अनुपम शर्मा की कविता – आखिर क्यों?

कविता

आखिर क्यों?

अनुपम शर्मा

 

मेहनत मज़दूरी करता है

हाड़ मांस गलाता है

पूंजीवाद की भट्टी में

शोषण से जल जाता है

उसकी मेहनत का फल भी उसे नहीं मिल पाता है

आखिर क्यों..?

 

किसान बन फसल उगाता है

बुनकर बन कपड़ा बनता है

ईंट भट्ठे पर ईटे भी बनाता है

मशीनी युग में मशीन-सा बन जाता है

वह मूलभूत सुविधाओं के लिए बेजार नज़र आता है…

आखिर क्यों..?

 

लोकतंत्र की रक्षा हेतु

मतदान करने जाता है

राजनेताओं की चालों में

ईवीएम के घोटालों में

उसके सपनों का भारत उसके सामने लुट जाता है..

आखिर क्यों..?