सिलाई मशीन: खट-खट की आवाज़ में दबा एक स्त्री का पूरा जीवन

सिलाई मशीन: खट-खट की आवाज़ में दबा एक स्त्री का पूरा जीवन

जब वह कपड़े नहीं, रिश्ते सिलती रही… और अंत में एहसास हुआ कि स्वयं का जीवन ही सबसे अधिक अनसिला रह गया।

डॉ रीटा अरोड़ा

किसी भी भारतीय मध्यमवर्गीय घर के पुराने स्टोर रूम में जाइए। आपको धूल से ढकी एक काली, लोहे की सिलाई मशीन मिल जाएगी। उसके पहिये पर समय की जंग होगी, पायदान पर वर्षों के श्रम के निशान होंगे और उसके दराज में शायद कुछ टूटे बटन, रंग-बिरंगे धागे और अधूरी रीलें रखी होंगी।

लेकिन यदि वह मशीन बोल पाती, तो शायद किसी इतिहास की किताब से भी अधिक सच्ची कहानी सुनाती।

वह बताती कि उसने केवल कपड़े नहीं सिए, उसने टूटते हुए घरों को जोड़ा है। उसने केवल ब्लाउज़ और पेटीकोट नहीं बनाए, उसने बच्चों की स्कूल फीस, बेटी की शादी, पति की बीमारी और पूरे परिवार की उम्मीदों को अपने धागों में पिरोया है।

विडंबना देखिए…

जिस मशीन ने पूरी दुनिया को जोड़ा, उसके सामने बैठी स्त्री स्वयं जीवन भर बिखरी रही।

आज स्त्री सशक्तीकरण पर बड़े-बड़े सेमिनार होते हैं। आर्थिक स्वतंत्रता पर लंबी बहसें होती हैं। करोड़ों रुपये की योजनाएँ बनती हैं। लेकिन इन चर्चाओं के बीच उस साधारण सिलाई मशीन का शायद ही कभी उल्लेख होता है जिसने भारत की लाखों महिलाओं को बिना किसी मंच, बिना किसी पुरस्कार और बिना किसी शोर के आत्मनिर्भर बनाया।

एक समय था जब बेटी की विदाई में सिलाई मशीन देना लगभग परंपरा हुआ करती थी। समाज का तर्क बड़ा सरल था-“घर के कपड़े भी सिल लेगी और ज़रूरत पड़ी तो चार पैसे भी कमा लेगी।”

शायद उस समय किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि यही मशीन किसी महिला के आत्मविश्वास की पहली सीढ़ी बन जाएगी। उसने पहली बार महसूस किया कि उसके हाथ केवल रोटियाँ बनाने के लिए नहीं बने हैं। वे मूल्य भी पैदा कर सकते हैं।

पहली कमाई चाहे पचास रुपये रही हो या पाँच सौ… लेकिन उस नोट की कीमत बैंक से अधिक उसके आत्मसम्मान में जमा होती थी।

यहीं से एक अदृश्य परिवर्तन शुरू होता है।

वह घर की “खर्च करने वाली” नहीं रहती।
वह घर की “कमाने वाली” बन जाती है।

और यही परिवर्तन किसी भी स्त्री के आत्म-मूल्यांकन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण होता है।
दोपहर का सन्नाटा हो। या रात के ग्यारह बजे पूरा घर सो चुका हो। तभी किसी कमरे से “खट-खट… खट-खट…” की लगातार आती आवाज़ सुनाई देती थी। बच्चों को लगता था-माँ सिलाई कर रही है।

लेकिन सच पूछिए तो वह केवल कपड़े नहीं सिल रही होती थी।

वह अगले महीने की फीस जोड़ रही होती थी।
वह गैस का बिल गिन रही होती थी।
वह बेटी के सपनों को आकार दे रही होती थी।
वह बेटे के भविष्य के लिए चिंतित होती थी।

और कभी-कभी… वह बिना किसी से कुछ कहे अपने आँसू भी उसी कपड़े में टाँक देती थी।
कितनी अजीब बात है। पुरुष अक्सर अपने तनाव को शब्दों में व्यक्त कर देता है। स्त्री उसे काम में बदल देती है।

शायद इसी कारण उसके श्रम का दर्द कभी दिखाई नहीं देता।

भारतीय साहित्य और समाज में ऐसी अनगिनत स्त्रियाँ मिलती हैं जिन्होंने दूसरों के लिए सुंदर संसार बनाया, लेकिन अपने हिस्से में केवल उपेक्षा पाई।

किसी ने सैकड़ों डिज़ाइनर ब्लाउज़ सिए।
किसी ने पूरे मोहल्ले की लड़कियों की शादी के कपड़े तैयार किए।
किसी ने बच्चों की स्कूल यूनिफॉर्म बनाकर उनके भविष्य को आकार दिया।

लेकिन जब स्वयं के लिए साड़ी खरीदने की बारी आई, तो अलमारी में किसी की पुरानी साड़ी ही मिली।

