सामाजिक विद्रूपताओं का आहत कथाकारः ललित कार्तिकेय

सामाजिक विद्रूपताओं का आहत कथाकारः ललित कार्तिकेय

ललित कार्तिकेय

 ( 3.4.1958 — 19.6.2012 )

 

ओमसिंह अशफ़ाक

ललित कार्तिकेय के विशिष्ट रचनात्मक कौशल का प्रमाण हमें उनकी कहानी ‘हीलियम’ की शुरुआती लाइनों में ही मिलना शुरू हो जाता है।

कहानी के प्रथम पैरा को हम यहां उद्धृत कर रहे हैं, ताकि पाठक खुद देख सकें कि किस आधुनिक दृष्टि-विधान और शब्दावली का उपयोग करते हुए ललित एक नवयुवती की मानसिक स्थिति में प्रवेश करके एक रोमांचक रूपक का वितान खड़ा करके पाठक को चौंका देते हैं :

‘छोटे कद, साँवली रंगत और पेजकट बालों वाली उस लड़की में सेवेंटी एम.एम. दिमाग था और दिमाग में ईस्टमेन कलर का एक सपना!

सपना कोई स्थिर चित्र नहीं था कि वह खुद या कोई और उसे अंतिम रूप से एक ही बार में बयान कर सकता। वह एक फिल्म की मानिंद था—बहते हुए दृश्य, एक के बाद एक होती घटनाएं।

इस स्वप्न प्रवाह का कोई अन्त नहीं था। इसमें रोज कुछ दृश्यों और घटनाओं, पात्रों और संवादों का इजाफा होता जाता। वह पुराने दृश्यों के डिटेल्स बदल कर, पात्रों के हेयर स्टाइल और पहनावे इत्यादि में तब्दीलियां कर उन्हें लगातार ‘अप-टू-डेट’ करती रहती।

‘हाँ, मुख्य पात्र ज़रूर फाइनल हो चुके थे। वह एक खुद, दूसरा उसका नायक—सफेद दूधिया दाँतों, चमकीली आँखों वाला एक लम्बा, आकर्षक पुरुष। यूँ वह उस पुरुष का नाम-पता पक्के तौर पर नहीं जानती थी।

अनेक रूपों में अनेक जगह वह उसे दिखता रहता था—कभी शूटिंग-शर्टिंग के विज्ञापनों में, कभी कनाट प्लेस के बरामदों में, कभी उन नए बसते ‘विहारों’ में जहां वह ट्यूशन पढ़ने जाया करती थी।’

‘हेलियम’ की नायिका के चरित्र के अनुरूप ही ललित ने कहानी के लिए अत्यंत उपयुक्त शीर्षक का चुनाव किया है और उसी के अनुरूप पात्रों के चरित्र-चित्रण का कहानी के अंत तक निर्वाह भी किया है।

हम जानते हैं कि ‘हीलियम’ हवा से भी हल्की ऐसी गैस होती है, जिसको गुब्बारों में भरकर उड़ाया जाता है। कहानी की नायिका नवयौवना का दिमाग भी सतत् सपने बुनकर किसी गुब्बारे की तरह कल्पना की दुनिया में उड़ा रही है।

यूँ समझिए कि लड़की हवा के घोड़े पर सवार है और उसे अपने आसपास और अपने चारों तरफ घट रही दुनियावी घटनाओं की कोई परवाह ही नहीं है।

यहां तक कि अपने घर-परिवार की तनावग्रस्त स्थिति का उसके ऊपर कोई असर नहीं पड़ता दिखता है। दिन में सपने देखने जैसे मुहावरे की ईजाद किसी ने ऐसी ही परिस्थिति के लिए की होगी।

‘इश्क अंधा होता है’- वाली कहावत का प्रचलन भी यहीं से शुरू हुआ होगा। युग और समाज भले कोई भी रहा हो।

सोहनी-महिवाल, हीर-रांझा जैसे उपाख्यानों का जन्म उम्र के इसी पड़ाव पर होता है, जिस पर ‘हीलियम’ की नायिका हमें खड़ी मिलती है।

लेकिन ‘हीलियम’ 21वीं शताब्दी की दहलीज पर खड़ी नायिका की कहानी है। सोहनी और हीर का युग कभी का बीत चुका है, नायिका की माँ इस तथ्य को जानती तो है।

