संस्मरण
मेंहदी हसन से कम नहीं थी आरबी थापा की आवाज
कुमार सौवीर
बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि आरबी थापा का गला भले ही हल्का सा नेपाली टच रखता था, लेकिन उसकी आवाज में आत्मीयता मेंहदी हसन से कम नहीं थी। किसी भी गीत में राग को सप्तक सुर तक पहुंचाने का हुनर था, और उसी के अनुक्रम में वापस थाप भी।
अप्रैल सन-84 की बात है। बड़े पत्रकारों की करतूतों के चलते साप्ताहिक शानेसहारा के दफ्तर में कर्मचारी आंदोलन शुरू हो गया। सुब्रत राय उस अखबार को दिनमान, ब्लिक्ट्ज और करंट से ज्यादा धारदार बनाना चाहता था। लेकिन बड़े पत्रकार इसके बहाने अपनी सैलरी बढ़ाने की जुगत में थे। कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने की मद में सहारा इंडिया के पास एक बजट था, तो बड़े लोगों ने उसमें ही लूटपाट शुरू कर दी, कर्मचारी कामगारों के हित ठेंगे पर रख दिये गये। संपादक का वेतन चार गुना यानी करीब साढ़े आठ हजार बड़ा कर दिया गया। मकान, गाड़ी, अन्य सुविधाएँ अतिरिक्त। और उसी हिसाब से बाकी अफसरों का भी पैसा बढ़ा।
सबसे छोटे पत्रकार थे हम और श्याम अंकुरम। पद था प्रूफ-रीडर। हम दोनों का तन्ख्वाह तीन सौ तेरह रुपये था, जो वृद्धि के बाद छह सौ साठ हो गया। लेकिन बुरी हालत हो गयी कंपोजीटरों और सबसे पायदान पर कर्मचारियों का। किसी का 95 से 105 हुआ, तो किसी को अधिकतम 130 से 130 रुपया तक ही अटका रहा।
छोटे कर्मचारी सीधे पहले हम से मिले, क्यूंकि वे हमारे साथ ही सीमेंटेड शेड के हॉल में बैठते थे। तो उन कामगारों के साथ हम सीधे संपादक तडि़त कुमार जी के पास पहुंचे। तडित जी लेखक, साहित्यकर और वामपंथी विचारधारा के थे। मगर तडि़त जी को बुरा लगा कि मैं अखबार में यूनियनबाजी कर रहा हूं। बेइज्जत कर हम सब लोगों दफ्तर से भगा दिया गया। हमने तय किया कि अब हम वेतन-बहिष्कार करेंगे। सुब्रत राय को न जाने क्या पट्टी पढाई गयी कि उसने मुझे और श्याम अंकुरम को बर्खास्त किया और करीब दो दर्जन कर्मचारियों को संस्पेंड या तबादले पर भेज दिया गया।
हम ने आंदोलन छेड दिया। दफ्तर के बाहर चादर बिछा कर नाराबाजी शुरू, हमारा रुटीन तय हो गया। श्रमिक आंदोलन का दौर चल ही रहा था, हम शहर और आसपास के इलाकों में चल रहे आंदोलनों में शामिल होते थे और जवाब में वे भी हमारे आंदोलन में एकजुटता का सक्रिय प्रदर्शन करते थे।
दिन बढ़ने लगा, तो एक दिन तय हुआ कि आंदोलन तेज किया जाए। श्याम अंकुरम आमरण अनशन पर और हम आंदोलन को धार देने की मुहित में जुटे। सुब्रत राय को अहसास हो गया कि अब संकट बढ़ने वाला है, इसीलिए उसने दफ्तर में पीएसी की टुकड़ी तैनात करा दी। ऐसा कर सुब्रत राय समझता था कि उसका संकट दूर हो गया है। लेकिन ग्यारहवें दिन श्याम को खांसी में खून आ गया, तो यह देख कर मेरा खून खौलने लगा। हमारे आंदोलन में उस दिन बेहिसाब भीड़ जुट गयी थी। खून देख कर मैं भड़क गया और पीएसी का घेरा तोड़ कर सुब्रत राय के भाई जयब्रत राय को दफ्तर में घुस कर पचासों जूतों और लातों-तमाचों से कूट लिया। हालात बेकाबू हो गये। सुब्रत राय जो छिपा हुआ था, और बताया जा रहा था कि मुम्बई में है, यह हादसा देखते ही उसने मुझे और श्याम को बर्खास्तगी से हटा कर वापस लिया, मगर संस्पेंड रखा, मगर जिन्हें तबादल या सस्पेंशन में रखा था उन्हें काम पर वापस ले लिया।
