हम स्त्रियाँ और दिवाली की सफ़ाई : कबाड़ घर का या सोच का?

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हम स्त्रियाँ और दिवाली की सफ़ाई : कबाड़ घर का या सोच का?

  • जो स्त्री सालभर घर की हर चीज़ सँभालती है, दिवाली पर उसी से पूछा जाता है – इतना कबाड़ जमा क्यों किया?

 

डॉ. रीटा अरोड़ा

“सुनो, इस दिवाली घर का सारा कबाड़ निकाल देना। हर अलमारी ठूँस रखी है तुमने!” पति ने अख़बार से नज़र हटाए बिना कहा।

पत्नी पुराने कपड़ों की तह लगाते हुए बोली, “कबाड़? कौन-सा?”

“वही पुराने डिब्बे, खाली बोतलें और तुम्हारी बरसों पुरानी साड़ियाँ। आखिर कब तक सँभालकर रखोगी?”

पत्नी के हाथ एक साड़ी पर आकर रुक गए।

“यह माँ ने मेरी विदाई पर दी थी।”

“तो क्या हुआ? अब पहनती तो हो नहीं। हर पुरानी चीज़ से भावनाएँ जोड़ोगी तो घर कैसे साफ होगा?”

पत्नी ने साड़ी की तह धीरे से बंद कर दी।

“अच्छा, तुम्हारे पिताजी की पुरानी घड़ी भी तो रखी है। वह भी अब चलती नहीं।”

पति ने तुरंत अख़बार नीचे रखा।

“उसकी बात अलग है। वह पिताजी की आखिरी निशानी है!”

पत्नी कुछ क्षण उन्हें देखती रही।

“समझ गई… तुम्हारी पुरानी चीज़ें यादें हैं और मेरी पुरानी चीज़ें कबाड़!”

तभी बेटी कमरे में आई।

“मम्मी, दिवाली की सफ़ाई शुरू हो गई?”

माँ मुस्कुराईं, “हाँ बेटा, आज घर की चीज़ों के साथ उनकी कीमत भी तय हो रही है।”

बेटी ने माँ के हाथ में रखी साड़ी देखी।

“पापा, दादाजी की याद आपकी घड़ी में रहती है, तो नानी की याद मम्मी की साड़ी में क्यों नहीं रह सकती?”

कमरे में खामोशी छा गई।

दिवाली की सफ़ाई अभी शुरू भी नहीं हुई थी, लेकिन घर में बरसों से जमा एक पुरानी सोच की धूल ज़रूर दिखाई देने लगी थी।

दिवाली आते ही भारतीय घरों में सफ़ाई का ऐसा अभियान शुरू होता है, मानो पूरे वर्ष की अव्यवस्था का हिसाब एक ही सप्ताह में चुकाना हो। अलमारियाँ खुलती हैं, संदूक बाहर आते हैं और उन कोनों तक झाड़ू पहुँचती है, जिनसे सालभर किसी की मुलाकात नहीं हुई होती।

लेकिन इस अभियान की सबसे दिलचस्प पात्र होती है घर की स्त्री, जो सालभर चीज़ें सँभालती है और दिवाली पर उन्हीं चीज़ों को निकालने की जिम्मेदारी भी निभाती है।

हम स्त्रियों का अपना घरेलू अर्थशास्त्र है। पुराने ब्लाउज़ के हुक निकाल लेना, टूटे बटन सँभालना, आइसक्रीम के डिब्बे में चटनी रखना और पॉलिथीन के भीतर पॉलिथीन जमा करना। शादी के निमंत्रण पत्र से गणेशजी की तस्वीर अलग करना भी इसी संग्रहालय का हिस्सा है।

मज़ेदार बात यह है कि आज दुनिया जिस रीयूज़, रीसाइक्लिंग और सर्कुलर इकोनॉमी की चर्चा करती है, उसका व्यावहारिक रूप हमारी माताएँ और दादियाँ वर्षों से अपनाती आई हैं।

पुरानी साड़ी से रजाई, पति की जीन्स से थैला और खाली बोतल से गमला बनाना उनके लिए पर्यावरण संरक्षण का कोई अभियान नहीं, घर चलाने की सहज समझ थी।

हाँ, अंतर इतना है कि आधुनिक भाषा में इसे पर्यावरण संरक्षण कहते हैं और घर में सुनने को मिलता है, “कितना कबाड़ जमा कर रखा है!”

स्त्रियों की बचत का गणित भी निराला है। सब्ज़ीवाले से मुफ्त धनिया-मिर्च लेना उपलब्धि है। दस रुपये बचाने के लिए पाँच मिनट बहस हो सकती है। लेकिन बच्चों के जूते खरीदते समय कहेंगी, “अच्छे वाले लेना, जल्दी खराब नहीं होने चाहिए।”

पति की महँगी शर्ट गुणवत्ता का सवाल है, अपनी महँगी साड़ी बजट का!

यह केवल मज़ाक नहीं, हमारे सामाजिक संस्कारों की सच्चाई भी है। कई घरों में स्त्री को बचपन से सिखाया जाता है कि अच्छी गृहिणी वही है, जो कम साधनों में अधिक काम चला ले।

लेकिन दिवाली की सफ़ाई इस घरेलू अर्थशास्त्र का दूसरा पहलू भी सामने लाती है।

“इतने डिब्बे क्यों रखे हैं?”

