जन सरोकार
हमारे पुराने रीति रिवाज – कितने ठीक कितने गलत?
रणबीर सिंह दहिया
आजकाल हमारे रिवाजों का, हमारी पुरानी परंपराओं का, हमारी पुरानी संस्कृति का बड़ा ढोल पीटा जा रहा है । उपभोगतावाद की गली सड़ी संस्कृति का मुकाबला इस पुरानी जंग लगी हुई संस्कृति से करने की गुहार लगाई जा रही है। फेर खूंटा ठोक की एक बात तो गांठ मार लो कि ये जो उपभोगतावाद की बाजारू संस्कृति का हमला है इसका मुकाबला पुरानी संस्कृति से, पुराने रिवाजों से और पुरानी परंपराओं से नहीं किया जा सकता।
इन दोनों संस्कृतियों में एक बात कोमन है और वह है औरत को एक चीज समझने की नजर, वह है औरत को उसके शरीर के माध्यम से दैखने की नजर, औरत को एक दोयम दर्जे का प्राणी समझने की नजर। आज वक्त की मांग है, आज के सभ्य समाज की मांग है, आज के आधुनिक समाज की मांग है कि औरत भी एक इंसान समझी जाये, औरत का समाज में बराबर का दर्जा हो, औरत का समाज के विकास में बराबर का साझा हो, समाज के चलाने में, फैसले करने का उसका बराबर का हक हो।
समाज के विकास में औरत और पुरूष कन्धे से कन्धा मिला के चलें और एक सभ्य सुसंस्कृत समाज की रचना करें और एक स्वस्थ इंसानी संस्कृति, एक ऊंचे दर्जे की मानवतावादी संस्कृति की रचना हो। पर कई रलधू तो ये कह देते हैं कि औरत पुरुष के बराबर कैसे हो सकती है? “ये लुगाई पहल मैं सिर पै चढ़ा ली, इननै और सिर पै चढ़ाल्यो।”
इस ढाल के फांचर ठोक तो हर जगह पा जायेंगे। बाकी एक बात जरूर है कि इस उपयोगितावादी बाजारू संस्कृति का मुकाबला हमारे पुराने रिवाज, हमारी पुरानी परम्परा और हमारी पुरानी संस्कृति क्यों नहीं कर सकती? इसमें सबसे जरूरी बात है कि हमारी पुरानी संस्कृति में भी औरत का दोयम दर्जा था, वो भोग की चीज मानी जाती थी और इसी नजर से हमारे रिवाज भी बनाए गए।
जब बात चीत चलती है तो मां बाप एकदम सी कहवेंगे कि हमतो छोरा छोरी में कोई फरक नहीं करते। हमको तो छोरी बल्कि फालतू प्यारी लगती हैं। हो सकता है उनकी बात में दम हो पर थोड़ा सा खुरच के देखें तो वे भी दुभांत करते पाते हैं।
कई गावों में जब महिला भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान मैं गए तो पता लगा कि जब लड़की होती है तो जच्चा को पांच सेर घी देने का रिवाज है और जब लड़का होता है तो दस सेर घी देने का रिवाज है। हमने बताया कि यह तो चौड़े में लड़की के साथ दुभांत है तो वे महिला बोली, “ना या दुभांत कोण्या यो तै रिवाज सै।”
अब इनको कौन समझावे कि इन रिवाजों में, इन परम्पराओं में तो दुभांत कूट-कूट के भर रखी हैं। जब लड़का हो तो थाली बजाई जाती है खुशी मनाने के लिए और अगर लड़की पैदा होती है तो ठीकरा फोड़ के मातम मनाया जाता है। इस रिवाज में दुभांत नहीं दिखाई देती हमको।
लड़के के पैदा होने पर नामकरण संस्कार धूमधाम से कराया जाता है और लड़की होने पर नहीं। चुची धवाई का रिवाज लड़का पैदा होने पर और सोने की टूम तक दी जाती हैं पर लड़की होने पर कोए चूची नहीं धोवैं और कोए ना धुवावै। लड़का होने पर पिलिया और छुछक का रिवाज बड़े चाव में भरके मनाया जाता है।
छटी का दिन लड़के का ही क्यूं मनाया जाता है? इस तरह के रिवाजों की इतनी लम्बी लिस्ट बनाई जा सकती है जितनी लम्बी द्रोपदी की साड़ी थी।
