते । वे अपनी समस्याओं के हल के लिए अलौकिक / दिव्य शक्तियों द्वारा हल किए जाने की सोच रखते हैं साथ ही विभिन्न कर्मकांडों, रूढ़ियों, अंधविश्वास में फंस कर अपना शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण कराते चले जाते हैं ।
अभी हाल में पंजाब के कुछ विश्वविद्यालयों में जहां उच्च डिग्रियां प्राप्त करने के लिए किशोर,युवा जाते हैं ने अन्य राजनीतिक,आर्थिक कारणों के साथ ही अंधविश्वास पूर्ण अफवाहों से ग्रस्त होकर बड़े बवाल कर दिए। जिसमें बहुत से बाहरी लुटेरों ने तोड़ फोड़ के साथ ही लुट का ऐसा मंजर किया कि हर संवेदनशील व्यक्ति का दिल दुख गया।
यह स्पष्ट दिखाई दिया कि हमारी शिक्षा प्रणाली युवाओं में वैज्ञानिक सोच (Scientific Temper) पैदा करने में बुरी तरह नाकाम रही है।
इन नामचीन प्राइवेट यूनिवर्सिटीज के विद्यार्थियों में जिस तरह ‘आत्माएं दिखने’, ‘डर के कारण हार्ट अटैक आने’ या भूत-प्रेतों के कारण आत्महत्याएं होने जैसी बेबुनियाद अफवाहें फैलीं, उसने वैज्ञानिक सोच रखने वालों को झकझोर कर रख दिया है। लाखों रुपये खर्च करके विज्ञान, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की डिग्रियां लेने वाली पीढ़ी जब ऐसे अंधविश्वासों का शिकार हो जाए, तो सवाल सिर्फ विद्यार्थियों पर नहीं बल्कि उनकी नींव बनाने वाले स्कूलों,कॉलेजों, यूनिवर्सिटीज और अध्यापकों पर भी खड़ा होता है।
इन प्राइवेट स्कूलों,कॉलेजों, यूनिवर्सिटीज द्वारा तैयार की गई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा वैज्ञानिक चेतना से लैश होकर निकलने के बजाय अंधविश्वासी बनकर निकल रहा है, क्योंकि निजी संस्थान पूंजीवादी व्यवस्था के चलते स्कूलों/कालेजो का एक मात्र उद्देश्य केवल ज्यादा पैसे कमाना रह गया है। कितने ऐसे निजी संस्थान हैं जो विद्यार्थियों में वैज्ञानिक चेतना पैदा करने के लिए सेमिनार/वर्कशॉप के आयोजन करते हैं?
इन संस्थाओं में विद्यार्थियों से मोटी फीस ली जाती है वहीं अध्यापकों और अन्य स्टाफ को कम वेतन दिए जाने के आरोप लगते हैं। मुनाफा कमाने की अंधी दौड़ में सामाजिक दायित्व की भावना नगण्य हो गई है ।केवल शिक्षा के नाम पर डिग्रियां बेचना ही उद्देश्य रह गया है।
1947 से पूर्व बहुत से धार्मिक ,सामाजिक आंदोलनों के दौर में स्कूलों और कॉलेजों को सामाजिक आंदोलनों से उपजे नेताओं ने शिक्षा के महत्व को समझते हुए शिक्षा के संस्थान बनाए थे ,भले ही इन में से ज्यादातर संस्थान धार्मिक आंदोलनों से बने थे, लेकिन इनमें सामाजिक सरोकार बहुत महत्व रखते थे । डी.ए.वी. संस्थान,खालसा संस्थान ,सनातन संस्थान के नामों से उभरे शिक्षण संस्थाओं में व्यक्तित्व निर्माण, देश- समाज के प्रति प्यार भी सिखाया जाता था।
