का भाखा का संस्कृत प्रेम चाहिए सांच
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हिंदी साहित्य परिषद, हिंदी विभाग देशबंधु महाविद्यालय में संत कवियों की भाषा पर संगोष्ठी का आयोजन
हिंदी साहित्य परिषद, हिंदी विभाग देशबंधु महाविद्यालय द्वारा दिनांक 15/9/2026 को ‘संत कवियों की भाषा’विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर नीरज कुमार ने की और प्रमुख वक्ता के तौर पूर्णिया विश्वविद्यालय से डॉ. वंदना भारती शामिल थीं। कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर बजरंग बिहारी तिवारी ने किया ।

कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों द्वारा भित्ति पत्रिका के लोकार्पण से हुई।उसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलगीत का गायन हुआ। तत्पश्चात् आंतरिक गुणवत्ता एवं आश्वासन प्रकोष्ठ के संयोजक प्रोफेसर आनंद कुमार ने कार्यक्रम हेतु शुभकामना वक्तव्य दिया। आनंद ने हिंदी को हमारे धर्म तथा आचरण के रूप व्याख्यायित किया । उनकी निगाह में हिंदी का आजीवन व्यवहार होना चाहिए। हिंदी के विकास हेतु AI (कृत्रिम मेधा) की सहायता पर आनंद ने जोर दिया। उनका कहना था कि मंत्रालय से आयी हुई हिंदी संबंधी चीजों में गति और प्रवाह नहीं होता।
कार्यक्रम की अगली कड़ी में तृतीय वर्ष की छात्रा रूख़सार ने प्रो. नीरज कुमारका तथा प्रथम वर्ष के छात्र अक्षत शर्मा ने डॉ. वंदना भारती का श्रोताओं से परिचय कराया। कार्यक्रम में मंगलाचरण के तौर पर हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर ललित मोहन ने अपनी लयबद्ध आवाज में कबीर के दो पदों (ई माया रघुनाथ की बौरी, हिरना समझ बूझ बन चरना) का बेहतरीन गायन किया ।
संचालन करते हुए बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि संविधान सभा में किसी भी भाषा को लेकर प्रतिस्पर्धा की बात नहीं थी, अपितु भाषाई सहयोग की बात थी।
उन्होंने कहा कि संतों की भाषा लोकतांत्रिक और समझ में आने वाली भाषा है। उसके लिए किसी भी तरह के अनुवाद की जरूरत नहीं। वर्तमान दौर उत्तर सत्य और एल्गोरिदम का है जहां सब कुछ थोथा ही थोथा है सार का कहीं पता नहीं । लोग मूल से लगातार कट रहे हैं। हमें झूठ से पार पाने के लिए संतों के पास जाना होगा । वर्तमान समय संकटग्रस्त समय है जिससे मुक्ति के लिए हमें संतों के पास जाना होगा। कबीर आदि संतों की भाषा को पंचमेल खिचड़ी कहा गया । यह सम्मान सूचक नहीं था जैसे कि अपभ्रंश, वर्नाक्यूलर आदि शब्द भी हीनता बोधक हैं।

पंचमेल खिचड़ी कहने वाले विद्वान इस बात को भूल जाते हैं कि पंचमेल दरअसल पौष्टिकता का सूचक है । उसमें पोषण पैबस्त है । राहुल जी इसी को देशभाषा और विद्यापति देसिल बयना कहते हैं । तुलसीदास भी भाखा में ही प्रबोधन करते हैं। वस्तुत: भाखा में प्रबोधन करना इंलाइटमेंट का सूचक है । भिखारी दास का मानना था कि बड़ा कवि वही हो सकता जो कई भाषाओं का जानकार हो। चंदबरदाई ६ भाषाओं के जानकार थे। वेदांग मे कहा गया है कि आदिशक्ति ने पहले प्राकृत फिर संस्कृत में स्वयं को व्यक्त किया। भाषा पर चिंतन करने वाले संत रज्जब अली कहते हैं कि संस्कृत काया है और लोकभाषा प्राण । महामति प्राणनाथ अनेक भाषाओं के जानकार थे । लेकिन उन्होंने जनता से बात करने के लिए हिंदुस्तानी का पक्ष रखा । उन्होंने दो पुस्तिकाएँ लिखीं कलश गुजराती और कलश हिंदुस्तानी। गांधी जी ने यहीं से हिंदुस्तानी को उठा लिया था। हिंदुस्तानी में शुद्धता का आग्रह नहीं है।
