कविता
अच्छे बुरे “वादों” से भरपूर दुनिया
मुनेश त्यागी
जातिवाद, क्षेत्रवाद, धर्मवाद से
बचाओ पूरे के पूरे समाज को,
बचाकर खुद को इन जहरीले “वादों” से
एकजुट करो फिर से सारे देश को।
शोषणवाद, मुनाफाखोरीवाद हिंसावाद से
बचाओ बीमार हो गए समाज को,
बचाकर मानव को सब जहरीले “वादों” से
बचाओ सारे के सारे मानववाद को।
रिश्वतवाद, रंजिशवाद, मनमानेवाद से
बचाओ पूरे के पूरे भारत देश को,
बचाकर इन जहरीले “वादों” से आदमी को
बचाओ सारे के सारे भाईचारावाद को।
भाई भतीजावाद, स्वार्थवाद, अन्यायवाद से
बचाओ पूरे के पूरे कानून के शासन को
बचाकर इन तमाम जहरों से मानवतावाद को
बचाओ सारे के सारे मानव समाज को।
छुआछूतवाद, भ्रष्टाचारवाद, अन्यायवाद से
बचाओ भारत के जख्मी संविधान को
बचाकर आदमियत को जहरीले “वादों” से
बनाओ रहने लायक पूरे समाज को।
पुत्रवाद, दहेजवाद घरेलूहिंसावाद से
बचाओ तो मानवता की जननी को,
बचाकर औरतों को इन तमाम अपराधों से
बनाओ हंसते-खिलते मानव समाज को।
पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, युद्धोन्माद से
बचाओ पुरी की पूरी दुनिया को,
बचाकर वैश्विक वर्चस्ववाद के महामारी से
सजाओ दुनिया को सर्व कल्याणकारीवाद से।
पूरी दुनिया ने देख लिया है अब तो
अमीरों के जनतंत्र विरोधी धनतंत्र को,
बुलंद कर दो जोरदार नारों से अब तो
सारी जनता के जिंदा जनवाद को।
समता, समानता, भाईचारे से भरपूर
सजाओ समाजवाद, साम्यवाद की ज्योत को,
बनाकर मेहनतकशों की सरकार को
ताकत से भर दो फिर से पूरे इंकलाब को।
