क्लिक से किक तक: बच्चों को डिजिटल आभास से वास्तविक विकास की ओर कैसे लाएं?

क्लिक से किक तक: बच्चों को डिजिटल आभास से वास्तविक विकास की ओर कैसे लाएं?

  • ऑनलाइन स्क्रीन और ऑफलाइन बचपन के बीच एक आदर्श संतुलन बनाने का नया रोडमैप

 

डॉ. रीटा अरोड़ा

“मम्मी, बस पाँच मिनट और।”
दस वर्षीय आरव ने मोबाइल से नजरें हटाए बिना कहा।
“बेटा, आधा घंटा हो गया है। बाहर जाओ, दोस्त इंतजार कर रहे हैं।”
आरव ने बिना सिर उठाए जवाब दिया, “मम्मी, मैं दोस्तों के साथ ही तो खेल रहा हूँ।”
माँ ने स्क्रीन की ओर देखा। वहाँ कोई मैदान नहीं था, कोई हँसी नहीं थी, कोई धूल-मिट्टी नहीं थी। बस एक ऑनलाइन गेम था, जिसमें दुनिया भर के अनजान खिलाड़ी थे।
कुछ देर बाद खिड़की से बाहर झाँकते हुए माँ ने देखा। पार्क में झूले खाली थे। क्रिकेट की पिच सूनी थी। साइकिलें दीवार से टिकी थीं।
अचानक उन्हें अपना बचपन याद आ गया, जब घर लौटने के लिए माँ को कई बार आवाज़ लगानी पड़ती थी।

आज तस्वीर बदल गई है।
अब बच्चों को घर के अंदर से बाहर बुलाना पड़ता है।
समय बदलता है और उसके साथ जीवन भी बदलता है। तकनीक ने हमारे जीवन को आसान बनाया है। शिक्षा, जानकारी और संवाद के नए रास्ते खोले हैं। लेकिन इसी तकनीक ने बच्चों के सामने एक नई चुनौती भी खड़ी कर दी है – डिजिटल दुनिया और वास्तविक दुनिया के बीच संतुलन बनाने की चुनौती।

आज का बच्चा जन्म से ही स्क्रीन के बीच बड़ा हो रहा है। मोबाइल, टैबलेट, स्मार्ट टीवी और इंटरनेट उसके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन चुके हैं। वह दुनिया के किसी भी कोने की जानकारी कुछ सेकंड में प्राप्त कर सकता है। यह एक बड़ी उपलब्धि है।

लेकिन प्रश्न यह है कि क्या जानकारी के साथ अनुभव भी बढ़ रहे हैं?
क्या स्क्रीन पर फुटबॉल खेलने वाला बच्चा मैदान में दौड़ने का आनंद जानता है?
क्या इमोजी भेजने वाला बच्चा दोस्त के चेहरे की भावनाएँ पढ़ना सीख रहा है?

यहीं चिंता शुरू होती है।
समस्या तकनीक नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब तकनीक बचपन की जगह लेने लगती है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन समय बच्चों की नींद, एकाग्रता, शारीरिक सक्रियता और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करता है। लगातार स्क्रीन देखने से आँखों पर दबाव बढ़ता है, शारीरिक गतिविधियाँ घटती हैं और मोटापे जैसी समस्याएँ भी बढ़ने लगती हैं।
लेकिन उससे भी बड़ी चिंता मन की है।

सोशल मीडिया और छोटे-छोटे वीडियो बच्चों को तुरंत आनंद देते हैं। धीरे-धीरे उनका मन उसी त्वरित संतुष्टि का आदी हो जाता है। फिर किताब पढ़ना, होमवर्क करना या धैर्य से किसी काम को पूरा करना उन्हें कठिन लगने लगता है।

एक समय था
जब बच्चे बारिश में भीगते थे।
आज वे बारिश के वीडियो देखते हैं।
पहले बच्चे पेड़ पर चढ़ना सीखते थे।
आज वे उसके बारे में इंटरनेट पर पढ़ लेते हैं।

जानकारी बढ़ी है, लेकिन अनुभव कम हुए हैं और जीवन केवल जानकारी से नहीं बनता। जीवन अनुभवों से बनता है।
यही कारण है कि आज माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