“कभी काम आ जाएँगे।”

“और ये पुराने कपड़े?”

“इनसे कुछ बन जाएगा।”

“तो ये शादी के कार्ड?”

“इनमें भगवान की तस्वीरें हैं!”

परिवार परेशान हो जाता है कि आखिर क्या फेंकें!

विडंबना यह है कि जिस स्त्री ने कम साधनों में घर चलाना सीखा, उसी से अपेक्षा की जाती है कि वह बिना भावनाओं के सब कुछ बाहर निकाल दे।

निश्चित ही हर पुरानी वस्तु उपयोगी नहीं होती। अनावश्यक सामान हटाना और घर को व्यवस्थित रखना भी जरूरी है। लेकिन असली सवाल सामान का नहीं, उसे सँभालने और हटाने की जिम्मेदारी का है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के समय उपयोग सर्वेक्षण 2024 के अनुसार, भारत में 15 से 59 वर्ष की लगभग 92 प्रतिशत महिलाएँ अवैतनिक घरेलू सेवाओं में भाग लेती थीं, जबकि पुरुषों में यह अनुपात लगभग 30 प्रतिशत था।

ये आँकड़े बताते हैं कि घरेलू कामों का बँटवारा आज भी कितना असमान है। दिवाली पर यही असमानता कुछ और स्पष्ट दिखाई देती है।

पर्दे कौन उतारेगा? अलमारियाँ कौन खाली करेगा? रसोई की सफ़ाई, बर्तनों की छँटाई और फिर सब कुछ वापस जमाने का काम कौन करेगा?

अक्सर परिवार के बाकी सदस्य सलाहकार बन जाते हैं और स्त्री पूरे अभियान की प्रबंधक!

और यदि सफ़ाई में कोई जरूरी कागज़ गलती से निकल जाए, तो सवाल भी उसी से पूछा जाता है – “तुमने फेंक क्यों दिया?”

कमाल है! सामान रखने की जिम्मेदारी भी उसकी, निकालने की जिम्मेदारी भी उसकी और गलती का हिसाब भी उसी से!

दिवाली की सफ़ाई का एक भावनात्मक पक्ष भी है।

किसी संदूक से बच्चे की पहली स्कूल यूनिफॉर्म निकल आती है। किसी साड़ी के साथ माँ की याद जुड़ी होती है। पुराने कार्ड में किसी ऐसे व्यक्ति के हस्ताक्षर मिल जाते हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं है।

दूसरों को ये वस्तुएँ बेकार लग सकती हैं, लेकिन स्त्री के लिए वे जीवन के बीते हुए पन्ने होती हैं।

इसीलिए कभी-कभी सफ़ाई करते हुए उसके हाथ रुक जाते हैं। वह कपड़ों की धूल झाड़ने बैठी थी, लेकिन यादों की परतें भी खुलने लगती हैं।

फिर भी दिवाली केवल पुराने सामान से छुटकारा पाने का नहीं, पुरानी आदतों को बदलने का भी अवसर है।

क्यों न इस बार सफ़ाई पूरे परिवार की जिम्मेदारी बने? बच्चे अपनी अलमारियाँ सँभालें, पति अपने सामान की छँटाई करें और सभी मिलकर तय करें कि क्या रखना है, क्या दान करना है और क्या पुनर्चक्रण के लिए देना है।

आखिर घर सबका है, तो उसकी देखभाल भी सबकी होनी चाहिए।

और एक बात और।

दिवाली के दिन जब सब नए कपड़े पहनकर तस्वीरें खिंचवा रहे होते हैं, तब कई घरों में वही स्त्री आखिरी बर्तन धो रही होती है या रसोई समेट रही होती है।

जिसके श्रम से घर में त्योहार आता है, कहीं वही त्योहार उसके हिस्से में सबसे कम तो नहीं आता?

फंडा यह है कि दिवाली की सफ़ाई में केवल पुराने डिब्बे, कपड़े और बेकार वस्तुएँ ही बाहर न निकालें। उस सोच को भी बाहर का रास्ता दिखाएँ, जिसमें घर सँभालना केवल स्त्री का कर्तव्य माना जाता है।

और हाँ, अगली बार पति पूछें, “इतना कबाड़ क्यों जमा कर रखा है?” तो पत्नी मुस्कुराकर कह सकती है –

“कबाड़ तो निकाल दूँगी, लेकिन पहले यह बताइए, घर की सफ़ाई में आपका हिस्सा किस अलमारी में रखा है?”

क्योंकि दिवाली की असली रोशनी केवल चमकते घर में नहीं, उस घर के हर सदस्य के चेहरे पर दिखाई देनी चाहिए।

और शायद इस बार सबसे सुंदर दिवाली वही होगी, जब घर की स्त्री भी सफ़ाई पूरी होने के बाद थककर नहीं, मुस्कुराकर दीपक जलाएगी।

 

डॉ. रीटा अरोड़ा,सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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