लेकिन जिन सीमित साधनों और सीमाओं के भीतर वह अन्य पड़ोसियों से बेहतर दामाद जुगाड़ना चाहती है, वह भला आज के दौर में कैसे संभव हो सकता है।

लड़की का पिता इस वास्तविकता को समझता है। यथार्थ की जमीन पर खड़े होकर सोचना-समझना चाहता है कि इन परिस्थितियों में इस तरह के हथकंडों से यह संकट टलने वाला नहीं है।

इसके लिए सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन जरूरी है और वह क्रांति के जरिए ही संभव है, लेकिन क्रांति कैसे की जाएगी, यह उसे और उसके साथियों को भी मालूम नहीं है।

ऐसा कहानी में उनकी बहस और विमर्श के संवादों को सुनकर अंदाजा लग जाता है। पति और पत्नी दोनों तनावग्रस्त हैं, लेकिन दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं।

और दोनों ही रास्ते असंगत, अप्रासंगिक और अप्रयोज्य हैं।

इसलिए समाधान की कोई सूरत नजर नहीं आती देखकर पति पागल हो जाता है और पत्नी हृदय रोग की मरीज बन जाती है। उधार की चीजों का जुगाड़ करके भी नायिका के लिए नायक (दामाद) जुटाना संभव नहीं हो पाता है। इसलिए ऐसी त्रासदी घटित होती रहती है।

‘देखने वाले आए। बात नहीं बनी। कहीं न कहीं गड़बड़ हो जाती। लड़का ठीक होता, तो इनकम कम होती, इनकम उम्मीद के आसपास होती तो लड़का ‘टाल एंड हैंडसम’ न होता, कहीं दोनों बातें पूरी होतीं तो लड़के वाले डाक से जवाब देने की बात कहकर चले जाते।

..शहर में रोज स्टोव फटने लगे थे। बहुएं जलतीं या जला दी जातीं। मम्मी बड़बड़ाती—‘हे भगवान! ये क्या हो रहा है?’ लड़की को भी समझ न आता कि क्या हो रहा है।

उसे कभी डर लगने लगता। वह मम्मी को कई बार अकेले में रोते पाती। फिर एक दिन पापा एक महीने तक भूले रहे कि वे कौन हैं। सुखीजा की कार में मम्मी उन्हें अस्पताल ले गई। डॉक्टरों ने उन्हें मनोवैज्ञानिक वार्ड में दाखिल कर लिया। अगले दिन मम्मी को भी ग्लूकोज चढ़वाना पड़ा।

मम्मी के बनाए रास्तों पर अब सारी भाग-दौड़ लड़की के पैरों को करनी पड़ती। ढेरों हिसाब-किताब, ढेरों जोड़-तोड़। उसने मुफ्त में सुखीजा के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया।

सुखीजा के एक दोस्त ने ‘ऑक्सफोर्ड कॉन्वेंट मॉडल स्कूल’ खोला। लड़की ‘फोर द टाइम बीइंग’ टीचर हो गई। सुबह आठ बजे स्कूल निकलती, दो से आठ ‘विहारों’ में नए रईसों के बिगड़े बच्चों को ट्यूशनें पढ़ाती।

बच्चों की मुटापेग्रस्त मम्मियों से बात की बात में घुल-मिल जाती। उनके घरों में आने वाली चीजों के बारे में जानकारियां लेती। घर के स्कूल की देखभाल, लाटरियां, स्टॉक-शेयर, सामाजिकता के तकाजे—सब लड़की के जिम्मे!

वह बेहद थक जाती..लेकिन दिन की तमाम व्यस्तताओं और थकान के बावजूद बीच-बीच में टिंनिंग-टिंनिंग का संगीत बजता, घोड़ों के अयाल उड़ते!

पर रात को जब उसके पास कोई व्यस्तता न बचती, वह अपनी उम्र के साल गिनती तो एक बेचैनी से भरने लगती। उसे अपना-आप बहुत अकेला लगता। घर ही के लोगों के चेहरे सवाल बनकर उसे घेरने लगते।’

अन्ततः नायिका के मन में टिंन..इंग, टिंन..इंग की घंटी बजने की आवृत्ति शनैः-शनैः कम होती जाती है और सफेद अरबी घोड़ों की तरह दौड़ने वाली नायिका के मन की वे इच्छाएं भी अब दम तोड़ने लगती हैं।

वह अपनी उम्र के गुजरे सालों की गिनती करके डरने लगती है। उसे नींद में डरावने सपने आने लगते हैं :

‘उसे नींद में बुरे-बुरे सपने आते—पागल, जंगली हाथियों का चिंघाड़ता हुआ एक झुंड उसकी कोठी के फूलों और पौधों को अपने भारी-भरकम पैरों से कुचल रहा है..

