जसवीर त्यागी की फुटपाथ पर नींद व अन्य कविताएं
फुटपाथ पर नींद
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बहुत सारे गरीबों को
फुटपाथ पर
सोते हुए देखा
कुछेक के पास बिस्तर थे
कुछ बगैर बिस्तर
कुछ ने कोई कपड़ा ओढ़ रखा था
कुछ ऐसे भी थे
जिन्होंने खुद को
खुद से ही ढाप रखा था।
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मिट्टी का गिलास
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*एक शिष्य अपने जनपद से*
*मिट्टी का एक गिलास*
*मेरे लिए उपहार में लाया*
*गिलास देते हुए बोला-*
*हमारा जनपद*
*मिट्टी के बर्तनों के लिए प्रसिद्ध है*
*मन किया आपके लिए भी ले चलूँ*
*घर में स्टील,काँच के गिलास हैं*
*रसोई के बर्तनों में दूर से ही*
*नभ में दिनकर-सा चमकता है*
*मिट्टी का गिलास*
*जब भी मिट्टी के गिलास से*
*पानी पीता हूँ*
*लगता है होंठ गिलास को नहीं*
*शिष्य के भाल को चूम रहे हैं।*
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अनकहा
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*कभी-कभी*
*उससे कुछ कहना चाहता हूँ*
*पर कह नहीं पाता*
*कहने की चाह*
*और न कह पाने की पीड़ा*
*मेरे पास छूट जाती है*
*मैं खुद ही*
*अनकहे से संवाद करता हूँ*
*अरमानों के आईने में*
*खुद को निहारते हुए*
*उसे याद करता हूँ।*
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नेह की नदी
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*कभी-कभी*
*मैं उससे कोई मज़ाक कर लेता हूँ*
*उसके चेहरे पर*
*मुस्कुराहट का कोई मोती चमकने लगता है*
*प्रसन्नता की पतंग*
*आत्मीयता के आसमान में उड़ने लगती है*
*जिंदगी के दुःखों के दरिया में*
*मानो कोई तैरता हुआ पुष्प दिख जाता हो*
*बस इतने भर से ही*
*एक उदास दिन*
*उमंग की उड़ान में तब्दील हो जाता है*
*चाहता हूँ*
*इस संसार में*
*सरलता,निर्मलता बची रहे*
*इंसान के अन्तस् में*
*दूसरे इंसान के लिए*
*नेह की एक नदी बहती रहे।*
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पेंशन
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पीठ झुका बूढ़ा आदमी
सप्ताह में कई बार
बैंक जाकर पेंशन का पता करता है
काउंटर पर बैठा आदमी बड़बड़ाता है-
बाबा बुढ़ापे में भी तुम्हें चैन नहीं
बूढ़ा आदमी नम निगाहों से
कैशियर को देखता है एकटक
और मौन की मोटर में बैठकर
खाली हाथ घर लौटता है।
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झुर्रियों भरे चेहरे
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झुर्रियों भरे चेहरे
मुझे आकर्षित करते हैं
उनकी आड़ी-तिरछी रेखाओं में
मिल जाती हैं
जीवन-जल की सरस बूंदें
बूंदों की नमी में
बची रहती है
संवेदनाओं की श्वास
और उन श्वासों में
बचा रहता है जीवन।
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आवाज
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नव ब्याहता बेटा-बहू के साथ रहते हैं
वृद्ध माता-पिता
बुजुर्ग पिता
अक्सर नींद में उच्चारते हैं- हे राम,हे राम
बीच-बीच में
कभी बत्ती जलाते-बुझाते हैं
कभी बेंत ढूँढते हैं
कभी अपनी दवा-गोली
सिरहाने जल भरा लोटा रखते हैं
रात में कई बार
उन्हें पेशाब की शिकायत होती है
पिता जब भी जगते हैं
आहट और आवाज भी
उनके साथ-साथ जगती हैं
पिता की आवाज सुनकर
आश्वस्ति की चादर ओढ़े लेटी रहती हैं माँ
जबकि उसी आवाज को सुनकर
बेटा बहू करवट बदलते हैं बार-बार
और नींद में बड़बड़ाते हैं
एक दूसरे से कुछ कहते हुए ।
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