जसवीर त्यागी की एकाकी जीवन केंद्रित कविताएँ
दरवाज़े पर दस्तक
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जिंदगी की बुढ़ापे भरी साँझ में
जब सन्नाटे और सूनेपन का साँप
पसरा होता है परिवेश में
तब अचानक लगता है
दरवाजे पर दस्तक हो रही है
एक बूढ़ी महिला
आँखों के चश्मे को संभालती
छड़ी के सहारे
धीरे-धीरे सरकती है
दरवाजे की ओर
आस और उत्सुकता के हाथों से
खोलती है दरवाजा
और पुकारती है—‘कौन’..?
कौन——-कौन….????
घूमता-गूँजता रहता है
हवा में देर तक
हर बार की तरह
कहीं कोई नहीं होता
द्वंद्व के दलदल में फंसी वृद्धा
बूढ़ी निगाहों से देखती है
द्वार पर खड़ा
किसी अड़ियल घोड़े-सा इंतजार
जो वृद्धा के बार-बार कहने पर भी
न देहरी से बाहर जाता है
और न ही
देहरी के अंदर करता है प्रवेश
कशमकश और असमंजस में
घिरी बुजुर्ग स्त्री
न द्वार खोल पाती है
और न ही कर पाती है बंद।
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तरक्की
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तरक्की के विमान में बैठकर
बच्चे विहंसते हुए विदेश चले गये
हँसता खिलखिलाता हुआ घर
अकेला उदास मकान रह गया
परिवार के नाम पर
दो बूढ़े-बुढ़िया ही
एक-दूसरे का सूना चेहरा निहारते थे
नम-निगाहों से
रह-रहकर शरीर और आत्मा में
चुभती थी समय की नुकीली सुई
लौट-लौटकर पछाड़ मारता था स्मृतियों का समंदर
अकेलेपन का अजगर जकड़ने को
लपलपाता था जीभ
कृश काया से उलझ-उलझ जाता था
उम्र की ऊन का गोला
फिर एक दिन
पत्नी भी जा बसी दूर किसी अंतरिक्ष में
अकेले बूढ़े आदमी के पास
सम्पत्ति के नाम पर
स्मृतियों की एक एल्बम शेष थी
जिसमें उसके बच्चों
और पत्नी की तस्वीरें
चस्पा थीं चारों ओर।
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स्नेह का समंदर
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सुबह-सुबह
पार्क में दो वृद्ध महिलाएँ मिलीं
परस्पर गले लगीं
हाल-चाल पूछा
फिर एक-दूसरे के बच्चों के बारे में बात की
दोनों ने बताया
अपने-अपने परिवारों के साथ
परदेश में खुशहाल हैं बच्चे
कुछ घड़ी वे
एक-दूसरे का हाथ थामे मौन रहीं
फिर बोली-
हर रोज वीडियो कॉल पर
बच्चों से बात हो जाती है
इतना क्या कम है?
दोनों महिलाओं के सामने
स्नेह का समंदर था
जिसमें अपार जल ही जल था चहुँ ओर
जल जिसे देख तो सकते थे
लेकिन!प्यास लगने पर पी नहीं सकते थे।
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कोई तो है
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एक घर में
दो बुज़ुर्ग दंपती रहते हैं
उनका मन करता है
कभी-कभी
कोई उनसे मिलने आये
इंसानों के पास समय नहीं है
वे मशीनों में तब्दील हो रहे हैं
बुजुर्ग दंपती
आँखों के सूखते जल में
बचाकर रखते हैं
आस और नेह की थोड़ी-सी नमी
इंसान के पास
दूसरे इंसान से मिलने का समय न हो
लेकिन!धूप,हवा,बारिश,परिंदे
कुछ बिल्लियाँ और कुत्ते
बुजुर्ग दंपती से मिलने अक्सर आते हैं।
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रिश्ता
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पार्क आते-जाते
रास्ते में एक घर पड़ता है
यदा-कदा जिसमें पीठ झुका
एक बुजुर्ग आदमी दिखता है
कभी अख़बार पढ़ता
पौधों को पानी देता
और कभी कुत्तों को
रोटी खिलाता
कई बार मैंने उसे
रेहड़ी सब्जी वालों के संग
आत्मीयता से बतियाते हुए भी देखा है
बस,इतना परिचय है मेरा उससे
संभव है,वह मुझे जानता भी न हो
फिर भी उसका होना
मुझे आर्द्रता और आत्मीयता से भर देता है
बहुत दिनों से
उसे देखा नहीं
पार्क आते-जाते
मेरी आँखें ढूँढती हैं उसे
जैसे अपने घर की
खोयी चाबी खोजता हो कोई।
