राजनीतिक विश्लेषण
मोदी–शाह संबंध की गुत्थी और 20 जुलाई
अरुण माहेश्वरी
दीपक शर्मा अपने चैनल पर दो दिन पहले ही कह रहे थे कि अमित शाह की भूलें अब मोदी के लिए लगभग असहनीय सी होती जा रही है । वे 20 जुलाई के अतिरिक्त शाह की इधर की और भी कई ऐसी भूलों का उल्लेख कर रहे थे जिनमें लगता है जैसे शाह अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा के बाहर जाकर ऐसी बातें करते हैं जो मोदी और उनके पीएमओ के लिए मुसीबत का सबब बन रही हैं।

उनके अलावा पूण्य प्रसून वाजपेयी के चैनल सहित यूट्यूब के अधिकांश लोकप्रिय चैनलों में कहा जा रहा है कि 20 जुलाई के चलते न सिर्फ धर्मेन्द्र प्रधान का पत्ता साफ हुआ है बल्कि अमित शाह भी साइडलाइन कर दिये गये हैं । पूरे मानसून सत्र में शाह जिस प्रकार मुँह चुराते रहें, उसे आज उनकी नई सामान्यता के रूप में भी देखा जाने लगा है ।
हमारे पास अभी सिवाय इन अनुमानों के कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि अमित शाह नरेंद्र मोदी को फूटी आँखों नहीं सुहा रहे हैं । और न ही हम संसद के मानसून सत्र के दौरान शाह के आचरण की गुत्थी को पूरी तरह से खोल पाने की स्थिति में हैं ।
लेकिन सत्ता में मोदी–शाह का ‘दो शरीर-एक जान’ वाला संबंध कुछ ऐसा दिखता रहा है जिसमें यदि मोदी सत्ता का शरीर हैं तो शाह उसकी क्रियात्मक बुद्धि । मोदी का संघी ज्ञान इच्छा पैदा करता है तो शाह उस इच्छा को प्रशासनिक-राजनीतिक क्रिया, चुनावी गणित और दमनकारी शक्ति में बदलते हैं ।
मनोविश्लेषण की भाषा में कह सकते हैं कि मोदी स्वामी-संकेतक, तो शाह उस संकेतक को अर्थ प्रदान करने वाला क्रिया-तंत्र। दोनों के बीच इसलिये भी कोई दूरी नहीं दिखाई देती थी, क्योंकि शाह की प्रत्येक सफलता ही स्वतः मोदी की सर्वज्ञता का प्रमाण मानी जाती थी।
इसलिए भी शाह की भूलें कोई साधारण सहयोगी की भूलें नहीं कहलायेगी । उनसे सीधे मोदी की ‘सर्वज्ञता’ में दरार पड़ती है। शाह से मोदी की शक्ति का विस्तार होता है, तो स्वाभाविक है कि उनकी विफलता उसी शक्ति के संकुचन का कारण कहलायेगा ।
पर मजे की बात यह है कि इन संघी दिमागों में इतनी समझ नहीं थी जिसे मार्क्स कहते हैं कि “मनुष्य अपना इतिहास स्वयं बनाता है पर अपने मनचाहे ढंग से नहीं, उन परिस्थितियों में बनाते हैं जिनका उन्हें सीधे सामना करना पड़ता है।”
अपने युगल-प्रेम में डूबे हुए इस युग्म को पता ही नहीं चला कि परिस्थितियां कितनी तेजी से बदल चुकी है । न इनको 2024 के चुनाव का वास्तविक अर्थ दिखाई दिया और न ही कोकरोच पार्टी के वेबसाइट पर उमड़े युवाओं के हुजूम का मायने । और देखते-देखते, 20 जुलाई ने भारत की राजनीति के सारे समीकरणों को उलट-पुलट दिया । वे संसद में गणना को ही राजनीति माने हुए अपने आँकड़े कसते रह गए और उधर राजनीति का सत्य समाज की अपनी जमीन से सामने आ गया ।