वे दरवाजे तोड़कर ड्राइंग रूम, किचन, बेडरूम में घुस आए हैं.. उत्पात मचा रहे हैं..एक हाथी ने पुरुष को अपनी सूंड में उठा दीवार पर दे मारा है…प्लास्टर ऑफ पेरिस के बुत की तरह पुरुष खील-खील हो गया है…

टूटे हुए टी.वी., वीडियो, स्टीरियो पर्शियनकालीन पर बिखरे पड़े हैं…हाथी मारुति से फुटबाल खेल रहे हैं…बड़ा हंस रहा है….’

‘सुबह की रोशनी और परिचित चीजें, चेहरे, आवाज़ें उसे आश्वस्त करते। जाने-पहचाने रास्ते फिर फैलने लगते—फैलते जाते, फैलते जाते! वह दौड़ने लगती? हाथियों की चिंघाड़ें और बड़ों की हंसी व्यस्तता में खो जाती।

सारी व्यस्तताओं के बावजूद कभी-कभी टिनिंग, टिनिंग का संगीत लौट आता, घोड़ों की टापें सुनाई देने लगती….’

कहानी के ‘टेक्स्ट’ से ही यह भी स्पष्ट हो जाता है कि नायिका के उपभोक्तावादी प्रतिस्पर्धात्मक व्यक्तित्व को उसकी मां ने गढ़ा है, जो खुद उपभोक्तावादी-अपसंस्कृति के गर्त में डूब चुकी है और उसी के पैदा किए हथकंडों के जरिए कामयाबी के सोपान चढ़ना चाहती है, जोकि संभव नहीं है।

ललित के कहानीकार की आलोचना यह कहकर तो की जा सकती है कि यह आधुनिकतावादी सोच की कहानी है और यह सोच समस्या का कोई वैचारिक समाधान का रास्ता नहीं खोजती है। इसमें शब्दक्रीड़ा अधिक हैं और इससे रचनात्मक विवेक प्रक्रिया धरातल पर क्रिया में नहीं बदल पाती है। सच है।

लेकिन हम इसे अयथार्थवादी कहानी तो नहीं कह सकते हैं? जटिल समस्या का सटीक प्रस्तुतीकरण और विश्लेषण तो कहानी करती ही है। अपनी पूरी विश्वसनीयता, रोचकता और मारकता के साथ।

देखना ये भी होगा कि समाधान की दिशा इंगित करने वाली वैचारिकता की कहानी भी तो परिवर्तन की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ा पा रही है और वह भी एक ‘यूटोपिया’ बनकर रह जाती है।

इस मोड़ पर हमें नई सोच, नई रणनीति और नए औज़ारों की खोज करनी ही होगी, तभी बदलाव की प्रक्रिया में तेजी की आशा की जा सकती है।

ललित की तमाम कहानियों में हमें विभिन्न प्रसंगों में घटित होती त्रासदी की रंगत दिखाई पड़ती है। भले उसके रंग और कोण अलग-अलग हों।

एक ‘कलावादी की फुसफुसी ट्रेजडी’, ‘त्रिशंकु का त्रेत’, ‘तलछट का कोरस’ और ‘हौआ’ कहानी का यहां उल्लेख किया जा सकता है, जिसका वैकल्पिक शीर्षक ‘अथ लल्लननाथ उवाच’ भी हो सकता है।

क्योंकि उसमें त्रासदी के अंदर व्यंग्य का भी तड़का लगा हुआ है, जो कहानी की रोचकता को बढ़ाता है, जैसाकि हम एकाध उदाहरण की प्रस्तुति के जरिए पाठकों को दिखाना भी चाहेंगे।

शिल्प, फंतासी, व्यंग्य, रोमांच, बिंब, उपमा, प्रतीक, तिलिस्म, मारकता, रोचक संवादों से कथानक की बुनावट और आधुनिक निर्मित-भाषा शब्दावली, सब मिलकर ललित की कहानी की जबरदस्त ताकत बनकर पाठक को बांध लेते हैं :

‘18 वर्ष पहले किसी दूर के शहर से स्कूल मास्टरी छोड़ कर लल्लन नाथ जब यहाँ आए और प्रोफेसर एल.एन. भ्रमर कहलाए तो कस्बा टुकुर-टुकुर आँखें खोल, नए जमाने की ओर घुटनों चलना शुरू हो चुका था।

