राजकुमार कुम्भज की कविता – सिखाया पिता ने यही सिखाया

पितृ दिवस पर विशेष

कविता

सिखाया पिता ने यही सिखाया

राजकुमार कुम्भज

सिखाया पिता ने यही सिखाया

हार जाना पर कभी भी हार नहीं मानना

हार जो मानोगे तो लड़ना भूल जाओगे

शत्रुओं से फिर कभी भी लड़ नहीं पाओगे

ग़ुलामी करोगे,ग़ुलाम ही कहलाओगे

सड़ा दिए जाओगे दलदली-यातनाघरों में

ज़रा भी पूछना नहीं पड़ेगा पता नरक का

नरक होगा पल-पल पूरा आमने-सामने

नहीं चाहोगे अनंत: फिर भी भुगतोगे

ऑंखें होते हुए भी मगर जान नहीं पाओगे

करोगे क्या ऐसा जातक जीवन पाकर

चाहोगे पर चाहकर भी मर नहीं पाओगे

सिखाया पिता ने यही सिखाया.

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