ऐसे में 20 जुलाई के भूचाल ने तमाम स्तरों पर जो भारी दरारें पैदा की, उसका शिकार यदि मोदी-शाह संबंध भी बना हो तो इसमें हमें भी आश्चर्य नहीं होता है । बल्कि इसे ही प्राकृतिक माना जाना चाहिए । यह खास तौर पर इसलिये भी क्योंकि अमित शाह 20 जुलाई की घटना के एक मामूली चरित्र नहीं, बल्कि उसके एक सबसे प्रमुख रूपाकार की भूमिका में थे, नायक को परिभाषित करने वाले उसके प्रतिरूप प्रमुख खलनायक की भूमिका में ।
इस घटना में शाह की मूल गलती यह नहीं थी कि उन्होंने इसमें पुलिस का प्रयोग किया। वे हूबहू वही कर रहे थे जो उनसे अपेक्षित था । मोदी की राजनीति की पूरी परंपरा का निर्वाह कर रहे थे । इसमें हिंदू-मुस्लिम के अलावा पुलिस, एजेंसियों और प्रशासनिक भय के प्रयोग के अलावा और है ही क्या! लेकिन उनकी असली भूल यह हुई कि उन्होंने एक बदले हुए समाज पर पुराने नुस्खे को आजमाने की कोशिश की।
पुलिस और संघ के गुंडों को लगा कर छात्रों के प्रदर्शन को कुचलने की कोशिश भूसा-भरी मोदी-सत्ता की दृष्टि से शायद एक नियमित प्रशासनिक कार्रवाई थी। लेकिन इस बार पूरा नजारा ही उलट गया। जिस कार्रवाई का उद्देश्य प्रदर्शनकारियों को नगण्य, हास्यास्पद बना कर डरा-धमका कर भगा देना था, उसी ने उन्हें समाज में साहस के प्रतीक में बदल दिया। सीजेआई सूर्यकांत ने जिनका “कोकरोच” नामकरण करके प्रकारांतर उन तुच्छ जीवों को पैरों तले कुचल कर मार देने की सजा सुनाई थी और सरकार जिस सजा पर अमल कर रही थी, उसे ही पुलिस की निर्मम कार्रवाई ने विद्रोही शक्ति के चिह्न में बदल लिया। जमीनी हकीकत ने सत्ता की भाषा के अर्थ को ही उलट दिया । जिस संघी गिरोह ने अलौकिक मोदी की कल्पना करके तेजी से ऐतिहासिक गति की क्षमता पा ली थी, सहसा वह अपने को एक मृतयुग में प्रत्यावर्तित पाती है ।
लकान कहते हैं कि संकेतक कभी भी पूरी तरह से अपने स्वामी के नियंत्रण में नहीं रहता। ऐलेन बाद्यू के अर्थ में संकेतक की तरह की हर एक गिनती अनंत संभावनाओं की बहुलता के समुच्चय का नामकरण होती है । वे हमेशा एक ही अर्थ पैदा नहीं करते ।
भारत के सीजेआई सूर्यकांत और मोदी ने “कोकरोच” शब्द के द्वारा युवाओं को कीड़-मकोड़ा बनाना चाहा, पर जेन जी ने उसी शब्द को अपने निर्भय अस्तित्व का नाम बना दिया। जो गाली थी वही पहचान बन गई । जिसे भय उत्पन्न करना था, उसने सामूहिक उल्लास और साहस पैदा किया। हम सबने देखा कि 20 जुलाई केवल पुलिस की दरींदगी की नहीं, सत्ता के प्रतीकात्मक तंत्र की पराजय की पहचान बन गया।
अमित शाह की अराजनीतिक, धोखा, डर और हत्या पर टिकी सीमित राजनीतिक समझ को इस बात का अंदाज लग ही नहीं सकता था कि समाज में किस हद तक असंतोष का बारूद पहले से फैला हुआ है । सरकार में निश्चय ही कुछ लोगों ने उन संकेतों को पढ़ा भी होगा । पर मोदी-शाह जैसों का दंभ उन सब को किनारे करने के लिए काफी था । जब मोदी ने ही कभी बेरोजगारी, परीक्षाओं में धांधली, आर्थिक असुरक्षा, संस्थाओं पर बढ़ते हुए अविश्वास आदि को स्वीकृति नहीं दी तो भला शाह कैसे उन्हें मान लेते! मोदी अपने झूठे आंकड़ों की माया में फंसे रहे और शाह अपने दमन-तंत्र के मद में डूबे रहे । कह सकते हैं कि परिस्थितियों से बेखबर अमित शाह ने दिल्ली पुलिस के माध्यम से, प्रत्यक्ष रूप में समाज में फैले हुए बारूद में तिल्ली लगाने की भूमिका अदा की ।