जब लड़का लड़की बराबर तो फिर लड़का होने की दवाई बाछड़े वाली गां के दूध में क्यों खाई जाती है? और अगर लड़की गर्भ में आ भी जाये तो इस बाजारू संस्कृति के दबाव में अल्ट्रासाउण्ड करा कर पता लगा लिया जाता है और छांट कर लड़की पर कटारी चला दी जाती है।
वाह रे भारत देश महान तेरे क्या कहने? गायों के वध पर तो हररोज जलसे जलूस निकाले जाते हैं और इंसानों के वध पर चुप्पी साध ली जाती है। वही कुछ डाक्टर जो छांट करके महिला भ्रूण हत्या करने लगे हुए हैं, वहीं गौशाला के रक्षक और पता नहीं क्या क्या बने पाते हैं।
जब लड़कियों की गिनती इतनी कम हो जाएगी तो पांच भाइयां में से एक का ब्याह हुआ करेगा, जैसे पहले हमारे रिवाज थे तो कै मन बीघे की उतरैगी? लड़का जरूरी चाहिए नहीं तो वंश कैसे चलेगा? ये है हमारी पुरानी संस्कृति।
लड़का नहीं होगा तो चिता को लकड़ी कौन देगा? पहले तो रिवाज बनाया कि लड़की अर्थी के साथ शमशान घाट पर नहीं जा सकटी और फेर सवाल ठा दिया कि चिता को लकड़ी कौन देवेगा?
हमने अपणे पड़दादा का नाम तक तो पता नहीं और बात वंश की करते हैं । लड़कियों को यह कहा जाता है कि मलाई खावेगी और दूध पीवेगी तो मूंछ जाम जायेंगी। कहने का मतलब ये है कि जब हम औरत को एक इन्सान ही माणने को तैयार नहीं, जब उसको बराबर का दर्जा ही देने को तैयार नहीं तो इस बाजारू संस्कृति का मुकाबला कैसे कर सकते हैं?
असल मैं आज की जो अप संस्कृति है वह हमारी पुरानी संस्कृति की रूढ़िवादी परम्पराओं और आज की बाजारू संस्कृति की औरत को एक चीज के रूप मैं देखने की रूग्ण मानसिकता का घालमेल है इसी करके तो चाहे जांघीया क्यूं ना बेचना हो इसके साथ औरत जरूर मटकती दिखाई जायेगी।
अगर इस पुरानी रूढ़िवादी और आज की बाजारू संस्कृति के घालमेल से पैदा हुई सड़ांध का मुकाबला करना है तो पुरानी संस्कृति की, पुराने रिवाजों की आंख मींच के कौली भरवाने से काम नहीं चलने वाला।
हमारी पुरानी संस्कृति में भी जो अमानवीय रिवाज हैं, जो रूढ़िवादी परम्परा हैं, जो गैर मानवतावादी रूझान हैं उनकी छंटनी करके जो सम सामयिक स्वस्थ पहलूं हैं उनका सहरा ले के इस बाजारू संस्कृति से टक्कर ले के नई संस्कृति, नए इंसान (औरत पुरुष दोनों) की, एक समतावादी, न्यायपूर्ण समाज की रचना ही हमें इस घालमेल के हमले से बचा सकती है।
फिर शाका ये है कि इतनी गंभीर बातों पर सोच विचार कौन करे? एक बात और याद रखने की है कि ये घालमेल संस्कृति वाले आने वाले दौर में महिलाओं पर अपणा हमला तेज करेंगे। हो सकता है ये तालिबान और इराक की तरह फतवे भी जारी करदें कि हमारी संस्कृति को खतरा है, महिलाओं की घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए, सिर पर चुन्नी जरूर होनी चाहिए और हम भी तुरत फुरत इनकी साथ हो लेंगे कि बात इनकी सौलां आने सही।
फेर अफगानिस्तान में, पाकिस्तान में और इरान में क्या हुआ इसका हमको पता नहीं। इस घालमेल संस्कृति के मुकाबले में या फासीवादी संस्कृति हमको कहीं का नहीं छोड़ेगी और फेर हम कहवांगे ओहले हमको क्या पता था न्यों बण जायेगी?
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