राजकुमार कुम्भज की दो कविताएँ
1.
कुछ लोग हैं कि सो रहे हैं.
कुछ लोग हैं कि सो रहे हैं
कुछ लोग हैं कि चीख़-चिल्ला रहे हैं
सुनने वाले सुन रहे हैं और सुन्न हो रहे हैं
कहीं कुछ हो रहा है कि सब कुशल है
कहीं कुछ भी नहीं हो रहा है कि ठीक है
धोबी कपड़े धो रहा है,ठीक है
लोहार लोहा पीट रहा है,ठीक है
नाई बाल काट रहा है,ठीक है
हलवाई मिठाई बना रहा है,ठीक है
एक भड़भूँजा भी है यहीं-कहीं,हाँ,हाँ
जो खुलेआम भाड़ झोंक रहा है,हाँ,हाँ
कलाली में जमा हैं कवियों की टोलियाँ
अरे हाँ बाबा हाँ सब ठीक है,ठीक है
जो अपनी-अपनी असफलताओं
अपनी-अपनी विवशताओं,निष्ठाओं
और अपनी-अपनी परंपराओं सहित
अपनी-अपनी प्रेम-कथाऍं सुना रहे हैं
कुछ पुरानी बस्तियों में पुराने कपड़े टॅंगे हैं
ज़ाहिर है कि पुराने कपड़े कटे-फटे हैं
कुछ हैं बेचारे लोग भी हैं जो यहाँ
ब्राँडेड कपड़े मॅंहगे दामों पर ख़रीद रहे हैं
और चीर-फाड़कर नग्नता से पहन रहे हैं
हवाऍं नहीं,ऑंधियाँ भी नहीं चल रही हैं
बस,एक साइकिल है कि चल रही है
अँधे,अँधों को चला रहे हैं जपते हुए माला
एक ज़बरदस्त धुलाई मशीन है बाड़े में
और है रामजी का ज़बरदस्त भरोसा भी
हर किसी की तरह,हर किसी सूने में
सरकार को मैंने भी कोसा है कई दफ़ा
लेकिन उन्नीस को उन्नतीस कहा नहीं
सोचता हूँ कि कह दूँ और तनकर रह लूँ
क्या ये संभव है,हाँ जी-हाँ जी ये संभव है
अगर जो मैं इस देश का नागरिक नहीं हूँ
इसी घर,इसी शहर का आदमी नहीं हूँ
अरे हाँ बाबा हाँ सब का सब कुछ ठीक है
टटोलकर अपनी-अपनी निष्ठाऍं देख लें
कुछ लोग हैं कि सो रहे हैं.
________
2.
सुख लुटा रहा था सोना.
सुख लुटा रहा था सोना
जो पूछा मैंने कहाँ थे बरसों से जनाब
बोला वह सकपकाकर मुस्कुराते हुए
उदारता भी कोई चीज़ होती है बाबू
जो करते हैं खटकरम कई-कई तरह के
प्रोफ़ेसर हैं,पढ़ाते हैं ईमानदारी और सच
निर्भय होकर हर मॅंगल रखते हैं उपवास
खुल्लमखुल्ला जाते हैं मंदिर मत्था टेकने
प्रगतिशीलता के प्रमुख धनुर्धर हैं कहलाते
डरते नहीं कहीं भी,किसी के भी बाप से
करते हैं हनुमान चालीसा का अखंड-पाठ
बेचते हैं प्रश्न-पत्र लपेटकर महा प्रसाद में
उनसे मिले फ़ुरसत,तभी तो आऊॅं इधर
और फिर वे भी तो कम नहीं,कम नहीं
जो इधर आने से अक़्सर ही रोकते हैं मुझे
बार-बार मारते हैं,पीटते हैं,खींचते हैं टाँग
धूल झोंकते हैं ऑंखों में,चुराते हैं सोना
हरामी हैं इतने कि हराम कर देते हैं सोना
महाचोर हैं इतने कि तुच्छ चोरों से डरते हैं
लूटी करूणा सब लोह-संदूकों में रखते हैं
प्रेम-पत्रों और प्रेम-प्रसंगों की तरह गुप्त
ताले भी लगाते हैं,छुपाते हैं चाबियाँ भी
फिर मुझे भी कहाँ पसंद है खुले में रहना
सुख लुटा रहा था सोना.
——————
