दयाल जास्ट की कविता – युद्ध ही अंतिम निर्णय नहीं होता

युद्ध के विरुद्ध युद्ध – 24

कविता हमेशा युद्ध के खिलाफ़ खड़ी रही है, भले ही तानाशाह युद्ध को राष्ट्रवादी गौरव बताकर उसका महिमामंडन करते रहे हों। लेकिन उसकी कीमत आम आदमी ने ही चुकाई है (महमूद दरवेश)। बहरहाल जो युद्ध चल रहे हैं उनके नकारात्मक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं । किसी भी युद्ध में जहां बच्चे और महिलाओं समेत नरसंहार होते हैं, वहीं इस विध्वंस से अंतरराष्ट्रीय सामाजिक जीवन भी तहस-नहस होता है।

प्रतिबिंब मीडिया साहित्यकारों की इस चिंता से भली-भांति वाकिफ़ है। ‘युद्ध के विरुद्ध युद्ध’ शीर्षक के तहत हम आपका युद्ध विरोधी साहित्य प्रकाशित करेंगे। आप अपनी कविताएं, कहानियों समेत रचनाएं हमें भेजिए, उन्हें प्रतिबिंब मीडिया पर ससम्मान प्रकाशित किया जाएगा। आज प्रस्तुत है दयाल जास्ट की कविता –  युद्ध ही अंतिम निर्णय नहीं होता। संपादक

 

कविता

युद्ध ही अंतिम निर्णय नहीं होता

दयाल जास्ट

 

युद्ध ही अंतिम निर्णय नहीं होता

ढूँढने से समस्या के और भी हल निकलते हैं ।

 

पूर्वाग्रह की अग्नि में कब तक जलोगे

कब तक निहत्थी जनता को मारोगे

शीतलता तुच्छ मात्र भी नहीं है उनके दिलों में

खुद को खुदा मान बैठे हैं युद्ध करने वाले।

 

सम्राट अशोक ने युद्ध किया

क्या मिला नरसंहार/पश्चाताप

उसके बाद युद्ध को तिलांजलि

क्रोध पर विजय और धम्म प्रचार-प्रसार ।

 

युद्ध लोगों की गाढ़ी कमाई की बर्बादी है

युद्ध अपने लोगों को आर्थिक लाभ देने का परिणाम है

युद्ध प्राकृतिक संपदा को अपने लिये हड़पना है

युद्ध डरे हुए राजा द्वारा जनता की डराना है ।

 

युद्ध ही अंतिम निर्णय नहीँ होता

ढूँढने से समस्या के और भी हल निकलते हैं।

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