रणबीर सिंह दहिया का व्यंग्य – हरियाणा की तिग्गी

व्यंग्य

हरियाणा की तिग्गी

रणबीर सिंह दहिया

 

तिग्गी का मतलब तीन चीजां का तिग्गड्डा मतलब तीन चीज इकट्ठी। एक तिग्गी का मतलब ताश की तिग्गी। पान की तिग्गी, ईंट की तिग्गी, चिड़ी की तिग्गी अर हुकम की तिग्गी। दूसरी तुरुप की तिग्गी। तुरुप की तिग्गी साधारण इक्के ने बी पढ़ण बिठादे सै। कई बै तिग्गी की ट्र्रेल दो इक्यां के पेयर का भी भूत बणादे सै।

या ताशां की तिग्गी माणसां का बहोत सत्यानाश करै सैं। फेर जै ताशां की तिग्गी जब समाज का धुम्मां ठा सकै तो माणसां की असली तिग्गी समाज का के कर सकै सै या बात हरियाणा के हरेक माणस कै आसानी तै समझ मैं आ सकै। हरियाणा की किस्मत कहवां अक बदकिस्मत मेरे कम समझ मैं आवै सै।

म्हारे हरियाणा में गऊ, गऊ का गोबर अर गऊमूत्र की तिग्गी नै सदियां तै गुल खिलाये सैं अर ईब तो हद होगी अक दुलिना मैं गउआं के बदलै 5 माणसां की बलि चढ़ाकै बहुत खुश हुये म्हारे समाजी भाई। हालांकि आज ताहिं सिद्ध नहीं हो लिया अक एक बी गऊ उन मरण वाल्यां नै मारी थी।

हरियाणे के समाज मैं एक तिग्गी और बताई – दलित विरोध, महिला विरोध और विज्ञान विरोध की तिग्गी। इस तिग्गी नै तो पढ़े लिखे माणसां के दिलां मैं भी घणी डूंगी जड़ जमा राखी सै वट वृक्ष की ढालां। इस तिग्गी का काम सै अक मजाल सै जै तर्क अर विवेक की खुली हवा किसे खिड़की के म्हां कै घर कै भीतर चली जावै।

इसे ढाल कई ढाल की तिग्गी सैं जिन करकै हरियाणा में आर्थिक विकास तो होग्या फेर सामाजिक विकास कै कसूती कैंची मार राखी सै इन तिग्गियां नै। कई बैर तो ये पिछाण मैं ए कोन्या आत्ती। आज ताहिं जिसनै इन तिग्गियां नै छेड़न की हिमाकत करी सै तो छेड़निया का ए नुकसान हुया सै।

मजे की एक बात और सै अक तर्क, विवेक और वैज्ञानिक रुझान की तिग्गी नै सदिया तै इन सामाजिक अवरोध पैदा करण आली तिग्गियां ताहें चुनौती दी सै अर आज बी देवण लागरी सैं। जब ब्रूनो नै कहया अक सूरज धरती के चारों तरफ कोनी घूमता बल्कि धरती सूरज के चारों कान्हीं घूमै सै तो ब्रूनो को धर्म, राष्ट्र्र अर परंपरा की तिग्गी नै जिंदा जला दिया था।

आज बी कोए कैहकै तो देखो अक जिब कोए चीज जलै से तो कार्बनडायक्साइड पैदा हो सै मतलब वातावरण में असुद्धि पैदा हो सै फेर हवन मैं भी तो चीज जलैं सैं तो शुद्धि क्यूंकर होवै सै? खैर इसपै फेर कदे सही।

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