हमने बच्चों को उड़ना सिखाया, उतरना नहीं

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

समय समाज

हमने बच्चों को उड़ना सिखाया, उतरना नहीं

  •  पैसा, डिग्री और प्रतिष्ठा सफलता दे सकते हैं, लेकिन भावनात्मक परिपक्वता ही रिश्तों और समाज को मजबूत बनाती है

 

कुछ वर्ष पहले एक परिचित परिवार के बेटे का चयन देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक में हो गया। पूरे मोहल्ले में मिठाइयाँ बंटी। माता-पिता गर्व से भर उठे। हर मिलने वाला उनकी परवरिश की प्रशंसा कर रहा था।

लेकिन कुछ वर्षों बाद वही परिवार एक दूसरी समस्या से जूझ रहा था। बेटा सफल था, अच्छी नौकरी में था, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर था, लेकिन घर में संवाद लगभग समाप्त हो चुका था। छोटी-छोटी बातों पर विवाद हो जाते थे। आलोचना सुनने का धैर्य नहीं था। असहमति को वह अपमान समझता था। माता-पिता हैरान थे।

एक दिन उसके पिता ने दुखी होकर कहा, “हमने उसे पढ़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ी, लेकिन शायद जीना सिखाने में कुछ कमी रह गई।”

उनकी बात सुनकर लगा कि यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। यह आज के समाज का एक बड़ा सच बनता जा रहा है।

हम अपने बच्चों को बचपन से ही उड़ना सिखाते हैं। उन्हें अच्छे स्कूलों में भेजते हैं।

प्रतियोगिताओं में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्हें सिखाते हैं कि जीवन में सफल कैसे होना है, करियर कैसे बनाना है, पैसा कैसे कमाना है और समाज में प्रतिष्ठा कैसे प्राप्त करनी है।

लेकिन क्या हम उन्हें यह भी सिखाते हैं कि असफलता का सामना कैसे करना है?

क्या हम उन्हें यह सिखाते हैं कि किसी के दुख को कैसे समझना है?

क्या हम उन्हें यह बताते हैं कि मतभेद होने पर रिश्ते तोड़े नहीं जाते, बल्कि संवाद के माध्यम से सुलझाए जाते हैं?

यहीं सबसे बड़ी कमी दिखाई देती है।

आज शिक्षा का अर्थ लगभग पूरी तरह करियर से जोड़ दिया गया है। रिपोर्ट कार्ड में अंक बढ़ रहे हैं, डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन कई बार भावनात्मक समझ और सामाजिक संवेदनशीलता उसी अनुपात में विकसित नहीं हो पा रही।

हम बच्चों को गणित सिखाते हैं, लेकिन क्रोध को नियंत्रित करना नहीं सिखाते।

हम उन्हें विज्ञान सिखाते हैं, लेकिन सहानुभूति नहीं सिखाते।

हम उन्हें प्रतिस्पर्धा सिखाते हैं, लेकिन सहयोग का महत्व नहीं समझाते।

हम उन्हें जीतना सिखाते हैं, लेकिन हार को स्वीकार करना नहीं सिखाते।

परिणाम यह है कि जीवन की वास्तविक चुनौतियों के सामने कई बार अत्यंत शिक्षित और सफल लोग भी असहाय दिखाई देते हैं।

क्योंकि जीवन केवल उपलब्धियों का नाम नहीं है।

जीवन रिश्तों का भी नाम है।

जीवन संवाद का भी नाम है।

जीवन धैर्य, समझ और संवेदनशीलता का भी नाम है।

भावनात्मक परिपक्वता का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति कभी दुखी न हो या कभी क्रोधित न हो। इसका अर्थ यह है कि वह अपनी भावनाओं को समझ सके, उन्हें स्वस्थ तरीके से व्यक्त कर सके और दूसरों की भावनाओं का भी सम्मान कर सके।

जब कोई बच्चा यह सीख जाता है कि सामने वाले की बात ध्यान से सुननी चाहिए, तब वह बेहतर मित्र बनता है।

जब वह यह सीखता है कि हर असहमति दुश्मनी नहीं होती, तब वह बेहतर जीवनसाथी बनता है।

जब वह यह समझता है कि हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ अलग होती हैं, तब वह बेहतर नागरिक बनता है।

दुर्भाग्य से आज का सामाजिक वातावरण इस चुनौती को और कठिन बना रहा है। सोशल मीडिया ने संवाद को त्वरित प्रतिक्रिया में बदल दिया है। लोग सुनने से अधिक बोलने में विश्वास करने लगे हैं। धैर्य कम होता जा रहा है। तुलना बढ़ती जा रही है।

ऐसे समय में बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।

यह कार्य केवल विद्यालयों का नहीं है। इसकी शुरुआत घर से होती है।

बच्चे माता-पिता की बातों से कम और उनके व्यवहार से अधिक सीखते हैं।

यदि घर में मतभेद होने पर सम्मानपूर्वक बातचीत होती है, तो बच्चे संवाद सीखते हैं।

यदि घर में किसी की भावनाओं का सम्मान किया जाता है, तो बच्चे संवेदनशील बनते हैं।

यदि माता-पिता अपनी गलती स्वीकार कर लेते हैं, तो बच्चे विनम्रता सीखते हैं।

यदि परिवार में दूसरों की सहायता करने की संस्कृति है, तो बच्चे सहानुभूति सीखते हैं।

हमें बच्चों से केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि परीक्षा में कितने अंक आए।

हमें यह भी पूछना चाहिए कि आज उन्होंने किसी की मदद की या नहीं।

किसी मित्र की परेशानी को समझा या नहीं।

किसी मतभेद को शांतिपूर्वक सुलझाया या नहीं।

किसी की बात धैर्यपूर्वक सुनी या नहीं।

क्योंकि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाएँ स्कूल के कक्षों में नहीं, बल्कि रिश्तों के बीच होती हैं।

और उन परीक्षाओं में डिग्री नहीं, भावनात्मक परिपक्वता काम आती है।

समाज की वास्तविक मजबूती केवल आर्थिक विकास से नहीं आती। वह उन लोगों से आती है जो एक-दूसरे के प्रति सम्मान रखते हैं, जो संवाद करना जानते हैं, जो कठिन समय में साथ खड़े होते हैं और जो अपने हितों के साथ दूसरों के हितों को भी महत्व देते हैं।

हमें ऐसी पीढ़ी तैयार करनी होगी जो केवल सफल पेशेवर न बने, बल्कि अच्छे इंसान भी बने।

जो केवल अपनी उपलब्धियों पर गर्व न करे, बल्कि अपने व्यवहार पर भी गर्व कर सके।

जो केवल ऊँचाइयों तक उड़ना न जाने, बल्कि ज़मीन से जुड़े रहना भी जाने।

क्योंकि ऊँचा उड़ना महत्वपूर्ण है, लेकिन सुरक्षित उतरना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

*फंडा यह है कि बच्चों को केवल सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ना मत सिखाइए। उन्हें रिश्तों की गर्माहट, संवाद की शक्ति, सहानुभूति का मूल्य और भावनात्मक संतुलन भी सिखाइए। क्योंकि पैसा, डिग्री और प्रतिष्ठा जीवन को सुविधाजनक बना सकते हैं, लेकिन भावनात्मक परिपक्वता ही जीवन को सुंदर, रिश्तों को मजबूत और समाज को स्वस्थ बनाती है।*

~डॉ रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
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