उत्तर भारतीय ग्रामीण समाज मुख्यतौर पर कृषि आधारित समाज रहा है। यूरोप, उत्तर पश्चिम एशिया और अमेरिका के बरक्स भारत की खेती की टेक्नोलॉजी पिछड़ी हुई रही है। लिहाज़ा खेती में पैदावार कम और उस पर जनसंख्या का भार अधिक रहा है। इसलिए गरीबी हमेशा मौजूद रही है और खेती से जुड़े विभिन्न वर्गों के बीच “टकराव और अंतरविरोध” मौजूद रहे हैं। इसलिए वहां पर “संघर्षरत सह-अस्तित्व” (struggling co-existence) की अवस्था दिखाई पड़ती है। यहां प्रस्तुत वरिष्ठ कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक की कहानी ‘पंच-फैसला’ में भी हमें उसकी झलक दिखाई देती हैं: संपादक।
कहानी
पंच-फैसला
ओमसिंह अशफ़ाक
उस साल बन्ते ने दसवीं का इम्तिहान दिया था। गर्मियों की छुट्टियां थीं। जून का महीना था। दोपहर के समय बन्ता अपने चौंतरे पर नीम के पेड़ के नीचे मस्ती में खाटपर लेट-लेटा बीड़ी पी रहा था। तभी हाट वाली गली की तरफ़ से गोरधन आता दिखाई दिया। वह उसी सदाबहार पोशाक में था, जैसा साल के दस महीने वह अक्सर रहा करता था । यानि आधी धोती टांगों में, आधी गले में। कमर में वही गाढ़े की जाकेट पहन रखी थी जो लगातार पहने जाने और कभी न धुलने की वजह से चीक्कट और खासी मैली हो गई थी। जूती उसके पैरों में हमने कभी नहीं देखी थी-सो आज भी नहीं थी। अलबत्ता तेज़ धूप से बचने की गरज से उसने गले में पड़ी आधी धोती का पल्ला कोने से पकड़ कर तिरछा-लम्बा करके सिर पर भी ओढ़ लिया था।
थोड़ी देर बाद बन्ते ने देखा कि गोरधन बेदू की ताई की दहलीज से घर के अन्दर घुस गया है। बेदू की ताई विधवा औरत थी। ताऊ की मृत्यु के बाद उसकी थोड़ी-सी जमीन को बेदू के परिवार वाले ही जोतते-बोते थे। लेकिन पैसे-धेले के मामले में बेदू की ताई बहुत कंजूस मानी जाती थी। अपनी पैदावार का सही-सही बंटवारा कराने के लिए वह समय से पहले ही खलिहान में जा बैठा करती थी। अब अकेली जान थी, जो मन भाये, बनाये खाये ! हां छटे-चौमासे कोई-सी बेटी पीहर आ जाये तो बात अलग। लेकिन धेवते-धेवतियां जल्दी ही ताई के नाक में दम कर देते और वह चाहने लगती कि ये सब जल्दी अपने घर जाएं तो सिर से बला टले! उसे अकेलापन सुहा गया था।
बन्ते को दादा अपने जी से सुना किस्सा याद हो आया। उनका तजुर्बा था कि औरतें दोपहरी में अपने-अपने घरों से चोरी-छिपे अनाज बेच दिया करती हैं; और बंजारन, झींवरी फैंचे वाले़ तथा गांव के हरिजन-वाल्मीकि उनके दलाल हुआ करते हैं। यानी वे इन औरतों से कोड़ियों के मोल अनाज खरीद ले जाया करते हैं। बन्ते को गोरधन पर शक हुआ। लेकिन दूसरे ही क्षण ख्याल आया कि बेदू की ताई तो अपने घर की खुद-मुखत्यार है। वह भला चोरी-छिपे अनाज क्यों बेचने लगी?..