अक्सर हम बच्चों का फोन छीनकर समस्या का समाधान ढूँढ़ने की कोशिश करते हैं। लेकिन यह वैसा ही है जैसे नदी का रास्ता रोककर बाढ़ को नियंत्रित करना।

आवश्यकता रोकने की नहीं, दिशा देने की है।
बच्चों को तकनीक से दूर नहीं करना है, बल्कि तकनीक का संतुलित उपयोग सिखाना है।
सबसे पहला कदम माता-पिता को स्वयं उठाना होगा।

बच्चे हमारे उपदेशों से कम और हमारे व्यवहार से अधिक सीखते हैं। यदि भोजन करते समय माता-पिता मोबाइल में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चों से अलग व्यवहार की उम्मीद करना कठिन है।

घर में कुछ समय और स्थान ऐसे होने चाहिए जहाँ स्क्रीन का प्रवेश न हो। रात का भोजन, परिवार की बातचीत और सोने से पहले का समय स्क्रीन मुक्त हो सकता है।

कई बार बच्चे फोन इसलिए नहीं देखते कि उन्हें फोन बहुत पसंद है। वे इसलिए देखते हैं क्योंकि उनके पास कोई बेहतर विकल्प नहीं होता।

यदि घर में किताबें हों, संगीत हो, चित्रकारी हो, बागवानी हो, खेल हों और परिवार के साथ समय हो, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से स्क्रीन से बाहर भी जीवन खोजने लगते हैं।

हमें बच्चों को यह भी सिखाना होगा कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर चीज़ वास्तविक नहीं होती।
हर मुस्कुराती तस्वीर के पीछे खुशी हो, यह जरूरी नहीं।
हर सफलता की कहानी पूरी सच्चाई नहीं बताती।

डिजिटल साक्षरता आज उतनी ही आवश्यक है जितनी पढ़ना-लिखना।
स्कूलों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

यदि शिक्षा केवल स्क्रीन पर निर्भर हो जाएगी, तो बच्चे जीवन के अनेक महत्वपूर्ण अनुभवों से वंचित रह जाएंगे। खेल, कला, वाद-विवाद, प्रकृति भ्रमण और सामूहिक गतिविधियाँ बच्चों को वह सिखाती हैं जो कोई ऐप नहीं सिखा सकता।
दरअसल, बचपन का अर्थ केवल बड़े होने की तैयारी नहीं है।
बचपन स्वयं जीवन का एक सुंदर अध्याय है।
उसमें मिट्टी की खुशबू होनी चाहिए।
दोस्तों की हँसी होनी चाहिए।
हार-जीत का अनुभव होना चाहिए।
पेड़ों की छाँव और खुली हवा का स्पर्श होना चाहिए।

क्योंकि जो बच्चा केवल स्क्रीन को जानता है, वह दुनिया को पूरी तरह नहीं जानता। और जो बच्चा केवल वास्तविक दुनिया में रहता है, वह भविष्य की तकनीकी चुनौतियों के लिए तैयार नहीं होगा।
समाधान दोनों के बीच संतुलन में है।
हमें ऐसे बच्चों की जरूरत है-
जो मोबाइल चला सकें, लेकिन मैदान में दौड़ भी सकें।
जो ऑनलाइन सीख सकें, लेकिन लोगों से संवाद भी कर सकें।
जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता को समझें, लेकिन मानवीय संवेदनाओं को न भूलें।

अंततः तकनीक एक साधन है, जीवन नहीं।
मोबाइल एक खिड़की हो सकता है, पूरा आसमान नहीं।
और बचपन का असली विकास स्क्रीन की चमक में नहीं, बल्कि जीवन के वास्तविक रंगों में होता है। आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि हम बच्चों को डिजिटल दुनिया से बचाएँ।
आवश्यकता इस बात की है कि हम उन्हें यह सिखाएँ कि डिजिटल दुनिया का उपयोग कैसे करें, लेकिन उसमें खोए बिना।

क्योंकि भविष्य उन्हीं बच्चों का होगा, जो क्लिक करना भी जानते होंगे और मैदान में किक मारना भी।
डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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