हमें पोते का ही इंतज़ार क्यों?
रत्ना भदौरिया
समय बदलने का दावा हम अक्सर बहुत सहजता से करते हैं। बेटियाँ पढ़ रही हैं, आत्मनिर्भर हो रही हैं, घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारियाँ निभा रही हैं। वे उन क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रही हैं, जिन्हें कभी पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। लेकिन इन तमाम उपलब्धियों के बीच जब किसी घर में बच्चे के जन्म की खबर आती है, तब हमारी सदियों पुरानी मानसिकता कई बार फिर अपना चेहरा दिखा देती है। बातचीत का पहला सवाल आज भी होता है—“बेटा हुआ या बेटी?”
यह प्रश्न अपने आप में मामूली लग सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपी मानसिकता बहुत गहरी है। आज भी अनेक परिवारों में बेटे के जन्म को वंश की निरंतरता, परिवार के गौरव और भविष्य की सुरक्षा से जोड़कर देखा जाता है, जबकि बेटी के जन्म के साथ अनजाने ही चिंता, खर्च और उसके दूसरे घर चले जाने की बातें जुड़ जाती हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस सोच को आगे बढ़ाने वालों में केवल पुरुष ही नहीं होते। कई बार घर की महिलाएँ स्वयं बेटे की इच्छा की सबसे मुखर आवाज बन जाती हैं। दादी कहती हैं—“घर में पोता होना चाहिए।” सवाल यह है कि आखिर पोता ही क्यों?
यह प्रश्न किसी एक दादी या किसी एक परिवार से नहीं है। यह उस सामाजिक संरचना से है, जिसने पीढ़ियों से स्त्री को यह विश्वास कराया कि परिवार की पूर्णता बेटे से होती है। जिस स्त्री ने स्वयं बेटी के रूप में जन्म लिया, बेटी होकर अपने माता-पिता का घर सँभाला, बेटी होकर परिवार की जिम्मेदारियाँ उठाईं, वही जब दादी बनती है तो पोते की प्रतीक्षा क्यों करने लगती है? क्या इसलिए कि उसने अपनी पूरी जिंदगी में यही सुनते-सुनते इसे सच मान लिया कि वंश बेटे से चलता है और बेटी दूसरे घर की होती है?
दरअसल, पितृसत्ता की सबसे मजबूत दीवारें हमेशा पुरुष ही नहीं बनाते। कई बार स्त्रियाँ भी उन दीवारों की रखवाली करती दिखाई देती हैं। इसका कारण उनकी कोई व्यक्तिगत कमी नहीं, बल्कि वह सामाजिक प्रशिक्षण है जिससे वे बचपन से गुजरती हैं। उन्हें सिखाया जाता है कि बेटा बुढ़ापे का सहारा है, बेटा वंश आगे बढ़ाता है, बेटा संपत्ति का उत्तराधिकारी है और बेटी एक दिन विदा हो जाएगी। धीरे-धीरे ये बातें इतनी सामान्य बना दी जाती हैं कि स्त्री भी इन्हें प्रश्न किए बिना स्वीकार करने लगती है।
लेकिन आज इस सोच पर प्रश्न करने का समय है।
वंश आखिर किस चीज का नाम है? क्या केवल उपनाम आगे बढ़ाने का नाम वंश है? क्या परिवार की संपत्ति किसी पुरुष उत्तराधिकारी के नाम हो जाने से ही परिवार की निरंतरता सुनिश्चित होती है? यदि वंश का अर्थ संस्कार, विचार, मूल्य और मानवीय विरासत को आगे बढ़ाना है, तो बेटी इसमें बेटे से कम कैसे हो सकती है?
