स्टेटस: पढ़िए ज़रा संभलकर…

स्टेटस: पढ़िए ज़रा संभलकर…

क्योंकि हर स्टेटस की अपनी कहानी होती है, लेकिन हर पाठक उसमें अपनी कहानी खोज लेता है।

डॉ रीटा अरोड़ा

“देखा उसका स्टेटस?”
चाय की पहली चुस्की लेते ही शर्मा जी ने पूछा।
मैंने मोबाइल निकाला। स्टेटस पर सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी-
“कुछ लोग कभी नहीं बदलते…”
मैंने सहजता से पूछा, “किसके लिए लिखा होगा?”
शर्मा जी मुस्कुराए, “अब देखना मज़ा।”
शाम तक मोहल्ले में चार लोगों ने अपने-अपने हिसाब से उसका अर्थ निकाल लिया था।
एक को लगा, बात उसके बारे में है।
दूसरे ने पत्नी से कहा, “लगता है अभी तक मुझसे नाराज़ है।”
तीसरे ने बिना वजह फोन करके सफाई दे दी।
और चौथे ने तो जवाब में अपना ही स्टेटस लगा दिया-
“समय सबका हिसाब करता है।”

असल बात दो दिन बाद पता चली।
जिस युवक ने पहला स्टेटस लगाया था, वह अपने पुराने स्कूटर को लेकर परेशान था। चार बार गैराज गया, फिर भी हर सुबह धोखा दे देता था।
उसने हँसते हुए कहा, “मैं तो स्कूटर की बात कर रहा था।”
सुनने वाले भी हँस पड़े।

लेकिन शायद सबसे ज़्यादा हँसी उस स्टेटस पर आई, जिसने कुछ कहा नहीं था… फिर भी सबको बहुत कुछ सुनाई दे गया।
यहीं से एक बात समझ में आई।

आजकल स्टेटस लिखना आसान है, लेकिन उसे पढ़ना कठिन।
क्योंकि हम शब्द कम पढ़ते हैं, अपने मन की आवाज़ ज़्यादा पढ़ते हैं।

जिसके मन में अपराधबोध है, उसे हर स्टेटस ताना लगता है।
जो प्रेम में है, उसे हर गीत अपने लिए लिखा हुआ लगता है।
जो दुखी है, उसे हर पंक्ति अपनी कहानी जैसी लगती है।
और जो खुश है, वह शायद स्टेटस पढ़कर आगे बढ़ जाता है।

कभी आपने ध्यान दिया है?
एक ही स्टेटस…
और उसके सौ अर्थ।

स्टेटस लगाने वाला एक होता है।
कहानी पढ़ने वाले कई।
और हर पाठक अपने जीवन का एक पात्र उसमें खोज लेता है।
यही कारण है कि आजकल लोग स्टेटस कम, प्रतिक्रियाएँ ज़्यादा देखते हैं।

किसने देखा?
किसने जवाब दिया?
किसने कुछ नहीं कहा?
किसने अपना नया स्टेटस लगा दिया?

शब्दों से ज़्यादा उनकी परछाइयाँ पढ़ी जाने लगी हैं। दिलचस्प बात यह है कि पहले लोग डायरी लिखते थे। उसमें मन की बातें होती थीं। कोई दूसरा पढ़ ले, तो शर्मिंदगी होती थी।
आज लोग वही मन की बातें स्टेटस पर लिखते हैं। फिर इंतज़ार करते हैं कि कौन पढ़ता है।
समय बदल गया है।

लेकिन इंसान शायद उतना नहीं बदला। उसे आज भी समझे जाने की इच्छा है। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि

पहले वह किसी एक अपने का इंतज़ार करता था।
अब पूरी कॉन्टैक्ट लिस्ट का।

अगली बार जब किसी का स्टेटस पढ़िए…
तो ज़रा ठहरिए।

हो सकता है वह आपके बारे में बिल्कुल न हो। और अगर आपको लगे कि वही आपके लिए लिखा गया है…

तो शायद कहानी स्टेटस की नहीं, आपके मन की हो।

 डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल।

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