ऊपरी तौर पर उसका आचार-व्यवहार-आकार हालाँकि अभी भी कमोबेश एक बड़े गाँव जैसा था। चारों ओर बबूल के जंगल थे, पीली भूड़ और खेत जिनमें यहाँ-वहाँ ढेर सारे कच्चे गाँव बिखरे पड़े थे।

हर गाँव से बैलगाड़ी की एक लीक शुरू होती और कस्बे की सड़क में कहीं गुम जाती। सड़क की ढलान मंडी और 25-30 दुकानों के बाजार की ओर थी।

कच्ची लीक की नालियों से बहता हुआ गाँवों का सत्त-सार सड़क के काले नाले में आ गिरता, फिर बंटकर आढ़तियों और दुकानदारों के गल्लों में छोटे-बड़े चक्कों की शक्ल में ठहर जाता।

इस सत्त से सिंच-सिंच लक्ष्मी की भौंडी तस्वीरें और शुभलाभ के पास पादता बैठा मंडी-बाजार मैले बनियानों, चिक्कट पजामे-धोतियों और पट्टेदार घुटन्नों में मुटाता जा रहा था।

धीरे-धीरे मंडी और बाजार की नाभि से नाले निकल-निकल आसपास, दूरदराज के शहरों, बड़े शहरों के मुटापों से जुड़ती-फैलती चली गई थीं।

‘त्रिशंकु का प्रेत’ जोकि मध्य वर्ग के प्रतिनिधि पात्र को उपभोक्तावाद की दलदल में फंसा कर लील जाता है, उसका परिचय कहानीकार निम्न शब्दों में प्रस्तुत करता है :

‘इस शहर में समर्थ भद्रजनों की एक ही बस्ती थी। वहीं गोयल का मकान था। उसमें एक टाइट ड्राइंग रूम था—चिकने पन्नों वाली पत्रिकाओं के विज्ञापनों में छपे ड्राइंग रूम की तर्ज पर तैयार किया गया।

मैं पहले उसमें एक ही बार गया था। इतनी कम जगह में इतनी सारी चीजों की प्रदर्शनी थी कि आदमी उसमें ठीक से चल-फिर, उठ-बैठ भी नहीं सकता था। चीजें इस्तेमाल के लिए कम, होने की संतुष्टि के लिए ज्यादा थीं।

वहाँ से लौट कर तब मैंने दोस्त से कहा था—अपने घनश्याम की झुग्गी ज्यादा अच्छी है। इंसान आजाद महसूस करता है। उस साले छैल गोयल के ड्राइंग रूम में तो लगता है—चीजों ने कैद कर लिया है।’

‘…असली विनाश-देव तो तू भी नहीं है छैल गोयल! वह तो पिरामिड के सिर पर सोया है और अपनी हर विषैली सांस के तूफान में जाने कितनों को लपेट सोते-सोते उन्हें डस रहा है।

‘तू तो उस विनाश-देव की प्रेत सेना का एक बेहद अदना-सा सैनिक है, एक छोटा-मोटा मेफिस्टोफिलिस!…पर सेनाएं तो और कहीं भी तैयार हो रही हैं और वे तेरे जैसे प्रेतों की सेनाएं नहीं हैं!

‘मेरा दोस्त उन्हीं सेनाओं का एक संभावित सैनिक था—संभावित, क्योंकि उसकी जड़ें बीच वाली मंजिल पर थीं। इसीलिए तू या तेरा स्वामी विनाश-देव इसे हमसे छीन ले गया।

‘ये हादसा एक सबक है,जो मैंने ले लिया है। यह हादसा एक कवच है,जो मैंने पहन लिया है। मैली गंगा से यारी–जिंदाबाद! प्रेत बीमारी–मुर्दाबाद!!’

इस रूपक के जरिए कथाकार पाठक को बड़ी आसानी से साम्राज्यवादी-पूंजीवाद की हकीकत समझ जाता हैं और मध्य-वर्ग के पात्रों की फिसलन भी स्पष्ट दिख जाती है।

साथ ही यह संकेत भी पाठक को मिल जाता है कि उपभोक्तावाद की चमक-दमक के जाल में फंसने की बजाए हमें अपनी गरीब जनता से ही दोस्ताना कायम करना चाहिए।

(अप्रैल, 2013)

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