लघु कथा
परखना मत
डॉ. रीटा अरोड़ा
“भैया, माँ के जन्मदिन पर गाँव चलोगे?”
“देखेंगे।”
“फिर वही?”
“काम है।”
“काम… या मन नहीं?”
बड़ा भाई चुप रहा।
कहना चाहता था- मैंने तुम्हारे लिए कितना छोड़ा है।
लेकिन एक ही फ्लैट के दो कमरों में रहते वर्षों की चुप्पी ने शब्दों को भीतर ही रोक रखा था।
छोटा भाई धीरे से बोला,
“आपको मेरी ज़रूरत कभी नहीं पड़ी?”
“तुमने पूछा कब?”
“आपने बुलाया कब?”
बड़े भाई के भीतर कुछ कसक उठा।
जिसे आगे बढ़ाने के लिए खुद पीछे रहा, वही आज मुझे दूर समझता है…
वह धीमे से बोला,
“घर मैंने संभाला था।”
छोटा भाई हल्का-सा हँसा।
“और मुझे?”
“तुम्हें उड़ने दिया।”
“या अकेला छोड़ दिया?”
कमरे में चुप्पी उतर आई।
दोनों जानते थे- सालों से वे एक-दूसरे को समझने से ज्यादा परखते रहे थे। कौन पहले फोन करेगा? कौन पहले पूछेगा? कौन पहले अपनी बात छोड़ेगा?
छोटे भाई की नज़र माँ की तस्वीर पर टिक गई।
“माँ को सरप्राइज़ देंगे?”
बड़े भाई ने तस्वीर की ओर देखा।
“साथ चलेंगे?”
छोटा भाई कुछ नहीं बोला।
उसने मोबाइल खोला। ट्रेन की तारीख डाली। दो यात्रियों के नाम भरे।
कुछ पल स्क्रीन देखता रहा।
फिर छोटे भाई ने मोबाइल की स्क्रीन पर ‘Book Now’ का बटन दबा दिया।
दोनों चुप रहे।
बड़े भाई ने धीमे से पूछा,
“टिकट हो गई?”
“हाँ।”
“दोनों की?”
छोटे भाई ने स्क्रीन उनकी ओर कर दी।
बड़े भाई ने नाम देखे। कुछ कहना चाहा, फिर बस सिर हिला दिया।
मोबाइल वापस छोटे भाई की हथेली में आ गया।
माँ की तस्वीर के सामने दोनों कुछ देर वैसे ही बैठे रहे।
मां के जन्मदिन पर इकट्ठे जाने का ट्रेन का समय तय हो चुका था।
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