अखबार में मालिक के भाई को जूतों से कूटने की मेरी छवि का अंजाम यह हुआ कि कोई भी अखबार मुझे नौकरी को देने को तैयार नहीं था। लेकिन कई दिन बाद नवभारत टाइम्स व टाइम्स ऑफ इंडिया के सहयोगी अखबार सांध्य समाचार सेवा के संपादक घनश्याम पंकज ने मुझे अस्थाई रिपोर्टर की नौकरी मिली। मगर वेतन मिला केवल एक सौ पचास रुपया। दिन भर साइकिल से रिपोर्टिंग करता था। बेहिसाब मेहनत। वह तो गनीमत थी कि मैं करीब डेढ़ साल तक कानपुर में रिक्शा चला चुका था, वह अनुभव काम आ गया। वरना रोज तीस-चालीस किलोमीटर तक साइकिल चलाना मुमकिन नहीं होता है। मगर पंकज दिमाग जितना बेहतरीन संपादक था, चरित्र में उतना ही घटिया और छिछोरा। नभाटा और सांध्य समाचार सेवा का दफ्तर एक ही फ्लोर पर था। वहीं पर बेइंतिहा शख्सियतों से मुलाकात हुई। उनमें थे डॉ नंदकिशोर त्रिखा, कमर वहीद नकवी, रामकृपाल सिंह, डॉ तृप्ति, पंकज की निजी सहायक कल्पना पाठक, लेकिन बेहद प्यारी बड़ी बहन वंदना मिश्र। मां, बहन की तरह प्यार करती थीं, और मित्र की तरह अपने पति प्रो रमेश दीक्षित जी का स्कूटर वक्त-जरूरत मुझे दे देती थीं।
बहरहाल, उस समय नवभारत टाइम्स का फोटोग्राफर था संजीव प्रेमी। काम में माहिर-कुशल, लेकिन बेहद घमंडी-बदतमीज। दुस्साहसिक भी। उसका डार्क रूम में ट्रेनी था आरबी थापा। संजीव उसे हमेशा टाइट ही रखता था, या डांट-फटकार, और कभी-कभी दुत्कार भी। लेकिन स्नेह भी करता था थापा को, वजह कि थापा में अपना काम कई कदम आगे रखने का कौशल था, शौक़ और आदत भी। फोटो का काम पूरे सलीके ढंग से सीखता और करता था। संजीव जब शहर से बाहर होता, तो थापा कैमरे पर हाथ आजमाता था।

इस बच्ची की फोटो देख रहे हैं। यह साशा है। 31 दिसम्बर-94 में बेगम हजरत महल पार्क में आयोजित तीन दिन के धर्म निरपेक्ष अभियान के अंतिम दिन रैली में यह बच्ची सबसे आगे यही कट-बोर्ड लिये ठुमकती चलती रही। करीब दो किलोमीटर तक। यह रैली हजरतगंज के गांधी स्मारक पर पहुंची तो गांधी जी की प्रतिमा के नीचे वह गदगद भाव में अपना कट-बोर्ड थामे रही। इसी बीच आरबी थापी ने यह फोटो खींच ली, जो अगले दिन यानी पहली जनवरी-95 को नवभारत टाइम्स अखबार के पहले पन्ने पर सबसे ऊपर पहले पांच कॉलम में छपी थी। सन-11 में यही बच्ची साशा लखनऊ के दैनिक जागरण में रिपोर्टर बनी और आजकल ग्रेटर नोएडा की एक बड़ी कम्पनी में मैनेजर, मीडिया के पद पर है।
अब बात फिर थापा पर आता हूं। सांध्य समाचार सेवा में अपने शोषण के भयावह दौर में थापा से मेरी करीबी हो गयी थी। मैं अनुभवी था, और इसीलिए थापा मुझे पूरे सम्मान के साथ भाईसाहब या भइया पुकारता था। जब भी संजीव प्रेमी बाहर होता और हमारे पास समय होता था, तो हम दोनों डार्करूम में बतियाये रहते थे। गाना का दौर भी चलता था। उसका एक गीत मुझे आज भी दिल धडका देता है। यह प्रसिद्ध ग़ज़ल “इस तरह हर ग़म भुलाया कीजिए” को हसरत जयपुरी ने लिखा था, और इसे मुख्य रूप से मशहूर ग़ज़ल गायक उस्ताद अहमद हुसैन और उस्ताद मोहम्मद हुसैन ने गाया व संगीतबद्ध किया था। पूरी तन्मयता के साथ यह गजल थापा गाता था।
इस तरह हर ग़म भुलाया कीजिए
रोज़ मैख़ाने में आया कीजिए
छोड़ भी दीजिए तकल्लुफ़ शेख़ जी
जब भी आएँ पी के जाया कीजिए
ज़िंदगी भर फिर न उतेरेगा नशा
इन शराबों में नहाया कीजिए
ऐ हसीनों ये गुज़ारिश है मेरी
अपने हाथों से पिलाया कीजिए।
