जिस चोट का एक्स-रे नहीं होता

जिस चोट का एक्स-रे नहीं होता

 

डॉ रीटा अरोड़ा

 

“आज फिर चाय ठंडी है।”

“अभी गर्म कर देती हूँ।”

“तुमसे एक काम भी ठीक से नहीं होता?”

वह कप लेकर चुपचाप उठ गई।

रास्ते में आईना पड़ा। उसने खुद को देखा। चेहरा वही था, लेकिन आँखों में कोई और औरत दिखाई दी।

मन में एक सवाल उठा –

“क्या सचमुच हर गलती मेरी ही है?”

फिर वह रसोई में लौट गई।

 

डॉक्टरों को अक्सर मसीहा कहा जाता है। कैंसर का मरीज डॉक्टरों के पास जाता है तो जांच होती है, रिपोर्ट होती है, स्टेज होती है, इलाज का प्रोटोकॉल होता है। कीमोथेरेपी है, रेडिएशन है, सर्जरी है, सपोर्ट ग्रुप हैं। बीमारी कितनी भी मुश्किल क्यों न हो, कम-से-कम उसे एक नाम तो दिया जा सकता है।

 

लेकिन उस औरत की बीमारी का नाम क्या है जो हर सुबह बिल्कुल स्वस्थ दिखाई देती है, मगर भीतर से थोड़ी और मर चुकी होती है?

उसके शरीर पर कोई नीला निशान नहीं, कोई कट नहीं, कोई मेडिकल रिपोर्ट नहीं।

फिर भी शायद कल रात उसके आत्मसम्मान की एक और हड्डी टूट गई थी। तो इसका मेडिकल सर्टिफिकेट कौन बनाएगा?

 

धीरे-धीरे एक अजीब चीज़ होती है।

औरत अपने पति पर शक करना बंद कर देती है और खुद पर शक करना शुरू कर देती है। उसे दुख होता है, मगर वह सोचती है – शायद मैं ही ज्यादा संवेदनशील हूँ। उसे अपमान महसूस होता है, मगर वह सोचती है – शायद उसने मज़ाक किया होगा। वह रोती है और थोड़ी देर बाद खुद ही जाकर माफी मांग लेती है।

 

किस बात की माफी?

उसे भी नहीं पता।

 

यही शायद भावनात्मक अत्याचार की सबसे खतरनाक बात है।

यह इंसान को केवल दुखी नहीं करता, उसकी अपनी समझ पर से उसका भरोसा हटा देता है।

शायद हमारे आसपास ऐसी लाखों औरतें हैं, जो हर रोज़ इसी तरह रसोई, ऑफिस, बच्चों, रिश्तेदारों और मुस्कुराती तस्वीरों के बीच अपने अस्तित्व का एक छोटा-सा टुकड़ा कहीं छोड़ती जाती हैं।

 

हमारे समाज में हिंसा को पहचानने का एक बहुत आसान तरीका बना दिया गया है – खून दिखा तो हिंसा, चोट दिखी तो अत्याचार।

 

हमारी मुश्किल यह है कि हमने हिंसा को देखने के लिए आँखें तो विकसित कर लीं, लेकिन उसे महसूस करने की संवेदना अभी नहीं विकसित की।

किसी महिला के चेहरे पर चोट दिख जाए तो हम पूछते हैं – “किसने मारा?”

 

लेकिन यदि कोई उसे वर्षों तक यह कहता रहे –

“तुम्हें कुछ समझ नहीं आता।”

“हर बात का ड्रामा मत किया करो।”

“तुम्हारी वजह से घर का माहौल खराब होता है।”

“मैंने ऐसा कहा ही कब था?”