फिर गोरधन इस वक्त क्या करने आया है? बन्ते की जिज्ञासा बढ़ गयी थी। जल्दी-जल्दी कश खींचकर उसने बीड़ी एक तरफ फेंक दी और ताई के घर की तरफ़ चल पड़ा। बेदू की ताई खटोले पर बैठी थी और गोरधन उसके सामने नीचे जमीन पर बैठा था- “लम्बरदारनी दस दिन खातिर सौ रुपये दे दे। दस दिन का पांच रुपये ब्याज दूंगा। ये ले ब्याज के पांच रुपये पहले ले ले”- गोरधन खुशामद कर रहा था। गोरधन ने जाकेट की जेब से पांच रुपये का नोट निकाला तो ताई का मन ललचा गया।
“देख गोरधन ! दस दिन तै ज्यादा मैं नहीं रुकने की। ग्यारहवें दिन घर आकर रुपये दे जाइयो,” ताई ने गोरधन के हाथ से पांच का नोट लेते-लेते कहा। ताई भीतर कोठे में गई और सौ रुपये का नोट ले आयी।
“ठीक ग्यारहवें दिन लौटा दूंगा, बारहवां न होने दूंगा,” सौ का नोट ताई के हाथ से लेते हुए गोरधन ने आश्वासन दिया। फिर एक पल ठिठक कर गोरधन बोला, “लम्बरदारनी, अर ये पांच का नोट भी तू मुझे लौटा दे तो एक रुपया ब्याज दे दूंगा ? बेशक, इसका ब्याज भी अगाहू ले ले,” ये कहते हुए गोरधन ने जेब से एक रुपये का नोट निकालकर ताई की तरफ़ बढ़ा दिया। ताई को सौदा बुरा न लगा। उसने एक रुपया लेकर पांच का नोट गोरधन को वापस थमा दिया। गोरधन उठकर चलने लगा, लेकिन तनिक सोचकर रुक गया, “देख लम्बरदारनी, अगर यह एक रुपया भी ब्याज पर चढ़ाना चाहती हो तो एक चवन्नी इसकी भी दे सकता हूं। ये ले थाम चवन्नी ब्याज की।” गोरधन ने वापिस मुड़कर चवन्नी ताई के हाथ में थमा दी। ताई ने पलभर हिसाब लगाया कि एक रुपये पर दस दिन में चवन्नी ब्याज मिल रहा है तो घाटा क्या है? और ताई ने एक रुपये का नोट भी वापिस गोरधन को थमा दिया। गोरधन चला गया, पर काफ़ी देर तक उसका गणित बन्ते की समझ में नहीं आया।
दूसरे साल एक दिन बन्ता गली से गुज़र रहा था तो ताई झींक रही थी, “मरण जोग्गा गोरधन चवन्नी ब्याज की देकर सौ रुपये ठग ले गया ? लौटाने का नाम ही नहीं लेता ।”
“क्या कहता है ताई?” बन्ते ने चलते-चलते जानना चाहा। “अरे, कहता क्या है नासपिट्या!.. हां दूंगा लम्बरदारनी…जरूर दूंगा। अबकी साढ़ में दूंगा…कार्तिक में दूंगा…बस यूं ही बहकाता रहता है।”
ताई की बात सुनकर बन्ते को मन ही मन हंसी भी आयी। जैसे अन्दर से कोई कह रहा हो कि तू भी तो मूल़धन से पहले ही ब्याज खाने चली थी। अब देख गोरधन के हाथ !
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इस वाकये को कई साल बीत गये थे। इस अन्तराल में न कभी गोरधन से भेंट हो सकी थी और न ही उससे सम्बन्धित कोई समाचार सुनने में आया था। एक तरह से बन्ता उसे जैसे भूल ही गया था। अब बन्ता कस्बे के डिग्री कालिज में पढ़ रहा था। महीना-दो महीना बाद ही घी-गुड़ और फीस-खर्चा लेने के लिए गांव जाना होता था। ऐसे ही एक इतवार को वह गांव गया हुआ था:
हाट वाली गली की तरफ़ से ढोल की आवाज कान में पड़ी। आवाज़ लगातार तेज होती आ रही थी। स्पष्ट था कि डोंडी पीटने वाला उधर ही आ रहा है। हमेशा की तरह चौपाल वाली गली से होकर गुजरेगा। जरूर कोई महत्वपूर्ण सूचना होगी बन्ता हाट की तरफ़ जाने वाली गली के मोड़ पर ठिठक गया। यहां से डोंडी पीटने वाले की आवाज़ साफ़ सुनाई देगी- ‘जरा सुनता ही चलूं। कैसी मुनादी हो रही है।’
ढम-ढम-ढम…आज दोपहर को चौधरी वाली चौपाल में पंचायत होगी, छत्तीस जात कट्ठी हो जाइयो ऽऽऽ…ढम ढम-ढम-ढम…
