(जनवादी कवि ओमसिंह अशफ़ाक की एक लोकप्रिय कविता है ‘जब इंसाफ कहीं ना होता हो'(अन्याय गाथा)। उक्त कविता के कुछ बंध प्रसंगवश कुछ लेखों में हमारे पाठकों तक पहुंचे तो कुछ ने पूरी कविता पढ़ने की जिज्ञासा प्रकट की है। पाठकों की सुविधा के लिए शेष बंध भी यहां किस्तों में दिए जा रहे हैं ताकि पाठक देख सकें कि उस वक्त के हालात और आज के हालात में कितनी आश्चर्यजनक समानता है! फिर सरकारों के बदलने से आख़िर क्या बदला है? शायद इस कविता से यह प्रमुख प्रश्न भी पाठकों के मन में उपजता है-संपादक)
समय के सामने कवि और कविता-3
ओमसिंह अशफ़ाक
कविता: जब इंसाफ कहीं ना होता हो
1.
लुच्चे और लफंगे भी जब,
शिक्षण-पेशे में आण लगें !
तब हों दुर्जनपुर’, चुड़ियाला़’,
कहीं ढराणा’, कहीं साद्देवाला़’ !
और कई भी अनकहणी-
छछरौली और मात्तोभैणी-
यूं जननी उनकी पछताण लगें !
अपवाद-मात्र की बात नहीं,
शिक्षक-समाज कलंकित हो !
मरजाद गुरु की भंग होजा,
फिर सारा देश आशंकित हो !
भई ! दिन बरजण के आन पड़े !
2.
जब जीवन का सार सूखता हो ।
और सारा ही जिस्म दूखता हो ।
दिखने में सबकुछ चौख़्खा हो !
बस नज़रों का ये धोख्खा़ हो ।
ना बचने का फिर मौक्क़ा हो ।
जब बाड़ खेत को खाने लगै !
जब सूदखोर धमकाने लगै !
नीच्चै रेल के बूढ्ढ़ा जाने लगै ?
भई! दिन बरजण के आन पड़े !
3.
जब चौतरफा अमरीका हो !
जीने का कौन सलीका हो ?
फिर गुड़ का स्वाद तो फीक्का हो !
नां शादी-ब्याह, ना टीक्का हो !
जब भरतू संग ना भीक्का हो !
क्यूं अचरज का रोज उड़ीका’ हो?
भई। दिन बरजण के आन पड़े !
4.
जब मन्दिर-मस्जिद पे पंगा हो !
तब दरगाह ऊपर दंगा हो !
न्यू राज गोधरा में नंगा हो !
फिर चौण’ नतीजा चंगा हो ?
नाले़ में बहती गंगा हो ?
मन भगतों का बहोत उमंगा हो !
भई ! दिन बरजण के आन पड़े !
(शेष शीघ्र अगली किस्त में)
(दिसंबर, 2006)
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नंबर-1 बंध में 1 से 6 तक उन गांवों के नाम जहां से स्कूली छात्राओं के यौन-उत्पीड़न की घटनाओं की शिकायते हुई थीं।
नंबर-3 और 4 बंध में :
1.इंतजार (पंजाबी भाषा)
2.चुनाव (पंजाबी भाषा)