“तुम्हें गलत याद है।”

“समस्या मुझमें नहीं, तुममें है।”

 

तो हम क्या पूछते हैं? ……..कुछ भी नहीं।

 

क्योंकि आवाज़ से पड़े घाव दिखाई नहीं देते। यही भावनात्मक हिंसा की सबसे बड़ी ताकत है। वह खून नहीं निकालती। वह इंसान के भीतर बैठकर उसके आत्मविश्वास को धीरे-धीरे खाती है।

 

कल्पना कीजिए कि आपके घर में एक आईना है। हर रोज़ कोई उस पर थोड़ी-सी धूल डाल देता है। पहले दिन फर्क नहीं पड़ेगा। एक महीने बाद चेहरा थोड़ा धुंधला लगेगा। कुछ वर्षों बाद आप आईने के सामने खड़े होंगे और शायद खुद से पूछेंगे –

“मैं पहले ऐसी ही थी क्या?”

 

भावनात्मक रूप से टूटती कई महिलाओं के साथ यही होता है।

 

बाहर से उनकी जिंदगी बिल्कुल सामान्य दिखाई देती है – ऑफिस, बच्चे, त्योहार, मेहमान और सोशल मीडिया पर मुस्कुराती पारिवारिक तस्वीरें।

और नीचे कमेंट आता है – “Perfect family!”

तस्वीर खूबसूरत होती है।

बस उसमें आवाज़ रिकॉर्ड नहीं होती।

उसमें पिछली रात का अपमान नहीं दिखता।

उसमें सुबह के आँसू नहीं दिखते।

 

और यह भी नहीं दिखता कि कैमरे के सामने मुस्कुराने वाली महिला दस मिनट पहले बाथरूम में रोकर आई थी।

 

फिर सवाल उठता है – वह छोड़ क्यों नहीं देती?

 

यही सवाल शायद सबसे आसान है और सबसे निर्दयी भी। क्योंकि हर ऐसा रिश्ता चौबीस घंटे बुरा नहीं होता।

 

कभी वही व्यक्ति प्यार से बात करता है।

कभी फूल लेकर आता है।

कभी कहता है –

“तुम्हारे बिना मैं क्या करता?”

 

और महिला के भीतर बुझती हुई उम्मीद फिर एक बार जल उठती है।

शायद अब सब बदल जाएगा।

शायद आज मेरी तारीफ होगी।

शायद आज मेरी बात सुनी जाएगी।

शायद आज मुझे गलत साबित करने के बजाय समझने की कोशिश की जाएगी।

शायद आज मेरे होने की कद्र होगी।

 

और यही एक शब्द – “शायद” – कई महिलाओं की जिंदगी के वर्षों को निगल जाता है।

लेकिन समस्या केवल घर के भीतर नहीं है। समस्या उस परवरिश में भी है जो अक्सर बेटी को यह सिखाती है –

 

घर बचाना।

समझौता करना।

पति का गुस्सा सह लेना।

बड़ों को जवाब न देना।

हर बात दिल पर न लेना।

चार लोग क्या कहेंगे, यह याद रखना।

 

हम बेटियों को रिश्ते बचाना तो सिखाते हैं, लेकिन एक बात शायद बहुत देर से सिखाते हैं – किसी रिश्ते को बचाते-बचाते खुद को खो देना त्याग नहीं होता। कई बार वह आत्म-विनाश होता है।

 

और दुखद बात यह है कि समाज अक्सर उस महिला को पुरस्कार देता है जो सबसे ज्यादा सहती है।

 

“बहुत समझदार है।”

“घर जोड़कर रखा है।”

“कभी शिकायत नहीं करती।”

 

हम यह नहीं पूछते कि उसकी चुप्पी समझदारी है या थकान।

हम यह भी नहीं पूछते कि घर जुड़ा हुआ है, लेकिन उसके भीतर रहने वाली औरत कितनी टूटी हुई है।

 

जब कोई महिला अपने रिश्ते की तकलीफ बताती है, हमारा पहला सवाल अक्सर होता है –

 

“मारता तो नहीं है?”

