शंभुनाथ की कविता -गिनती के बाहर रह गए लोग

गिनती के बाहर रह गए लोग

शंभुनाथ

 

वे लोग कहां चले जाते हैं

जो गिनती के बाहर रह जाते हैं

उनके नाम किसी सूची में नहीं होते

उनके हिस्से की रोटी

किसी रजिस्टर में दर्ज नहीं रहती

वे रहते हैं हमेशा शहर के बाहर

शहर में रहते हुए भी

वे सोते हैं बार–बार टूटती नींद में

जागते हैं चाय के खाली कप की तरह

 

वे लोग कहां चले जाते हैं

जिन्हें एक न एक गिनती में होना चाहिए

पर वे खड़े रह जाते हैं ऐसे शिलालेख की तरह

जिसपर इतिहास कभी कुछ नहीं लिखता

बने रह जाते हैं एक ऐसी आवाज़

जिसका कभी प्रसारण नहीं होता

उनका चेहरा कभी स्क्रीन पर नहीं आता

वे होते हैं अतिरिक्त

वे होते हैं बार–बार छांट दिए गए लोग

वे पहचाने जाते हैं केवल अपनी उदासी से

 

वे लोग कहां चले जाते हैं

अपने पैरों में अनवरत तूफान लिए

क्या उनका दुख बाकी से कम सच है

क्या उनकी आँखों में स्वप्न नहीं हैं

क्या वे बरसों का अपमान लिए हुए

एक जलाया हुआ आवेदनपत्र हैं

और केवल अपनी आग में बचे हैं

क्या वे एक दबा हुआ प्रश्न हैं

जिसका जवाब नहीं है सभ्यता के पास

 

वे लोग कहां चले जाते हैं

जिनके दुखों की आधिकारिक भाषा नहीं होती

वे एक मुहावरेदानी में अटके रहते हैं

जैसे– अच्छे दिन आएंगे के मुहावरे में

वे जहां खड़े हैं

पृथ्वी उससे कहीं दूर घूम रही होती है

वे पेड़ के झरे पत्तों की तरह कांपते हैं

झाड़ू के डर से

उनकी ताकती आँखों की थकान

कभी नहीं बन पाती है एक आंकड़ा

 

वे लोग कहां चले जाते हैं

जो अपने हिस्से की दुनिया

थोड़ा-सा रहने लायक बनाना चाहते हैं

वे देखते हैं अपनी आभा

कभी कटी पतंग के पीछे दौड़ते बच्चों में

कभी लंबे इंतजार के बाद

किसान के पहली बरसात छूने में

कभी वे नाव पर मल्लाह को देखते हैं

जो पानी में डालकर अपना हाथ

पकड़ना चाहता है नदी की लहर को

कभी देखते हैं किसी बूढ़े को

जो अपने पहले प्रेम को याद करके मुस्करा रहा है

 

वे लोग कहां चले जाते हैं

जो हर अगली सुबह फिर उठते हैं

और कहते हैं—हम अभी हैं

हमें गिनो या मत गिनो

हम इस दुनिया के बचे हुए मनुष्य हैं

और एक दिन ऐसा भी आता है

जब गिनती के बाहर रह जाने वाले लोग

एक दूसरे को गिनने लगते हैं!

 

 

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