सिनेमा
पैट्रिक स्टीवर्टः भीतर के खौफ से ताउम्र संघर्ष
राहुल मिश्रा
लाखों मील दूर अंतरिक्ष यान का कप्तान। पर बचपन में दो ईंटों की आधी दीवार। और एक छोटा बच्चा, जो पिता का हाथ उठने से पहले मां के आगे खड़ा हो जाता था।
उसकी उम्र तब इतनी नहीं थी कि वह दुनिया की पेचीदगियां समझ सके। पर इतनी जरूर थी कि पिता की आवाज की तल्ख़ी सुनकर पहचान लेता था कि अब बिस्तर से कूदने का वक्त आ गया है।

कमरे के बीच में ईंटों का एक कच्चा पर्दा था। एक तरफ दो मासूम भाई सोते थे। दूसरी तरफ मां और पिता। उस आधी दीवार के पार से आने वाली सिसकियों और चीखों को दोनों भाइयों ने पूरी रात सुना था। और पूरे मोहल्ले ने भी।
बुधवार, अट्ठाईस अक्टूबर को लॉस एंजिल्स स्थित अपने घर में छियासी साल की उम्र में उस अभिनेता ने अपनी अंतिम सांस ली।
परिवार ने बताया कि वे लंबे समय से अल्जाइमर और लेवी बॉडी डिमेंशिया से जूझ रहे थे।
दुनिया उन्हें हॉलीवुड की ऐतिहासिक फिल्मों में ‘स्टार ट्रेक’ के कैप्टन जीन-ल्यूक पिकार्ड और ‘एक्स-मेन’ के प्रोफेसर चार्ल्स जेवियर के रूप में जानती है।
परदे पर जब वे बोलते थे, तो उनकी आवाज में एक ऐसा राजसी संयम और ठहराव होता था कि करोड़ों लोग मुरीद हो जाते थे।
उनका नाम था : पैट्रिक स्टीवर्ट।
लेकिन उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी जंग किसी अंतरिक्ष यान में नहीं लड़ी गई थी। यह एक ऐसे बच्चे की दास्तान है जिसने शोहरत के सबसे ऊंचे मुकाम पर पहुंचकर भी अपने भीतर के एक खौफ से ताउम्र लड़ाई लड़ी। उन्हें डर था कि जिस वहशी गुस्से को उन्होंने अपने पिता में देखा है, कहीं वे खुद भी बड़े होकर वही न बन जाएं।
अब शुरू से शुरू करते हैं…
तेरह जुलाई उन्नीस सौ चालीस। इंग्लैंड के वेस्ट यॉर्कशर का मिरफील्ड कस्बा।
कोयले की धूल और कपड़ा मिलों के बीच घिरी एक तंग बस्ती। पिता अल्फ्रेड स्टीवर्ट ब्रिटिश सेना में रेजिमेंटल सार्जेंट मेजर थे।
दूसरे विश्वयुद्ध के मोर्चों से लौटे एक ऐसे फौजी, जिनके सीने पर तमगे तो थे, पर जंग की विभीषिका ने उनके दिमाग को शेल शॉक यानी गंभीर मानसिक आघात से भर दिया था।
मां ग्लेडिस कपड़े के कारखाने में काम करती थीं।
घर में न गर्म पानी था, न कोई शौचालय और न ही कोई स्नानघर।
पर उस घर की सबसे बड़ी तबाही गरीबी नहीं थी।
पिता की शराब और उनका बेकाबू गुस्सा था। जब पिता का हाथ उठता, तो पैट्रिक और उनका बड़ा भाई ट्रेवर अपने नन्हे शरीर को दोनों के बीच में अड़ा देते थे।

सोचिए, जिस उम्र में बच्चे खिलौनों और किताबों के सपने देखते हैं, उस उम्र में दो भाई यह हुनर सीख रहे थे कि मां पर पड़ने वाली लाठियों और थप्पड़ों को अपने बदन पर कैसे झेलना है।
और इस कहानी का यह कोना हमारे भारतीय समाज के भी हर शहर, हर कस्बे की कड़वी हकीकत है।
पड़ोसियों को सब पता था।
दीवारों के पार से आती चीखों को सब सुनते थे।
पर कोई दरवाजा खटखटाने नहीं आता था।
