राजकुमार कुम्भज की तीन कविताऍं

राजकुमार कुम्भज की तीन कविताऍं

1

कोई छूट रहा है पीछे

 

भागता नहीं हूॅं शिक़ायतों से

दंड-प्रहारों से भी कभी डरता नहीं हूॅं मैं

कर्कशताओं से भी कर ही लेता हूॅं किनारा

हारता हूॅं तो असहमतियों के अस्वीकार से

जब मैं चलना चाहता हूॅं सभी के साथ

तो चाहता हूॅं ये भी कि साथ चलें सभी

और अगर कोई सकारण छूट रहा है पीछे

तो उसे भी साथ ले लूॅं अपना हाथ देकर

कुछ आगे दौड़ रहे कुछ लोगों के साथ

जीवन की सबसे बड़ी दिक़्क़त है यही

कि पीछे छूट रहे दबे-हारे लोगों को

अपने साथ लिये चलने के चक्कर में

कहीं हार नहीं जाऍं वे भी?

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2.

तटस्थता मारती है सभी को

 

हार-जीत में भिन्न होता ही क्या है

कोई दो क़दम आगे,कोई दो क़दम पीछे

बीच में फिर-फिर वही रिक्तताऍं अपार

और फिर-फिर वही अतिरिक्तताऍं विचित्र

जो नहीं मित्र,जो नहीं शत्रु वे भी वहाॅं

मिलते हैं हाज़िर-नाज़िर देखने को तमाशा

किसी भी युद्ध-उत्सर्ग में बाधक हैं वे ही

हार-जीत में भिन्न होता ही क्या है

तटस्थता मारती है सभी को.

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3

बेबस बस्तियाॅं नहीं हों राख

 

इतना उपहास भी ठीक नहीं

कि ख़ुदक़ुशी पर आमादा हो जाये वह

जो अभी-अभी छत पर उड़ाता है पतॅंग

पतॅंग का कट जाना एक खेल,एक दौर है

लज्जित करने या लज्जित होने जैसी

हर किसी चक्रव्यूह में भी होती है हद

छोड़ देते हैं एक रास्ता दफ़ा हो जाने का

अलाव उतना ही होता है बेहतर

कि सर्द-देह को कुछ चलने जैसा

और कुछ युद्ध-मैदानों में लड़ने जैसा

स्वाभिमान भरा वीरोचित्-ताप दे सके

बस,बेबस बस्तियाॅं नहीं हों राख?

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