जसवीर त्यागी की कविताएं
फूलों का घर
प्रातःकाल की सैर पर जाते हुए
अपनी शाख से टूटा हुआ फूल
अकेला सड़क पर पड़ा हुआ मिला
सड़क पर लोग आ-जा रहे थे
किसी ने नहीं उठाया
सड़क पर गिरा उदास मासूम फूल
फूल सड़क पर पड़ा हुआ कोई पैसा नहीं
जो हर किसी की नज़र में ठहर जाए
फूल किसी सच्चे
सह्रदय की संवेदना की शाख पर ही खिलता है
मैंने फूल को उठाया
और अपनी कमीज की जेब के घर में सजा लिया
जहाँ है मेरी जेब
उसके नीचे ही धड़कता है मेरा दिल
चाहता हूँ जब तक रहूँ इस दुनिया में
फूल मेरे दिल में
अपना घर बनाकर रहें।
■
सूखा
शिक्षा की सर्वोच्च डिग्री लिए
एक बेरोजगार युवा मुझसे मिलने आया
आने से पूर्व मिलने का समय मांगा
औपचारिक दुआ-सलाम के बाद
मैंने पूछा-खाना खाओगे?
वह बोला-गुरुजी आप क्यों परेशान होते हैं?
उसका कथन मेरे सवाल का उत्तर न था
मैंने भोजन की थाली मंगवायी
भोजन करने के बाद
उसमें अपने दुःख को
कहने की कुछ हिम्मत आयी
संसार में न जाने कितने काबिल युवा हैं
जो लंबे समय से
बेरोजगारी की बीमारी से ग्रस्त हैं
बेरोजगारी महामारी की तरह
दिन-प्रति-दिन फैलती जा रही है
युवाओं के स्वप्न
झरनों की तरह सूखते जा रहे हैं
इस दुर्दांत समय में
सिर्फ़ संवेदनाओं के सरोवर ही नहीं सूख रहे हैं
इंसान की आँखों का पानी भी सूखता जा रहा है।
■
बचाव
बारिश हो रही है
एक युगल कर रहा है रास्ता पार
हाथ में छतरी पकड़े लड़का
साथ चल रही लड़की पर
छतरी को अधिक केंद्रित कर रहा है
हालाँकि लड़का खुद भीग रहा है
लड़की बीच-बीच में
उसे कुछ कहती है
लड़का उत्तर में-
मुझे कुछ नहीं होगा
मैं ठीक हूँ कहता है
लड़का खुद भीगकर
लड़की को भीगने से बचा रहा है
प्रेम और समर्पण का यह दृश्य
कविता,संगीत,चित्रकला
सभी में सजीव होना चाहता है।
