जसवीर त्यागी की दो कविताएं
टूटना
झर रही हैं नीम की पत्तियाँ
पत्तियाँ अठखेलियाँ करती हुई
बगैर समझे-विचारे
कूद पड़ती हैं डाल से जमीन पर
हरे-पीले हल्के रंग की
हाथ से बुनी हुई-सी एक चादर
बिछती जा रही है पृथ्वी पर
पत्तियाँ जुदा हो रही हैं पेड़ से
और सुगन्ध पत्तियों से दूर जा रही है
पत्तियाँ हों
हो जीव-जंतु या मनुष्य
टूटता है जो एक बार अपने मूल से
फिर खोया-खोया-सा
भटकता फिरता है दर-बदर
नीम से टूटी हुई
पत्तियों की मानिंद।
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नये के लिए जगह
पेड़ के अनंत पत्ते झर गये
झरे पत्तों को देखकर
मन उदास होता है
मुझे उदास देखकर
कहती है माँ-
तुम डाल का सूनापन देखते हो
और उदास होते हो
मैं देखती हूँ
डाल के झरे पत्तों ने
नये पत्तों के लिये जगह बनायी है।