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एक अवस्था
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अनुभवी बुजुर्ग बताते हैं
चालीस से ऊपर की उम्र
जवानी का बुढ़ापा
और बुढ़ापे की जवानी है
इस तरह
हर किसी के जीवन में
एक अवस्था ऐसी आती है
जब वह
जवानी और बुढ़ापा
दोनों साथ जीता है।
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आवाज
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नव ब्याहता बेटा-बहू के साथ रहते हैं
वृद्ध माता-पिता
बुजुर्ग पिता अक्सर नींद में उच्चारते हैं-
हे राम,हे राम
बीच-बीच में
कभी बत्ती जलाते-बुझाते हैं
कभी बेंत ढूँढते हैं
कभी अपनी दवा-गोली
सिरहाने जल भरा लोटा रखते हैं
रात में कई बार
पेशाब की शिकायत होती हैं उन्हें
पिता जब भी जगते हैं रात को
आहट और आवाज भी जगती हैं
उनके साथ-साथ
पिता की आवाज सुनकर
आश्वस्ति की चादर ओढ़े लेटी रहती हैं माँ
जबकि उसी आवाज को सुनकर
बेटा बहू करवट बदलते हैं बार-बार
और नींद में बड़बड़ाते हैं
एक दूसरे से कुछ कहते हुए ।
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पेंशन
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पीठ झुका बूढ़ा आदमी
सप्ताह में दो बार
बैंक जाकर पेंशन का पता करता है
काउंटर पर बैठा आदमी बड़बड़ाता है-
अरे!बाबा बुढ़ापे में भी तुम्हें चैन नहीं
बूढ़ा आदमी नम निगाहों से
कैशियर को देखता है एकटक
और मौन की मोटर में बैठकर
खाली हाथ घर लौटता है।
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वजन
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सड़क किनारे पटरी पर
एक बूढ़ा आदमी
वजन तौलने की मशीन लिए बैठता है
उसकी आँखों पर
मोटा पुराना-सा चश्मा है
कपड़े भी लगभग वही
एक जैसा कुरता-पाजामा
चप्पलें एड़ी की जगह से घिस चुकी हैं
संभव है उस जगह पर
कभी-कभी कुछ नुकीला चुभता भी हो
जब कभी देखता हूँ
बूढ़े-बुज़ुर्ग को उदास ही पाता हूँ
मुस्कुराते हुए उसे मैंने कभी नहीं देखा
दूसरों से बतियाते हुए तो बहुत कम
अक्सर चुप्पी की चारदीवारी में कैद पाया है उसे
बूढ़े आदमी की जिंदगी
दूसरों के वजन पर आश्रित है
उस निर्बल का
अपना कोई वजन नहीं है।
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अकेला बूढ़ा आदमी
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अकेला बूढ़ा आदमी
चूल्हे की आँच पर
बना रहा है रोटी
बार-बार की कोशिश के बाद भी
सेंकते हुए जल जाती हैं रोटियाँ
अकेला बूढ़ा आदमी
चुप्पी की चटनी के साथ
खा रहा है जली हुई रोटियाँ
खाते हुए
एक हाथ से तोड़ता है
रोटी का टुकड़ा
दूसरे हाथ से पोंछता है
अपना गीला गाल।
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अपनों से बातचीत
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सप्ताह में दो-तीन बार आता है
विदेश से बेटे का फोन
बूढ़े माता-पिता
सप्ताह जल्दी आने की
दुआ माँगते हैं सुबह-शाम
बेटा अपना ख्याल रखने की
ढेर सारी हिदायतें देता है
माता-पिता को हर बार
माता-पिता मौन होकर
आज्ञाकारी बालकों की तरह
सुनते रहते हैं सब
कभी-कभी बहु और पोता-पोती
फोन पर करते हैं
बूढ़े-बुढ़िया को हाय-बाय
बेटे के फोन रख देने के बाद भी
एकाकी वृद्ध पति-पत्नी
काँपते हाथों में
थामे रहते हैं मोबाइल
बूढ़ी निगाहें न जाने क्या टटोलती रहती हैं?
देर तक मोबाइल में।
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दिल को छूने वाली रचनाएँ ❤️
मर्मस्पर्शी रचनायें ❤️
आ. जसवीर त्यागी जी की सभी कविताएँ भावप्रवण और हृदय को छूने वाली हैं। हार्दिक बधाई भाई त्यागी साहब को।