शाह ने समझा था कि राज्य की हिंसा घटना को समाप्त कर देगी, पर उस हिंसा ने ही 20 जुलाई को घटना बना दिया। ऐसी घटना जिसे बाद्यू कहते है कि जो सभी पूर्व-निर्धारित गणना के बाहर निकलकर नई संभावनाओं को जन्म देती है।
2014 के बाद मोदी-शाह सत्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने अपने को ही देश का “बड़ा अन्य” (Big Other), मोदी की खुद की भाषा में “अलौकिक” बना लिया था, अर्थात् जो सब जानता है, सब देखता है और अंततः सब कुछ पर काबू भी पा लेता है। अभी राहुल गांधी इंदौर में कह रहे थे कि अजित डोभाल के अनुसार देश के सिर्फ 500 पदाधिकारियों पर कब्जा कर लो, देश तुम्हारी मुट्ठी में होगा । मोदी-शाह ने वास्तविकता में कुछ वैसा ही कर लिया था । पूंजी, चुनाव, पुलिस, कानून और कार्यपालिका, सब को मुट्ठी में कर वे 2024 के झटके के बाद भी, नितीश-नायडू को पॉकेट में डाल कर झूम रहे थे । बंगाल में ममता को पटखनी देने के बाद तो शाह का तेवर सातवें आसमान पर चला गया था । दुर्बलता हमेशा चमत्कारों में विश्वास का सहारा लिया करती है । मोदी गिरोह ने शाह के चमत्कारों से कल्पना कर ली कि शत्रु पराजित हो गया है जबकि वास्तव में उसे सिर्फ कल्पना में फूंक कर उड़ाया गया था । उन्होंने वर्तमान का समस्त अवबोध ही भुला दिया।
20 जुलाई के अघटन से जनमानस में जो वास्तविक व्यापक परिवर्तन हुआ है, उसका सबसे महत्वपूर्ण अर्थ यही है कि लोगों में अब मोदी का इकबाल खत्म हो गया है। संभव है कि सत्ता का डर आज भी अवशिष्ट हो, पर उसकी नैतिक मान्यता नहीं बची है।
बल्कि इसके ठीक विपरीत 20 जुलाई ने ऐसी परिस्थिति तैयार कर दी जिसने राहुल गांधी को पुकारते हुए कहा कि आओ! अब यहां कूद पड़ो! भारत जोड़ों यात्रा के यशस्वी राहुल सामाजिक असंतोष और आकांक्षाओं के प्रतीक बन गए । जनता उनमें एक वैकल्पिक भाषा, वैकल्पिक साहस और वैकल्पिक भविष्य की संभावना देखने लगी है।
कहना न होगा, यह बदलाव ही मोदी के लिए किसी चुनावी पराजय से भी अधिक भयावह है। चुनावी हार को तो जोड़-तोड़ से सुधारा जा सकता है, पर प्रतीकात्मक सत्ता के ह्रास को पुलिस और सूर्यकांत जैसे न्यायाधीशों के जरिये वापस नहीं पाया जा सकता है।
जो अमित शाह कभी मोदी के लिए एक ऐसा व्यक्ति था जो वह सब कर सकता था जिसे स्वयं मोदी खुले रूप में नहीं कर सकते थे। वे सत्ता के अंधेरे पक्ष को, दमन, खुफियागिरी, खरीद-फरोख्त और प्राणघाती हमलों तक के कामों को संभालते थे, और मोदी के लिये अलौकिक ईश्वरीय सत्ता बनने का अवसर तैयार करते थे, वे ही अब 20 जुलाई के राजनीतिक विस्फोट के केंद्रीय चरित्र के रूप में मोदी की पूरी सत्ता के विध्वंस का कारण साबित हुए हैं । अब वे मोदी की शक्ति नहीं, उस भूल की जीवित स्मृति बन चुके हैं जिसने पूरी जनता को मोदी के खिलाफ मैदान में उतार देने और उसकी कमान राहुल गांधी के हाथ में सौंप देने का काम किया है । अब शाह में मोदी को निश्चित तौर पर अपना क्षरित होता सम्मोहन दिखाई देता होगा!