जिस बेटी को हम पढ़ाते हैं, उसके आत्मनिर्भर होने पर गर्व करते हैं, उसके पुरस्कारों पर तालियाँ बजाते हैं और उसकी सफलता की तस्वीरें सोशल मीडिया पर लगाते हैं, उसी बेटी के जन्म के समय हमारे मन में निराशा क्यों आ जाती है? यह विरोधाभास केवल व्यक्तिगत नहीं है; यह हमारे सामाजिक चरित्र का आईना है।
हमने बेटे और बेटी के लिए दो अलग-अलग भविष्य तय कर रखे हैं। बेटे के जन्म को उपलब्धि की तरह देखा जाता है और बेटी के जन्म को जिम्मेदारी की तरह। बेटे के लिए कहा जाता है कि वह घर का नाम रोशन करेगा, बेटी के लिए कहा जाता है कि वह अपने घर चली जाएगी। बेटे की कमाई को परिवार की ताकत माना जाता है, बेटी की कमाई को अक्सर उसके वैवाहिक जीवन की सुविधा के रूप में देखा जाता है। यही सोच आगे चलकर उस भेदभाव को जन्म देती है, जिसकी शुरुआत जन्म से पहले ही हो जाती है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि आधुनिकता ने हमारी सुविधाएँ बदली हैं, हमारी मानसिकता उतनी नहीं बदली। आज घर में बेटी के लिए महँगी शिक्षा की व्यवस्था की जाती है, उसे नौकरी करने की अनुमति दी जाती है, उसके अधिकारों की बातें की जाती हैं, लेकिन जब परिवार में अगली पीढ़ी के आने का अवसर आता है तो वही परिवार पोते की प्रतीक्षा करने लगता है। इसका अर्थ साफ है—हमने बेटी को आगे बढ़ने की अनुमति तो दी है, लेकिन उसे बराबरी का दर्जा देने की मानसिक यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है।
बेटे की इच्छा रखने वाली दादी से यह पूछना जरूरी है कि यदि उसकी संतान बेटी न होकर बेटा होती तो क्या वह स्वयं अधिक सम्मानित होती? क्या उसके जीवन का मूल्य अधिक होता? यदि नहीं, तो फिर पोते और पोती में यह अंतर क्यों?
हमें यह समझना होगा कि किसी बच्चे का लिंग उसके अधिकार, उसकी क्षमता या उसके मानवीय मूल्य का निर्धारण नहीं कर सकता। बच्चा बेटा हो या बेटी, वह परिवार में एक नए जीवन का आगमन है। उसके जन्म पर खुशी का आधार उसका लिंग नहीं, उसका अस्तित्व होना चाहिए।
बेटे की चाह केवल एक इच्छा नहीं है। जब यह इच्छा सामाजिक प्राथमिकता बन जाती है, तब वह बेटियों के विरुद्ध भेदभाव को जन्म देती है। यही मानसिकता कभी कन्या भ्रूण हत्या तक पहुँचती है, कभी बेटियों की शिक्षा रोकती है, कभी संपत्ति में उनका अधिकार सीमित करती है और कभी विवाह के बाद भी उन्हें अपने मायके में बराबरी का स्थान नहीं देती।
इसलिए बदलाव केवल यह कह देने से नहीं आएगा कि “बेटियाँ बेटों से कम नहीं हैं।” बदलाव तब आएगा जब बेटे की चाह को भी प्रश्नों के कटघरे में खड़ा किया जाएगा। जब दादी पोते की मन्नत माँगने से पहले यह सोचेगी कि उसके सामने आने वाला बच्चा उसके परिवार की अगली पीढ़ी है—उसका लिंग नहीं।
हमें यह तय करना होगा कि आने वाली पीढ़ियों को हम कौन-सी विरासत देना चाहते हैं—एक ऐसा समाज जहाँ जन्म लेते ही बच्चे का मूल्यांकन उसके लिंग से हो, या ऐसा समाज जहाँ बच्चे को केवल बच्चा समझा जाए।
क्योंकि सवाल यह नहीं है कि पोता क्यों चाहिए।
सवाल इससे कहीं बड़ा है—
हमें आज भी यह तय करने की जरूरत क्यों पड़ती है कि घर में आने वाला बच्चा बेटा होना चाहिए या बेटी?
जिस दिन इस प्रश्न का उत्तर हमें भीतर से असहज करने लगेगा, शायद उसी दिन बदलाव की शुरुआत होगी।
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