कार्यक्रम की प्रमुख वक्ता वंदना ने कहा कि संत कवियों ने भाषा के आभिजात्य (एलीटनेस) को तोड़ा और जनभाषा में आम ल़ोग को जानकारी दी। लेखन के लिए संत कवि असल मायनों में प्रेरणास्रोत की तरह हैं। उनकी भाषा में एक खास तरह का अक्खड़पन है । यह अक्खड़पन वस्तुतः वाद-विवाद की स्थिति का द्योतक है । संत कवियों की सामाजिक नेटवर्किंग बहुत ही मजबूत थी। उनके भीतर एक समुदाय की भावना काम कर रही थी। संत सामुदायिक भावना के साथ चलते हैं जबकि सगुण कवियों के यहां वैयक्तिकता अधिक है ।
संत कवियों की भाषा में हाशिये के समाज की चेतना है । संत कवियों का सरोकार व्यापक था इसलिए आज का दलित साहित्य संत साहित्य से प्रेरणा लेता है। पुरुषोत्तम अग्रवाल का हवाला देते हुए वंदना ने कहा कि अग्रवाल इसे देशज आधुनिकता की संज्ञा देते हैं। मध्यकाल में यह टकराव था कि पंचमेल बनाम सुसंस्कृत भाषा। लिंडा हेस्स इसे ही रफ रिटोरिक कहती हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने कबीर को भाषा का डिक्टेटर कहा । संतों की भाषा असहमति की भाषा है । जिसमें अन्य लोगों दर्द बयां हुआ है । संतों के यहां बहुभाषिकता का सवाल है और यह ज्ञान के सहारे चलती है । ज्ञान पर जोर अधिक है संत साहित्य में।
संचालक ने कहा कि भाषा गर्व करने की चीज नहीं है। वह तो एक साधन मात्र है। संत साहित्य में रूप पर जोर कम और विषयवस्तु पर जोर अधिक है । संत साहित्य के कथ्य के मूल में प्रेम है। इसके लिए उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास को उद्धृत किया-
का भाखा का संस्कृत प्रेम चाहिए सांच।
काम जो आवे कामरी का ले करिये कमांच ॥
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर नीरज ने कहा कि संतों की भाषा में कंबल और रेशम का द्वंद्व है । संत लोग ज्ञान का सामाजिक एवं सार्वजनिक रूप पेश करना चाहते थे । प्रेम की गली संकरी है तथा ज्ञान की और भी संकरी। सच्ची कविता ही अच्छी कविता होगी । सच्ची कविता उसे कहा जा सकता है जो संबद्ध, आबद्ध और प्रतिबद्ध हो । सच्ची कविता का स्वरूप कैसा होगा इसे संतों ने बताया है । सच्ची कविता व्याकरण की मोहताज नहीं होती वह तो अंत:करण से उद्भूत होती है । हम अपनी सुविधा के लिए इस अंतःकरण की भाषा का नामकरण करते हैं।
1933 में पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने निर्गुण संतों पर पहली किताब अंग्रेजी में लिखी। 1950 में परशुराम चतुर्वेदी ने इसका हिंदी में अनुवाद किया और संतों की भाषा पर भाषाई भद्देपन का आरोप लगाया। संतों की भाषा रागात्मक है और यह रागात्मकता अनुरणन पैदा करती है। भाषा को लेकर संतों के यहां बहुत चिंता मिलती नहीं है। उनका मानना था कि भाषा अंतःकरण को उद्घाटित करने का जरिया मात्र है । प्रेम, आसक्ति, अनुरोध तथा प्रतिरोध का पहला स्वर संतों के यहां प्राप्त होता है । भाषा का निर्धारण वैयाकरण करते हैं परन्तु जीवन का निर्धारण कौन करता है? जीवन की जकड़बंदी से कौन निजात दिलायेगा? संतों की कविता जीवन की कविता है । उनके यहाँ भक्ति शिल्प है वस्तु जीवन है ।