शाह क्रमशः मोदी की ऐसी कभी न तृप्त होने वाले गुह्यवासना का रूप बन चुके हैं जिसे वे न खुल कर अपना सकते हैं और न अपने से अलग कर सकते हैं। मोदी उन्हें हटा नहीं सकते, क्योंकि शाह उनके शासन की संरचना, उसके रहस्यों और उसकी कार्यपद्धति के वाहक हैं। लेकिन उन्हें पहले की तरह अपने पास भी नहीं रख सकते, क्योंकि उनकी उपस्थिति उन्हें लगातार उस राजनीतिक दुर्घटना की याद दिलाती है जिसने मोदी की कल्पित अभेद्य छवि में प्रत्यक्षतः छेद कर दिया है।
किसी की ऐसी निकटता ही अक्सर असहनीयता में बदल जाती है। जिसे अपना विश्वसनीय सहारा मानते हैं, वही पतन की आशंका का दर्पण बन गया है।
इसीलिये अभी मोदी के जन्मदिन पर अमित शाह द्वारा आरती उतारने का दृश्य हमें बेहद त्रासदीपूर्ण लगता है । यह ‘पूज्यता’ की छद्म भाजपाई संस्कृति का प्रदर्शन नहीं है । इससे लगता है जैसे शाह मोदी से राजनीतिक भाषा में संवाद की स्थिति में नहीं बचे हैं। पूजा-अनुष्ठान से भगवान को खुश करना चाहते हैं! इस आरती में यह आर्त-विनती है कि “ भगवन्! मैं शरणागत! बस आपका ही हूँ, मुझे दूर न करें!”
कौन नहीं जानता कि ऐसे पूजा-पाठ उस दरार को नहीं भर सकते जो वास्तविक राजनीति से पैदा हो चुकी है। भक्ति का यह अतिरेक विश्वास की दृढ़ता का नहीं, विश्वास के संकट का प्रतीक है। जिसे बार-बार अपनी वफादारी प्रदर्शित करनी पड़े, उसकी वफादारी निश्चय ही सत्ता की नजर में पहले ही संदिग्ध हो चुकी होती है।
कुल मिला कर यह साफ है कि आज मोदी और शाह के डर एक नहीं है । मोदी का संकट उनकी छवि का संकट है, और इसीलिये वे महीने भर तक अपने जन्मदिन के आयोजनों से अपने अब भी जीवित होने की घोषणा करते रहना चाहते हैं । लेकिन शाह का डर अधिक ठोस है। उन्हें अपने उपयोगी न रह जाने का डर है। सत्ता में उनका स्थान किसी जन-समर्थन का मुहताज नहीं, उनकी उपयोगिता से बना था। उनके काम जब अस्थिरता पैदा कर रहे हो तब उनकी क्या उपयोगिता! इस प्रकार एक को अपनी छवि खोने का भय है; दूसरे को अपनी उपयोगिता खोने का। दोनों एक-दूसरे को अपने-अपने संकट का कारण मान सकते हैं, जबकि वस्तुतः संकट उस समाज ने उत्पन्न किया है जो अब पुरानी सत्ता-भाषा को स्वीकार नहीं कर रहा।
फिर भी इसे विडंबना ही कहेंगे कि मोदी शाह से मुक्त नहीं हो सकते, क्योंकि शाह में उनकी सत्ता का वास्तविक इतिहास जमा है। शाह मोदी से स्वतंत्र नहीं हो सकते, क्योंकि मोदी के बिना वे कुछ भी नहीं है । दोनों एक-दूसरे से बँधे हुए हैं, पर अब यह बंधन पारस्परिक शक्ति का नहीं, पारस्परिक भय का बंधन हो चुका है। यह केवल दो व्यक्तियों का मनमुटाव नहीं है, उस सत्ता-संरचना की बेचैनी है जिसका ‘बड़ा अन्य’ गिर चुका है, पर जिसके संचालक अब भी उसे जीवित मानना चाहते हैं। अब मोदी को शाह की भूलें इसीलिए असहनीय लग सकती हैं क्योंकि उनमें उन्हें शाह की अकुशलता से अधिक अपनी सत्ता की असंभवता दिखाई देती है!
अरुण माहेश्वरी के ब्लाग चतुर्दिक से साभार
यह भी पढ़ें…
