नोएडा के मजदूरों की लड़ाई: अदालत का फैसला, जनता की जीत! 

नोएडा के मजदूरों की लड़ाई: अदालत का फैसला, जनता की जीत!

धर्मेन्द्र आज़ाद

 

नोएडा के हालिया मजदूर आंदोलन से जुड़े मामले में मनगढ़ंत मुकदमा दर्ज करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा नोएडा की जिलाधिकारी से 5 लाख रुपये की वसूली का आदेश देना और आंदोलनकारी मजदूरों के समर्थन में खड़ी छात्रा आकृति चौधरी पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) को रद्द करने का फैसला निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है। यह प्रशासन की जवाबदेही तय करने वाला महत्वपूर्ण कदम है और यह संदेश देने की कोशिश है कि राज्य की शक्ति का इस्तेमाल नागरिकों और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने के लिए मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता।

पूँजीवादी व्यवस्था में ऐसे फैसले सामान्य नहीं हैं। आम तौर पर राज्य की संस्थाएँ व्यवस्था और उसके ताकतवर हितों की रक्षा को प्राथमिकता देती दिखाई देती हैं। संघर्षरत वर्गों की आवाज़ को दबाने, उन्हें बदनाम करने या अपराधी साबित करने की कोशिशें इसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाती हैं। ऐसे माहौल में जब कोई अदालत प्रशासनिक मनमानी पर सवाल उठाती है और उसकी जवाबदेही तय करती है, तो ऐसे फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए।

लेकिन इस फैसले को केवल एक कानूनी घटना के रूप में देखना भी पर्याप्त नहीं होगा। देशभर में उभरते जनसंघर्षों और आंदोलनों ने सामाजिक और राजनीतिक माहौल को निश्चित रूप से प्रभावित किया है। इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि बढ़ता जनदबाव न्यायपालिका जैसी संस्थाओं को जनता के बढ़ते आक्रोश के बीच इस लुटेरी व्यवस्था की विश्वसनीयता बचाने के लिए कदम उठाने पर मजबूर कर रहा है।

यह बदलाव अनायास नहीं लगता।जिस सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश कभी बेरोज़गार युवाओं को ‘कॉकरोच’ जैसी अपमानजनक उपमा देने के लिए आलोचना का सामना कर चुके हैं, उसके हालिया रुख में आंदोलनकारी युवाओं के प्रति अपेक्षाकृत संवेदनशीलता दिखाई देना भी गौर करने लायक है। इसे सीधे-सीधे आंदोलनों का परिणाम कहना जल्दबाज़ी हो सकती है, लेकिन बदलते जनदबाव के संदर्भ में इसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता।

 

कभी-कभी व्यवस्था को अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए ऐसे फैसलों के ज़रिये यह संदेश देना भी जरूरी हो जाता है कि वह पूरी तरह ताकतवर वर्गों के पक्ष में खड़ी नहीं है। लेकिन ऐसे सीमित और सकारात्मक फैसलों को व्यवस्था के चरित्र में बुनियादी बदलाव समझ लेना भी भूल होगी। जनता के संघर्ष में ही वह असली ताकत है जो इस जनविरोधी सत्ता और संस्थाओं को लगातार जवाबदेह बनाए रखे।

एक बात बिल्कुल स्पष्ट है—लोकतंत्र सिर्फ चुनावों से नहीं चलता। जनता की संगठित, शांतिपूर्ण और लगातार उठती आवाज़ ही लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण शक्ति है।

जनता जितनी संगठित होगी, उसके संघर्ष जितने व्यापक होंगे और अन्याय के खिलाफ उसकी आवाज़ जितनी बुलंद होगी, उतना ही सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका समेत हर लोकतांत्रिक संस्था पर नागरिक अधिकारों के प्रति जवाबदेह रहने का दबाव बढ़ेगा।

इसलिए यह फैसला स्वागतयोग्य है—लेकिन इसे मंज़िल नहीं, संघर्ष से हासिल हुई एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण जीत के रूप में देखा जाना चाहिए।

अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठती रहनी चाहिए।

संघर्ष जारी रहना चाहिए—शांतिपूर्ण और संगठित तरीके से।

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