विज्ञान-तकनीक
एआईः ज्ञान का बदलता रास्ता
अविनाश दास
आज सुबह इनबॉक्स देख रहा था। रोज़ की तरह बहुत सारे मेल थे। कुछ ज़रूरी, कुछ विज्ञापन, कुछ ऐसे जिन्हें बिना खोले ही आगे बढ़ जाना था। एक मेल पर उंगली रुक गयी। शीर्षक था: & .
मेल रूबेन हसीद का था। रूबेन सिखाते हैं। लाखों लोग उन्हें पढ़ते हैं। लेकिन इस बार कहानी की नहीं थी। कहानी उनकी 61 साल की मां की थी। एक रिटायर्ड फ़ार्मासिस्ट, जिनका तकनीक से लगभग उतना ही रिश्ता था, जितना हममें से बहुत सारे लोगों का है। काम चल जाए, बस।
एक दिन मां ने बेटे से पूछा, तुम आख़िर दिन-भर लोगों को सिखाते क्या हो? और ये कौन है?
रूबेन ने कोई लेक्चर नहीं दिया। मां की एक असली परेशानी उठायी और कहा, चलिए इसी पर को आज़माते हैं। मां पेरिस में रहती हैं। वहां उनका एक अपार्टमेंट है। वह चाहती थीं कि वह अपने चार बच्चों के नाम हो जाए, टैक्स कम से कम लगे और जीवन भर उस घर में रहने का उनका अधिकार भी बना रहे। यह सीधा सवाल नहीं था। इसमें फ्रांस का उत्तराधिकार क़ानून था, टैक्स था, संपत्ति थी, पारिवारिक स्थिति थी और ऐसे नियम थे जिन्हें समझने के लिए आम तौर पर आप किसी नोटरी या क़ानूनी सलाहकार के पास जाएंगे। यानी एक ऐसी समस्या, जिसके दरवाज़े पर पहुंचते ही आम आदमी पहले अपनी जेब टटोलता है।
मां कंप्यूटर पर बहुत धीरे टाइप करती थीं। इसलिए रूबेन ने उन्हें एक दिया और कहा, आप कंप्यूटर से नहीं, किसी इंसान से बात कर रही हैं, ऐसे बोलिए। मां ने से कहा, मुझे अपना अपार्टमेंट अपने चार बच्चों को कम से कम टैक्स में देना है। मेरी उम्र 61 साल है। मैं पेरिस में रहती हूं। मेरे चार बच्चे हैं। घर देने के बाद भी मैं उसी में रहना चाहती हूं। अगर मेरी बात पूरी नहीं है, तो पहले मुझसे सवाल पूछ लो।
बस। इसके बाद ने उनसे सवाल पूछने शुरू किये। मां जवाब देती गयीं। करीब दस मिनट बाद उनके सामने केवल किसी सवाल का जवाब नहीं था। एक पूरी रणनीति थी। क़ानूनी विकल्प थे। ऐसा ड्राफ़्ट था, जिसे लेकर वे नोटरी के पास जा सकती थीं। मां को भरोसा नहीं हुआ। उन्होंने पूछा, हमें कैसे मालूम कि इस ने अपनी तरफ़ से कुछ बना नहीं दिया?
यह सवाल शायद पर होने वाली पूरी बहस का सबसे ज़रूरी सवाल है। रूबेन ने से कहा, अपनी याददाश्त से कुछ मत बताओ। हर दावे का दो। आधिकारिक वेबसाइट से प्रमाण नहीं मिलता, तो साफ़ लिखो, .
इसके बाद सामने फ्रांस सरकार की वेबसाइटों और आधिकारिक संदर्भों के साथ जवाब था।
यहां मैं ज़रा रुक गया। क्योंकि मुझे लगा कि हम नयी तकनीक को समझने में शायद एक बुनियादी ग़लती कर रहे हैं। हम सोचते हैं कि पहले हमें सीखना पड़ेगा। उसके सारे बटन समझने पड़ेंगे। का कोई कोर्स करना पड़ेगा। तकनीकी भाषा सीखनी पड़ेगी। तब कहीं जाकर हम इसका इस्तेमाल कर पाएंगे। शायद मामला ठीक उलटा है। हो सकता है आपको सीखने से पहले अपनी समस्या को साफ़-साफ़ कहना सीखना हो।
मनुष्य की सभ्यता में ज्ञान लंबे समय तक कुछ ख़ास दरवाज़ों के पीछे बंद रहा है। क़ानून जानना है तो वकील के पास जाइए। चिकित्सा समझनी है तो डॉक्टर के पास। इतिहास जानना है तो किताब खोजिए। किसी सरकारी नियम को समझना है तो किसी ऐसे आदमी को खोजिए जो उस भाषा का मतलब जानता हो।
इन विशेषज्ञों की ज़रूरत ख़त्म नहीं हो रही। शायद कभी नहीं होगी। लेकिन ज्ञान तक पहुंचने के रास्ते बदल रहे हैं। संभव है कि आने वाले समय की सबसे बड़ी असमानता यह न हो कि किसके पास कितनी जानकारी है। असमानता यह हो कि कौन अपनी उलझन को सवाल में बदल सकता है और कौन नहीं।
मैंने मेल बंद किया, लेकिन उसकी एक बात मेरे साथ रह गयी। तकनीक से डरने और तकनीक पर आंख बंद करके भरोसा करने के बीच एक तीसरा रास्ता भी है। उससे सवाल पूछना। फिर उसके जवाब से भी सवाल पूछना। शायद भविष्य उन्हीं लोगों का होगा, जो मशीनों के सामने सबसे ज़्यादा ज्ञानी बनकर नहीं, सबसे ज़्यादा जिज्ञासु बनकर बैठेंगे।