अक्सर लगान-उगाही भुगतान की डोंडी पिटती तो मन्तव्य की घोषणा भी साथ हुआ करती थी। लेकिन जब किन्हीं अन्य कारणों से पंचायत बुलाई जाती तो डोंडी पीटने वाला केवल समय की सूचना देता था। फिर भी पंचायत के उद्देश्य की खबर कानों-कान सभी जिज्ञासु लोगों तक पहुंच जाती थी। इस तरह की पंचायतों का कोई लिखित एजेंडा या नोटिस वगैरा कभी नहीं होता था।
इधर पिछले कई सालों में महंगाई और बेरोज़गारी दिन-दूनी-रात-चौगुनी रफ़्तार से बढ़ी थी। बेहया ने गरीबों के दिलों में सरकार के प्रति संदेह की गांठ पैदा कर दी थी। सरकार को जनता में अपनी साख लगातार गिरती नज़र आने लगी थी। और अब तो ‘हरिजन-वाल्मीकि’ भी जो आजादी के बाद से एक मुश्त उसके समर्थक रहे थे- सत्तारूढ़ दल के प्रति उदासीन होने लगे थे।
सरकार ने अपनी गिरती साख को बचाने के लिए उपयुक्त समय पर उपयुक्त कदम उठाने की सोची। ‘गरीबी हटाओ योजना’ के तहत हरिजनों पर देहाती कर्जे मंसूख कर दिये। अब कोई भी ‘सवर्ण’ व्यक्ति किसी हरिजन से कर्ज़ की वसूली नहीं कर सकता था।
लेनदेन में गोरधन का हाथ तो पहले ही तंग रहा करता था। गांव के लोग उसे “कुदेवा” मानते थे-एक बार रुपये पैसे ले लिए तो लौटाने का नाम न लेगा!..
अब तो गोरधन के लिए गृहस्थी की गाड़ी खींचते रहना और भी मुश्किल हो गया था। महीने में कई बार फाके हो जाते थे। किसी सवर्ण किसान के पास उधार मांगने जाता तो उल्टे व्यंग्य बाण सुनने पड़ते…अब जाकर सरकार से ही लो ! यहां कोई हराम की कमाई थोड़े ही है जो देकर भूल जायें और वापिस न मांगें। दिन रात खून-पसीना एक करते हैं, तब जाकर दो पैसे जुड़ते हैं; वह भी तब जब कुदरत परसन्न रहे। परसाल ईख पाला-पोला नहीं सूख गया था? ऐसी बीमारी लगी थी कि चौपट कर गयी…।
कर्जा-मुआफी के हुक्म से गोरधन को जो थोड़ी-बहुत खुशी हुई थी, वह चिंताओं और परेशानियों में दबकर रह गयी थी। हालांकि उसने इस प्रसन्नता को कभी किसी से उजागर न किया था पर मन में कुछ राहत ज़रूर महसूस की थी। साथ ही उसे यह चिंता सताने लगी थी कि भविष्य में गांव का कोई किसान ऋण न देगा तो उसके ब्याह-भात-छुछक के कारज किस तरह समपूरण होंगे ? पहले भी उसने किसी का ऋण चुकाने से इंकार न किया था लेकिन जिस किसी से अड़ी-भीड़ में लिया, उसका कभी लौटा तो न पाया था।
सरकारी कर्जे का झंझट, कागज़ी कार्रवाई और दफ्तरों की दौड़-धूप से वह बहुत डरता था । फिर सरकार कौन मुफ़्त दे देगी? वापिस तो लेगी ही। न चुका पाये तो गिरफ़्तार करके जेल में न भेज देगी? यहां किसान की तो खुशामद करके टाल देते हैं, हाकिम क्या खुशामद से मान जायेगा ? हथकड़ी न डलवा देगा ? फिर सरकार मकान के लिए कर्ज़ा देती है। पर मकान में से तो रोटी नहीं उपजती ? बिजनस व्यौपार की लियाकत और बूता होता तो यहां गांव में मजूरी ही करते? सरकार कुछ देना ही चाहती है तो रुजगार ही क्यूं नहीं दे देती ?- परन्तु सरकार कौन सा गरीबों की दिल से सहायता करना चाहती है ? इसे तो वोट चाहिए और हम हैं कि जड़ से ग़रीबी दूर करने की मांग ही नहीं करते। कभी-कभार ये टुकड़े फेंक कर सरकार रिझा लेती है और हम फिर इनके चक्कर में आ जाते हैं- इस तरह के विचार गोरधन को सताये जाते। सरकार और सामंती-संबंधों की चक्की के दो पाटों के बीच में वह पिसता जा रहा था। न इधर का रहा, न उधर का। गांव में उसका रहा-सहा ऐतबार सरकारी हुक्म की वजह से जाता रहा और सरकारी कर्जे की जटिल प्रक्रिया उसके लिए मकड़ जला साबित हो रही थी।
