ओमसिंह अशफ़ाक की कविता – जात, धर्म और प्यार-1

कविता

जात, धर्म और प्यार-1

ओमसिंह अशफ़ाक

वैदिक युग में सुण्या करैं थे, देव-असुर संग्राम ।
नयी सदी ये कैसा ल्याई, शैतानी पैगाम ॥

कबीर, सूर, मीरा और तुल़सी, हुए रहीम रसखान ।
भक्ति रस के किस्से गाये, प्रेम का किया बखान ॥

कृष्ण के संग राधा आई, संग राम के सीता ।
सावित्री संग सत्यवान के, समय घणा नहीं बीता ॥

सोहनी आई महीवाल संग, और रांझे संग हीर ।
आई जुलेखा संग युसुफ़ के, करूँ छोटी तकरीर ॥

प्यार के किस्से इसी देश के, संख्या कई हज़ार ।
किस-किसका मैं ज़िक्र करूँ, मत जुल्म करो मेरे यार ।।

प्यार का रिश्ता अमर है जग में, कुदरत का वरदान ।
जो प्यार खत्म होग्या धरती तै, मिट जागा इंसान ॥

विश्वामित्तर और भरथरि, पूर्णमल का क़िस्सा ।
कामदेव कोई नया नहीं, है इसी समाज का हिस्सा ॥

जब छोरी-छोरे मर जांगे, के धोरै तेरे रह जागा ।
दस या बीस बरस के भीतर, काल़ तनै भी खा जागा ॥

माणस खाणा माड़ी बात सै, के डायन की रीस ।
अपणे जाये वा भी ना खावै, कुछ तो उस तै सीख ॥

थारी बात में जो सत होता, दुनिया फूल चढ़ाती ।
इब थारे जाये ना थारी मान्नै, क्यूँ बण रहे आत्मघाती ॥

कहे ‘ओमसिंह’ ना बंस चलै, नित चलै काल़ का फेरा ।
नेक करम कुछ इब तो करल्यो, कर लिया जुल्म भतेरा ॥

(26 जून, 2010)

One thought on “ओमसिंह अशफ़ाक की कविता – जात, धर्म और प्यार-1

  1. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    अंग्रेजी के लेखक और वरिष्ठ आलोचक डॉक्टर एनके नागपाल की यह टिप्पणी कवि के व्हाट्सएप पर प्राप्त हुई है। हम प्रतिबिंब मीडिया के पाठकों के लेखकों-पाठकों हेतु इसे यहां प्रस्तुत कर रहे हैं :
    “Caste, Religion & Love
    “Parents have been a little more strict than required regarding the matters of love of their children. That is why they had also to suffer. Many a time they lose their children and they themselves have to suffer through out their life.They should have a broader Outlook as compared to their narrow Outlook. The world has changed a lot.They should rise above jat-pat, religion especially while deciding the matrimonial relations.”
    -Dr.NK Nagpa,l formerly principal and professor of English at IGN college Ladwa, kurukshetra (Haryana) India.

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