सुरेंद्र कात्यान की कविता – मैं

मनुष्य होना एक भावना है, एक उत्तरदायित्व है, एक सतत संघर्ष है अपने भीतर की रोशनी को बचाए रखने का।

कविता

‘मैं’

सुरेंद्र कात्यान

 

मैं सो रहा हूँ
या जाग रहा हूँ
निन्द्रा में भी –
हाय मैं कितना अभागा हूँ
यहाँ तो सब मेरे –
मन का था।
फिर भी न हो सका पूरा
आज भी मैं आधा हूँ।

Comments

Your email address will not be published.

0