लोग अपनी बालकनी से देखते, टीवी की आवाज तेज कर लेते और कहते कि यह तो इनके घर का निजी मामला है।
और सबसे बड़ा जुल्म यह कि उन मासूम बच्चों को बाहर निकलने पर खुद शर्म आती थी।
उन्हें लगता था कि घर में जो कुछ हो रहा है, शायद उसकी वजह वही हैं।
यही वह अपराधबोध था जिसने पैट्रिक को कई दशकों तक अपने ही दर्द पर खामोश रहने के लिए मजबूर कर दिया।
बारह साल की उम्र में उन्हें शेक्सपियर के नाटकों में एक नई पनाह मिली।
किशोरावस्था में ब्रिस्टल ओल्ड विक थिएटर स्कूल की छात्रवृत्ति मिली और वे मंच से जुड़ गए।
पर बचपन का साया पीछा नहीं छोड़ रहा था।
चौदह साल की उम्र में स्कूल के हेडमास्टर ने बिना किसी गलती के उन्हें छड़ी से पीटा।
उस दिन पैट्रिक के भीतर एक ऐसा भयानक गुस्सा भड़का कि वे खुद कांप उठे।
उन्हें पहली बार लगा कि पिता का वह हिंसक स्वभाव खून के रास्ते उनके भीतर भी दाखिल हो चुका है।
इसके बाद वे जब भी किसी नाटक में गुस्से का अभिनय करते, तो अंदर ही अंदर सहम जाते थे।
वे नकली गुस्सा दिखाते थे, क्योंकि उन्हें डर था कि अगर उनके भीतर का असली गुस्सा बाहर आ गया तो वे भी किसी की जान ले लेंगे।
उन्होंने बाद में लिखा था कि शेक्सपियर का मंच उनके लिए उस हिंसक घर से बचने की सबसे सुरक्षित जगह थी।
साल उन्नीस सौ इक्यासी में रॉयल शेक्सपियर कंपनी का नाटक आया : द विंटर्स टेल।
उन्हें राजा लियोन्टीज का हिंसक और संदेही किरदार निभाना था।
पैट्रिक डर गए और उन्होंने यह किरदार करने से मना कर दिया।
पर निर्देशक रोनाल्ड आयर ने उनकी आंखों में देखकर एक ही बात कही कि तुम्हारे भीतर वह गुस्सा मौजूद है, तुम्हें बस उसे बाहर आने देना है।
उस रात मंच पर पैट्रिक ने अपने भीतर के उस शैतान का सामना किया जिससे वे बचपन से भाग रहे थे।

उस किरदार को जीने के बाद उन्होंने पहली बार अपने गुस्से से डरना बंद किया।
सैंतालीस की उम्र में जब वे स्टार ट्रेक के कैप्टन बने, तो दुनिया भर में उनका डंका बज गया।
लेकिन हॉलीवुड की सबसे चमकदार रोशनी भी उस आधी दीवार की खामोशी को नहीं मिटा पाई थी।
वे जब खुद पिता बने, तो हर रोज अपने आप पर पहरा बिठाकर रखते थे।
एक बार जब उनका अपना जवान बेटा बहस करते हुए उनके ठीक सामने आ गया, तब भी पैट्रिक ने अपनी मुट्ठियां भींच लीं और चुपचाप सब सह लिया।
उन्हें पता था कि अंदर का राक्षस कभी भी जाग सकता है, और उसे किसी भी हाल में बाहर नहीं आने देना है।
साल दो हजार बीस में, जब वे अस्सी बरस के बुजुर्ग हो चुके थे, उन्होंने एक साक्षात्कार में बहुत धीमे से स्वीकार किया कि वे आज भी हर हफ्ते लॉस एंजिल्स में एक थेरेपिस्ट के सामने बैठते हैं।
बीस साल से वे लगातार थेरेपी ले रहे थे।
पूरी दुनिया जिसे महान अभिनेता मानती थी, वह अस्सी की उम्र में भी हर हफ्ते उसी लाचार बच्चे के पास लौट रहा था जो आधी दीवार के पीछे कांपता था।