समाज को संवेदनशील,सामाजिक सरोकारों से निर्मित करना भी एक उद्देश्य था,लेकिन जब से पूंजीपति वर्ग ने शिक्षा को व्यापार के रूप में स्थापित किया, सामाजिक उद्देश्य, संवेदनशीलता, व्यक्तित्व निर्माण न होकर बस डिग्री धारी बना कर प्रोफेशनल बनाने पर जोर दिया जाने लग गया। परिणाम हमारे सामने है मोटी फीस देकर बस किसी तरह डिग्री मिल जाए और फिर प्रोफेशनल बन कर पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा थोपी उपभोक्ता वादी संस्कृति में रचा बसा जाए अब बदलते तकनीकी विकास में जितने युवा डिग्री लेकर बाहर आते हैं उतनी मांग ही नहीं बची। सिर फोड़ प्रतियोगिता में हताशा,जीवन से मोह भंग और या नशे की बढ़ती प्रवृति ने इस व्यवस्था की मुनाफाखोरी का नंगापन हम आज देखने को अभिशप्त हैं।
वैज्ञानिक चेतना के प्रचार प्रसार में लगी संस्थाओं का यह कड़वा अनुभव रहा है कि निजी शिक्षण संस्थान वैज्ञानिक चेतना के लिए एक प्रतिशत भी कार्य नहीं करते।राजकीय शिक्षण संस्थान फिर भी संवैधानिक कर्तव्य के प्रति कुछ सजग हैं।निजी शिक्षण संस्थान कभी भी वैज्ञानिक विचारों वाले लोगों को बुलाने का प्रयास नहीं करते।
इसके साथ ही बहुत बड़ी संख्या में वहमों-भ्रमों में जकड़े अध्यापक और अभिभावक जब स्वयं ही अंधविश्वासों से ग्रस्त हैं तो वे इस दिशा में क्या सोच पाएंगे? ज्यादातर अध्यापक और अभिभावक अपनी समस्याओं के हल के लिए कथित अलौकिक शक्तियों के दावेदारों के दरवाजे पर नाक रगड़ते रहते हैं।
स्कूल मैनेजमेंट ,अध्यापक यहां तक कि विज्ञान अध्यापक भी हाथ नगों वाली अंगूठियों,बाजू में बंधे कथित अभिमंत्रित धागों और गले ताबीजों से भरे दिख जाते हैं। जब विज्ञान पढ़ाने वाले खुद ही अंधविश्वास का शिकार होंगे, तो वे विद्यार्थियों को तर्कशील कैसे बना सकते हैं? साथ ही कोचिंग के अड्डे और भी गिरावट का शिकार हैं जिनमें मूलभूत सुविधाओं का अभाव है,इसके साथ ही ब्रेन पीडिया जैसे अंधविश्वास परोस कर अच्छे खासे पढ़े लिखे लोगों को मूर्ख बना कर लूटा जा रहा है।
किसी विद्यार्थी की त्रासदी या आत्महत्या के पीछे असल कारण मानसिक तनाव, पढ़ाई का दबाव, डिप्रेशन या अन्य व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं। लेकिन वैज्ञानिक सोच से वंचित समाज इन मनोवैज्ञानिक कारणों को समझने के बजाय मामले को ‘आत्माओं’ और ‘डर’ से जोड़कर अफवाहों का बवंडर खड़ा कर लेती है।
सभी शिक्षण संस्थानों को व्यापारिक दृष्टिकोण से बाहर निकल कर समाज हित में भी सोचना चाहिए वरना उनकी स्वयं की कमाई उनकी आने वाली पीढ़ियों द्वारा वहमों-भ्रमों , अंधविश्वास,ढोंग में बर्बाद हो जाएगी एक दिन पूंजी के ढेर तले दबे, वैज्ञानिक सोच से दूर उनके स्वयं के घर परिवार भी होंगे, क्योंकि शिक्षण संस्थानों के बाहर भी समाज में बाबागिरी कर के शोषण करने वाला एक बड़ा वर्ग बैठा है।
एक व्यापक जरूरत है कि सभी चिंतनशील लोग इस दिशा में सोचते हुए समाज को नई दिशा दें।
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