किताब की मोटाई और सच की रीढ़

लेखकीय कसौटी

किताब की मोटाई और सच की रीढ़

रत्ना भदौरिया

 

साहित्य में एक अजीब समय आ गया है। अब लेखक की पहचान उसकी आवाज़ से कम और उसके परिचय से अधिक होने लगी है। कितनी किताबें हैं, कितने विमोचन हुए, किन मंचों पर बुलाया गया, किन पुरस्कारों की सूची में नाम आया—जैसे लेखकीय गरिमा का हिसाब शब्दों से नहीं, उपलब्धियों की फेहरिस्त से लगाया जाने लगा हो।

कुछ लोग मोटी-मोटी किताबें लिखते हैं और फिर उन किताबों को अपनी प्रतिष्ठा की ऊँची दीवारों में चुनवा देते हैं। उनकी भाषा परिष्कृत होती है, संदर्भ भारी होते हैं, परिचय लम्बा होता है; लेकिन उसी अनुपात में उनके भीतर का प्रतिरोध छोटा होता जाता है। वे समय की विसंगतियों को देखते हैं, मगर उन पर बोलने से पहले पुरस्कारों की दिशा देख लेते हैं। वे सत्ता की भाषा समझते हैं, उसकी चुप्पियों को पहचानते हैं, लेकिन अपनी कलम को उन चुप्पियों के भीतर ही सुरक्षित रखते हैं।

ऐसे में सवाल उठता है—क्या साहित्य का आकार उसके पन्नों से तय होगा या उस सच से, जिसे लिखते हुए लेखक को अपने लिए कोई असुविधा स्वीकार करनी पड़ी?

जो लेखक सोशल मीडिया पर लिखता है, उसे बड़ी आसानी से ‘फेसबुकिया लेखक’ कहकर किनारे कर दिया जाता है। मानो फेसबुक पर लिखे शब्द अपने आप साहित्य से बाहर हो जाते हों और पुस्तक के पन्नों पर छपते ही शब्दों में कोई अतिरिक्त पवित्रता उतर आती हो।

लेकिन क्या सच भी प्रकाशक की मुहर देखकर सच होता है?

क्या अन्याय को पहचानने के लिए हार्डकवर किताब जरूरी है?

क्या सत्ता से सवाल पूछने के लिए किसी साहित्यिक संस्था की सदस्यता चाहिए?

और क्या किसी लेखक की संवेदना का प्रमाण उसके पास रखी पुस्तकों की संख्या है?

हो सकता है किसी फेसबुकिया लेखक के पास पुस्तकालय भरने लायक किताबें न हों, लेकिन उसके पास अपने समय की नब्ज पर उंगली रखने का साहस हो। हो सकता है उसकी भाषा हमेशा शास्त्रीय कसौटियों पर खरी न उतरती हो, लेकिन वह उस सच को कह देता हो जिसे कई स्थापित लेखक अपनी सुविधा के कारण निगल जाते हैं।

यहाँ प्रश्न सोशल मीडिया बनाम पुस्तक का नहीं है। प्रश्न ईमानदार लेखन बनाम प्रतिष्ठा-केन्द्रित लेखन का है।

क्योंकि साहित्य का सबसे बड़ा संकट भाषा का नहीं, रीढ़ का संकट है।

एक लेखक हजार पन्नों में समाज का इतिहास लिख सकता है और फिर भी अपने समय के एक जरूरी प्रश्न से बच सकता है। दूसरी ओर कोई अनाम व्यक्ति कुछ पंक्तियों में ऐसी बात कह सकता है जो हमारे भीतर वर्षों से जमा चुप्पी को चीर दे। तब तय कौन करेगा कि साहित्य कहाँ है—मोटी किताब में या उस बेचैन कर देने वाली पंक्ति में?

पुरस्कार बुरे नहीं हैं। सम्मान भी साहित्य की यात्रा का हिस्सा हो सकते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब पुरस्कार लेखन का परिणाम नहीं, लेखन की दिशा तय करने लगें। जब लेखक यह सोचकर लिखने लगे कि कौन-सा वाक्य उसे सम्मान के निकट ले जाएगा और कौन-सा प्रश्न उसे उससे दूर कर देगा, तब साहित्य धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र आत्मा खोने लगता है।

सत्ता से निकटता भी अपने आप में अपराध नहीं; लेकिन यदि निकटता के कारण कलम की धार कुंद हो जाए, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है। लेखक का काम किसी सत्ता का विरोध करना ही हो, ऐसा भी नहीं; उसका पहला दायित्व है—सत्ता, समाज और स्वयं अपने भीतर मौजूद असुविधाजनक सच से आँख न चुराना।

इसलिए उन लोगों से मेरा प्रश्न है जो किसी छोटे मंच, ब्लॉग या फेसबुक पर लिखने वाले को केवल इसलिए कमतर समझते हैं कि उसके नाम के आगे बड़ी साहित्यिक उपलब्धियों की सूची नहीं लगी—

क्या आपने उसकी पंक्तियाँ पढ़ी हैं, या केवल उसका मंच देखा है?

क्या आपने यह परखा कि उसकी बात में मनुष्य के दुख की कितनी आँच है?

क्या आपने यह देखा कि वह किस सच के साथ खड़ा है?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आप स्वयं वह सच लिखने का साहस रखते हैं, जिसके कारण आपको कोई पुरस्कार न मिले, कोई मंच न बुलाए, कोई सत्ता प्रसन्न न हो?

क्योंकि अंततः लेखक की असली परीक्षा उसके सम्मान-पत्रों के बीच नहीं, उसकी उस अकेली पंक्ति में होती है जिसे लिखते समय उसे मालूम था कि यह सच उसे अकेला कर सकता है।

मोटी किताबें स्मृति में रह सकती हैं, पुरस्कार इतिहास में दर्ज हो सकते हैं, लेकिन साहित्य वही बचाता है जिसमें मनुष्य के पक्ष में खड़े होने का साहस बचा रहे।

इसलिए किसी लेखक को ‘फेसबुकिया’ कहने से पहले अपनी कलम से पूछिए—
वह कहाँ छपती है, यह बड़ा प्रश्न है या वह कहाँ खड़ी होती है, यह?
और कहीं ऐसा तो नहीं कि हम साहित्य में पन्नों की मोटाई नापते-नापते सच की रीढ़ नापना ही भूल गए हैं।

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