नीरज ने आगे कहा कि संतई अर्जित करनी पड़ती है । आज के समय में जीवन खत्म हो रहा है । इसलिए हमें संत़ों के वाचिक परंपरा की ओर लौटना होगा । वाचिकता जीवन के अधिक निकट है । जीवन आंखन देखी से चलती है कागद लेखी से नहीं। संत कविता इसी जीवन की पैरोकारी करती है जिसमें सबके हित की बात शामिल हो । दादू कहते हैं-
संतन के मन रहत है सबके हित की बात।
घट घट देखें अलख को पूछे जात न पात॥
मीरा, आंडाल, राबिया, लल्ल दद्द आदि जितने भी संत कवयित्रियां हुईं सबने वर्चस्व को हटाकर अनुभव को प्लेस कर दिया है । भाषा भाव का आवरण है, पैरहन है । संत इस समझ तक पहुंचे थे। उन्होंने इंसान को देखने का नजरिया दिया है । संतों के पीछे एक पूरी परंपरा खड़ी है। जिसमें नाथ, सिद्ध, वज्रयान, हीनयान आदि शामिल हैं। हिंदी के पाठकों की दिक्कत यह है कि हम संत साहित्य को ऊपर से देखते हैं और उसमें सिद्धांत मिला देते हैं, जिससे सहजता खत्म हो जाती है।
संतों की नेटवर्किंग तो थी परन्तु वह कामर्शियल न होकर दूसरे तरह की थी । संत कविता आपके मन में हलचल मचा देती है जिससे आपके भीतर बात कहने कि ताकत आ जाती है । भीतर की ताकत से ही सच कहा जाता है । संतों की बानियों में जटिलता नहीं है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसमें जीवन के प्रति प्रतिबद्धता कम हो जाती है । इसी क्रम में नीरज ने बेबी कांबले की आत्मकथा‘आमचा जीवन’ का जिक्र किया और कहा कि संत कविता से दलित साहित्य प्रेरणा प्राप्त करता है ।
नीरज का कहना था कि कबीर को भाषा का डिक्टेटर कहा था हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने । यह एक प्रकार से अच्छा ही है दूसरे शब्दों में यह डिक्टेटरशिप ऑफ प्रालिटेरियट है । भाषा ध्वनि प्रतीकों का यादृच्छिक समूह है । यादृच्छिक का मतलब ही होता है- इच्छानुसार। संतों की भाषा में टीस अधिक है इसलिए भाषा कहीं-कहीं बहुत खुरदरी हो जाती है ।आज चारों ओर मन की बात पर चर्चा हो रही लेकिन मन के दुख पर नहीं। ऐसे में संतों को याद करना स्वाभाविक ही है । आज का समय उत्तर सत्य का समय है जहां सत्य का क्षय हो गया है और चारों ओर भय का माहौल है ऐसे समय में संतों केअनभै सांचा तथा अनुभौ सांचा से हमें साहस प्राप्त होता है ।
विभाग के साथी प्रोफेसर छोटूराम ने मीरा से संबंधित एक लोकाख्यान सुनाया । हिंदी साहित्य परिषद के संयोजक डॉ. राकेश कुमार सिंह ने कार्यक्रम से संबंधित विभिन्न समितियों के सदस्यों का नामोल्लेख करते हुए धन्यवाद दिया । विभाग प्रभारी प्रोफेसर अनुज कुमार रावत ने औपचारिक रूप से सभी का धन्यवाद किया । कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान से हुआ।
कार्यक्रम में हिंदी विभाग, देशबंधु कालेज के सभी अध्यापक प्रो. संजीव कुमार, श्री विभास चंद्र वर्मा, डॉ. प्रेम प्रकाश शर्मा, डॉ. नविता चौधरी, डॉ. सीमा कुमारी, डॉ. नरेंद्र कुमार,डॉ. कल्पना शर्मा,डॉ. शिवदत्त,डॉ. भारती अग्रवाल,डॉ. आदित्य चतुर्वेदी,डॉ. प्रीति सदानंद तिवारी, गीतांजलि सिंह,राहुल पाण्डेय तथा तीनों वर्षों के छात्र एवं छात्राएं मौजूद थे ।
साथ ही जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली विश्वविद्यालय, चंपारण विश्वविद्यालय के शोधकर्ता भी उपस्थित थे । कालेज के अन्य विभागों के अध्यापकों के अलावा अन्य महाविद्यालयों के अध्यापक भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए।