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सितम्बर का महीना था। गांव में मज़दूरी का कोई जुगाड़ नहीं बन पाता था। धान की रोपाई का काम ख़त्म हुए दो माह से ज्यादा हो चले थे और कटाई शुरू होने में अभी महीने भर की देरी थी। इस मौसम में कोई गोड़ाई,नुलाई खुदाई का काम भी नहींचल रहा था।
गोरधन के परिवार ने लगातार तीन दिन फाके किये। चूल्हा न जला। पेट में ज्वार-भाटा उठ रहा था। अब और अधिक सहन नहीं हो सकता था। गोरधन ने रात के तीन पहर किसी तरह जाग-बैठकर बिताए। चौथे पहर वह किसी दृढ़ निश्चय के साथ अपनी टूटी-ढीली खाट से उठ खड़ा हुआ था। गांव से कोस-भर दूर मुखिया के डहर वाले खेत में पहुंचा। गुआर के क्यार में घुसकर उसने एक धड़ी के अंदाजे में फलियाँ तोड़कर झोली़ में भर ली। तभी उसके मन में द्वन्द्व हुआ…। आज तक उसने कभी चोरी पर नीयत न धरी थी। आज तूने यह क्या कराया भगवान! लेकिन शीघ्र ही पेट में जल रही आग ने उसका औचित्य प्रदान किया। क्या यही मुखिया न थे जिन्होंने ढाई सेर की जगह दो-सेर जवार दिहाड़ी में दी थी। और वह भी पत्थर के बाटों से तोलकर। सेर के पीछे दो छंटाक नहीं खा गये थे ? सब कुछ होते हुए भी जब ये ग़रीबों का पेट काटते हैं, तो भगवान तू इन्हें दंड क्यों नहीं देता? मेरी हालत तो तू देख ही रहा है। तीन दिन से अन्न का दाना भी पेट में नहीं पड़ा है। चार दिन तक गोरधन और उसका परिवार गुआर की फलियाँ उबाल कर पेट भरता रहा। लेकिन पांचवें दिन मुखिया के लठैत बेटों ने गोरधन को गुआर के खेत में ही दबोच लिया था।
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चौधरी की चौपाल में पंचायत हो रही थी। गोरधन अपराध-भाव से हाथ जोड़े उस जगह खड़ा था जहां पंचों की जूतियां पड़ी थीं। बहुत देर तक पंचों में आपसी खुसर-फुसर होती रही। फिर पंचों का “औकासा” (छोटी कमेटी) को अलग भेज दिया गया। थोड़ी देर बाद औकासा लौट आया था। जैमल लम्बरदार ने उठकर ऐलान किया कि औकासा फैसला बांध लाया है। पंचायत दोनों फरीकों से पूछती है कि वह जो फैसला सुनायेगी, दोनों को मंजूर होगा या नहीं ?
मुखिया के बेटे महेन्दर ने चटक से उठकर कहा, “जहां पंच वहां पणमेसर…हमें पंचायत का फैसला मंजूर होगा।” अब गोरधन की बारी थी। दिल डांवाडोल हो रहा था। लेकिन इस वक्त कोई विकल्प भी नहीं सूझ रहा था। मजबूरन कह दिया, “पंचों, मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ कि मेरे साथ निसाफ हो, मुझे मंजूर होगा।”
फैसला सुना दिया गया कि “गोरधन चोरी का कसूरवार है, उसके लिए पचास रुपये जिरमाना देना होगा और मुखिया का जो नुकसान हुआ उसकी एवज में वह एक महीना मुखिया के यहां बेगार करेगा।”
(प्रयास-2. मार्च अप्रैल 1983)
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प्रतिबिंब मीडिया के नियमित और संजीदा पाठक श्री सुरेंद्र पाल तोमर ने कहानीकार के व्हाट्सएप पर यह टिप्पणी भेजी है:
“कहानी दिलचस्प है. पंचायती फैसले पार्टियों का मुँह देख कर होते आये हैं सो वही हुआ भी.”✌
-सुरेंद्र पाल तोमर भारतीय सेना का पूर्व सैनिक, बरेली (उत्तर प्रदेश) भारत।