यह केवल कपड़ों का प्रश्न नहीं है। यह समाज के मूल्यांकन का प्रश्न है।
हम अक्सर श्रम का उपयोग करते हैं… श्रम करने वाले का सम्मान नहीं।

किसी महिला की सिलाई समय पर चाहिए। लेकिन उसकी कमर का दर्द कभी चर्चा का विषय नहीं बनता।
हमें कपड़ों की फिटिंग याद रहती है। लेकिन उसे चश्मा कब लगा, यह कोई नहीं पूछता।

यदि भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का कोई मौन आधार स्तंभ खोजा जाए, तो उसमें सिलाई मशीन का स्थान बहुत ऊँचा होगा। गाँवों और छोटे कस्बों में लाखों महिलाओं ने इसी मशीन के सहारे अपनी पहचान बनाई। पड़ोस की ब्लाउज़ सिलाई से शुरू हुआ सफर धीरे-धीरे स्कूल यूनिफॉर्म, त्योहारों के कपड़ों और छोटे-छोटे बुटीक तक पहुँच गया।

उनके बैंक खातों में शायद बड़ी रकम कभी नहीं आई, लेकिन उनकी कमाई ने घर की रसोई को जलाए रखा, बच्चों की पढ़ाई जारी रखी और कठिन समय में परिवार को टूटने नहीं दिया। अर्थशास्त्र की किताबें भले इन आँकड़ों को दर्ज न करें, लेकिन भारत के करोड़ों परिवारों का सामाजिक इतिहास इन्हें कभी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।

विडंबना यह है कि सिलाई मशीन का मूल काम फटे हुए कपड़ों को जोड़ना है। लेकिन उसके सामने बैठी स्त्री का अपना जीवन कई बार धीरे-धीरे बिखरता चला जाता है।

वह भाई-बहनों के रिश्ते बचाती है।
पति का सम्मान बचाती है।
बच्चों का भविष्य सँवारती है।
घर की आर्थिक स्थिति को संभालती है।

लेकिन धीरे-धीरे उसका अपना अस्तित्व कहीं पीछे छूट जाता है।
जब वह साठ वर्ष की उम्र में पीछे मुड़कर देखती है, तो उसे एहसास होता है कि उसने पूरी उम्र दूसरों की ज़िंदगी की सिलाई की…
पर अपने सपनों की तुरपाई कभी नहीं कर पाई।

यही वह क्षण है जहाँ आत्म-मूल्यांकन शुरू होता है।
और दुर्भाग्य यह है कि कई लोगों के जीवन में यह मूल्यांकन तब आता है जब जीवन का अधिकांश हिस्सा बीत चुका होता है।

आज पायदान वाली मशीन की जगह इलेक्ट्रिक मशीनें आ गई हैं।
कई महिलाएँ इंस्टाग्राम पर अपने डिज़ाइन बेच रही हैं।
यूट्यूब से सीखकर अपना बुटीक चला रही हैं।
स्वयं सहायता समूह उन्हें उद्यमी बना रहे हैं।
तकनीक बदल गई है।
बाज़ार बदल गया है।

लेकिन क्या समाज का नज़रिया पूरी तरह बदला है?

आज भी बहुत से घरों में यदि कोई महिला घर बैठकर सिलाई करती है, तो उसे “थोड़ा-बहुत काम कर लेती है” कह दिया जाता है।
कोई यह नहीं कहता-

वह एक उद्यमी है।
वह डिज़ाइनर है।
वह उत्पादन कर रही है।
वह अर्थव्यवस्था में योगदान दे रही है।

क्योंकि हमारे समाज ने आज भी महिलाओं के श्रम को “कर्तव्य” अधिक माना है, “पेशा” कम।

शायद सिलाई मशीन हमें जीवन का सबसे गहरा दर्शन सिखाती है।
सुई हर बार कपड़े को चुभती है, तभी दो टुकड़े जुड़ते हैं।
बिना चुभन के जोड़ संभव नहीं।

लेकिन एक प्रश्न फिर भी रह जाता है।
क्या दूसरों को जोड़ते-जोड़ते स्वयं को पूरी तरह बिखेर देना ही त्याग है?
या फिर अपने अस्तित्व को भी उतनी ही सावधानी से सीना चाहिए, जितनी सावधानी से हम दूसरों के जीवन की सिलाई करते हैं?

क्योंकि अंततः किसी भी स्त्री की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि उसने कितने कपड़े सिए।
सबसे बड़ी सफलता यह होगी कि जीवन की अंतिम सांझ में वह यह कह सके-
“मैंने केवल दूसरों के सपनों की सिलाई नहीं की… अपने जीवन को भी अपनी पसंद के धागों से बुना।”

शायद उसी दिन सिलाई मशीन की “खट-खट” केवल मेहनत की आवाज़ नहीं रहेगी।
वह एक स्त्री के आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और आत्म-मूल्यांकन की सबसे मधुर धुन बन जाएगी।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा,सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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