दो हजार के दशक में जब उन्होंने अपनी यह कहानी दुनिया के सामने खोली, तो ब्रिटेन में घरेलू हिंसा पीड़ितों के लिए काम करने वाली संस्था रिफ्यूज ने उन्हें अपना संरक्षक बनाया।
पैट्रिक उस संस्था को बहुत पहले से जानते थे।
सत्तर के दशक में वे अपनी पहली पत्नी के साथ पश्चिम लंदन के चिस्विक में रहते थे, जहां पीड़ितों के लिए देश का पहला सुरक्षित घर खुला था।
पैट्रिक वहां दान का सामान पहुंचाने जाते थे।
वे आज तक उस सुरक्षित घर के दरवाजे की आवाज नहीं भूले थे : भारी लोहे के तालों के खुलने की खनक, और भीतर से खींची जाने वाली मजबूत कुंडी।
उन्होंने कहा था कि जिस घर में वे पले थे, वहां सिर्फ ईंटों की एक आधी दीवार थी जो बच्चों को कुछ भी देखने और सुनने से नहीं बचा सकी।
पर इस सुरक्षित घर के पास वह कुंडी थी, जो भीतर से लगती थी और बाहर की दरिंदगी को दरवाजे पर ही रोक देती थी।

उन्होंने दुनिया भर के पुरुषों के नाम एक खत में लिखा था कि हिंसा कभी मजबूरी नहीं होती, वह हमेशा एक पुरुष का अपना चुनाव होती है और उसकी पूरी जवाबदेही भी सिर्फ उसी की होती है।
उनकी मां उन्नीस सौ सतहत्तर में दुनिया छोड़ गईं।
पिता तीन साल बाद चले गए।
पैट्रिक ने अपने पिता को सिर्फ एक जालिम इंसान की तरह नहीं देखा।
उन्होंने अपने पिता की उस मानसिक बीमारी को समझा जिसे युद्ध ने पैदा किया था।
उन्होंने पिता की हिंसा को कभी सही नहीं ठहराया, लेकिन उन्होंने उस नफरत को अपने दिल का नासूर भी नहीं बनने दिया।
हमारे समाज में भी घरेलू हिंसा को अक्सर यह कहकर ढंक दिया जाता है कि यह तो चारदीवारी के अंदर की बात है।
पड़ोसी जानते हैं, रिश्तेदार जानते हैं, पर सब चुप रहते हैं।
और उस घर के बच्चे उसी घुटती हुई हवा में सांस लेते हुए बड़े होते हैं।
उन्हें लगता है कि खानदान की तथाकथित इज्जत बचाने के लिए मां का पिटना और उनका चुप रहना ही उनकी नियति है।
जबकि सच यह है कि किसी भी परिवार की इज्जत किसी बच्चे की सुरक्षा और किसी स्त्री के सम्मान से बड़ी नहीं हो सकती।
पैट्रिक स्टीवर्ट अब इस दुनिया में नहीं हैं।
सिनेमा उन्हें एक महान अभिनेता, एक अंतरिक्ष सेनापति और एक म्यूटेंट प्रोफेसर के तौर पर याद रखेगा।
पर मेरी नजर में उनकी सबसे बड़ी जीत यह थी कि एक हिंसक पिता की छाया में बड़ा होने के बावजूद उन्होंने खुद को पिता जैसा नहीं बनने दिया।
उन्होंने अपने बचपन के घाव को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उसे उन लाखों बेजुबानों की हिफाजत की ढाल बना दिया जिनकी चीखें बंद कमरों में घुट जाती हैं।
शोर की उम्र बहुत छोटी होती है।
और खुद को सुधारने का फैसला सबसे बड़ा होता है।
पैट्रिक का वह बचपन अब शांत है।
लेकिन उनकी जिंदगी यह सबक हमेशा देती रहेगी कि इंसान अपने अतीत का गुलाम नहीं होता, वह अपने फैसलों से पहचाना जाता है।
यहां हर दिन एक असली इंसान की अनकही जिंदगी दर्ज होती है। यहां वो पन्ने खुलते हैं जो दुनिया की चकाचौंध के पीछे अक्सर अनदेखे रह जाते हैं।
राहुल मिश्रा की फेसबुक वॉल से साभार
