हिंदी आत्मकथा : स्वरूप एवं परंपरा’ पुस्तक का विमोचन
आत्मकथा लेखन जोखिम भरा काम होता है : डॉ बजरंग बिहारी
जोधपुर । अंतर प्रांतीय कुमार साहित्य परिषद के तत्वावधान में गांधी भवन में 5 जुलाई को प्रातः डॉ. सम्पत राज सेन द्वारा लिखित पुस्तक ‘हिंदी आत्मकथा : स्वरूप एवं परंपरा’ का विमोचन हुआ ।
भारत में पहली मुकम्मल आत्मकथा के रूप में सत्रहवीं सदी के बनारसीदास जैन की आत्मकथा *अर्धकथानक* की चर्चा करते हुए बतौर मुख्य अतिथि हिन्दी के जाने माने आलोचक बजरंग बिहारी ने कहा कि आत्मकथा लेखन की पहल सातवीं सदी के महान गद्यकार बाणभट्ट ने हर्षचरित लिखकर की थी।
आत्मकथा लेखन जोखिम भरा काम होता है। गोस्वामी तुलसीदास आत्मकथात्मक संदर्भ देने के कारण ही हमले की ज़द में आ गए थे। आधुनिक काल में मराठी के आत्मकथाकार लक्ष्मण गायकवाड़ को उनकी आत्मकथा *उचक्का* के कारण उनके कुनबे ने उन्हें घेर लिया है।
आत्मकथा लेखन का परिणाम आत्मविस्तार है। इसके साथ यह विधा आत्मपरिष्कार भी संभव करती है। दलित लेखकों की आत्मकथा के संदर्भ में डॉ. तिवारी ने बताया कि अनुभव, आक्रोश और अधिकारबोध दलित आत्मकथाओं का प्राण तत्व है। अनुभव का संबंध रोज़मर्रा की बहुपरतीय हिंसा से है, आक्रोश का संबंध व्यवस्थागत चिंतन से है तथा अधिकार-बोध संवैधानिक मूलाधिकारों से जुड़ा है।
परिषद की अध्यक्ष गीता भट्टाचार्य एवं महामंत्री डॉ पद्मजा शर्मा ने बताया कि कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आलोचक डॉ कौशलनाथ उपाध्याय ने कहा कि -आत्मकथा एक सृजनात्मक विधा है । इसके तीन महत्त्वपूर्ण पक्ष होते हैं । इसका एक समाजशास्त्रीय पक्ष होता है इसलिये इसमें स्मृति, अनुभूति और संवेदना का समावेश होता है । इसके कुछ मनोवैज्ञानिक पहलू भी होते हैं जिसमें लेखक और उसके समय एवं समाज की विभिन्न स्थितियाँ – परिस्थितियाँ होती हैं । एक मनोवैज्ञानिक पक्ष होता है जिसमें ईमानदारी,तटस्थता और सत्यान्वेषण को स्थान मिलता है ।
सारस्वत अतिथि के रूप में वक्तव्य देते हुए आलोचक प्रोफेसर किशोरीलाल रैगर नेआत्मकथा की सैद्धांतिकी को स्पष्ट करते हुए इसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की चर्चा की तथा कहा कि दलित व स्त्री लेखकों की आत्मकथाएं समाज की विद्रूपताओं का पर्दाफाश करती हैं।ये आत्मकथाएं ऐसा दस्तावेज हैं जो संवेदनशील व्यक्तित को झकझोर देती हैं ।
विशिष्ट अतिथि डॉ विकास नौटियाल ने कहा – सत्य को जानना एक वैज्ञानिक प्रयास होता है जिसमें महात्मा गांधी का नाम अनुकरणीय है। आत्मकथा लेखन केवल घटनाओं का लेखन नहीं है, आत्मकथा व्यक्ति के दृष्टिकोण का भी आधार है। आत्मकथा लेखन की कोई उम्र नहीं होती जिसका उदाहरण एनी फ्रेंक है। गांधी जी ने सत्य के साथ मेरे प्रयोग लिखी, वैसा ही एक सत्य हम सभी में होता है।
विमोचित पुस्तक के लेखक डॉ संपत राज सेन ने पुस्तक की रचना प्रक्रिया और हिंदी आत्मकथा साहित्य की परंपरा, उसके विकास, स्वरूप तथा विभिन्न आयामों पर अपने विचार रखे । और कहा कि अपने जीवन संघर्ष के दिनों में मैने कई महान लोगों की आत्मकथाएं पढ़ी और उन आत्मकथाओं ने मुझे प्रेरणा दी, इसी सिलसिले को आगे बढ़ा कर पी एच डी की डिग्री हासिल की। यही क्रम आगे चल कर एक पुस्तक के रूप में आपके सामने है जिसमें मैंने विभिन्न आत्मकथाओं की आलोचनात्मक व्याख्या की है।
कार्यक्रम का संचालन मधुर परिहार ने किया ।डॉ पद्मजा शर्मा ने अतिथियों और आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापन किया ।
इससे पूर्व अतिथियों का स्वागत कल्याण विश्नोई ने किया तथा अतिथियों का साफा पहनाकर स्वागत किया गया । समारोह में शहर के साहित्यकारों, प्रबुद्ध नागरिकों और विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने बड़ी संख्या में सहभागिता कर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई ।
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