वह कहती है – “नहीं।”

 

और हमें लगता है मामला इतना गंभीर नहीं है। जैसे हिंसा की पूरी परिभाषा एक थप्पड़ में समा गई हो।

 

हमें शायद सवाल बदलने होंगे।

 

पूछिए –

 

क्या तुम्हारी बात सुनी जाती है?

क्या तुम्हें अपनी राय रखने की आज़ादी है?

क्या तुम्हारी भावनाओं का मज़ाक बनाया जाता है?

क्या तुम घर में बोलने से पहले शब्द तौलती हो?

क्या किसी की प्रतिक्रिया के डर से अपने फैसले बदल देती हो?

क्या तुम्हें बार-बार छोटा महसूस कराया जाता है?

 

और एक सवाल सबसे जरूरी है –

 

इस रिश्ते में आने के बाद तुम्हें खुद पर भरोसा बढ़ा है या घटा है?

इस सवाल का जवाब शायद किसी एक्स-रे से ज्यादा गहरा हो सकता है।

 

यहां एक फर्क समझना जरूरी है। हर झगड़ा भावनात्मक हिंसा नहीं होता। स्वस्थ रिश्तों में भी विवाद होते हैं, लेकिन वहां माफी, सम्मान और असहमति की जगह बची रहती है। आपको गलत कहा जा सकता है, मगर आपका पूरा वजूद गलत घोषित नहीं किया जाता।

 

लेकिन जिस घर में शांति बनाए रखने के लिए एक व्यक्ति को लगातार चुप रहना पड़े, वहां शांति नहीं होती। वह केवल दबा हुआ शोर होता है।

 

शायद अब हमें घर बचाने की परिभाषा भी बदलनी चाहिए।

 

चार दीवारें बची रहें, इसे घर बचना नहीं कहते।

शादी का कार्ड और तस्वीरें बची रहें, इसे रिश्ता बचना नहीं कहते।

 

अगर किसी महिला की हँसी, राय, आत्मसम्मान, पसंद, सपने और पहचान एक-एक करके खत्म हो जाएँ, तो घर भले खड़ा हो –

उसके भीतर एक इंसान गिर चुका होता है।

 

और शायद यही वह चोट है जिसका कोई एक्स-रे नहीं होता। कोई डॉक्टर उसे रिपोर्ट में नहीं लिखता। कोई रिश्तेदार शादी की तस्वीरों में पहचान नहीं पाता।

 

लेकिन वह चोट होती है।

बहुत गहरी।

बहुत वास्तविक।

और कई बार जीवन भर रहने वाली।

इसलिए अगली बार किसी महिला को देखकर केवल यह मत पूछिए – “तुम्हारा घर ठीक चल रहा है?”

 

एक बार यह भी पूछिए – “उस घर में तुम ठीक हो?”

 

क्योंकि समाज को औरतों को “घर बचाना” सिखाने से पहले शायद यह सीखना होगा कि –

घर बच जाए और औरत मरती रहे, तो वह परिवार नहीं है। वह सिर्फ़ एक अच्छी तरह सजाया हुआ मलबा है।

 

और अंत में सवाल यह नहीं है कि ऐसी महिलाओं को कौन बचाएगा।

पति?…….. परिवार?……….समाज?

 

शायद कभी वे मदद करेंगे।

शायद नहीं।

 

लेकिन शुरुआत एक जगह से हो सकती है।

उस सुबह से, जब कोई महिला आईने में खुद को देखकर पहली बार यह कहना बंद कर दे –

 

“शायद गलती मेरी ही है।”

 

और उसकी जगह कहे –

“मेरी भावनाएँ भी सच हैं। मेरा वजूद भी सच है। और किसी रिश्ते को बचाने की कीमत मैं खुद को मिटाकर नहीं चुकाऊँगी।”

 

क्योंकि शरीर के घाव भरने के लिए अस्पताल होते हैं। रूह के घाव भरने की शुरुआत अक्सर एक छोटे-से एहसास से होती है –

आप मिट्टी की गुड़िया नहीं हैं।

आप एक इंसान हैं।

 

डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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