जयपाल की नज्म- डर लगता है

नज्म

डर लगता है

जयपाल

 

उठ रहा है दोस्तों यह धुआँ-सा कैसा

धुआँ देखकर ही अब डर लगता है

किसी की लाश मिली है बस्ती के बाहर

यह पता करने में ही डर लगता है

बस्ती में उग आया है पत्थरों का जंगल

पत्थरों को पत्थर कहने से डर लगता है

हर कोई समझता है फरिश्ता यहाँ ख़ुद को

इन फरिश्तों से ही अब डर लगता है

किसी ने लिखी है कविता बिना डर के

उस कविता को पढ़ते हुए डर लगता है

कभी मिलकर रहते थे इस बस्ती के लोग

यह बताते हए भी अब डर लगता है

बस्ती में आ गए हैं खुदाओं के ख़ुदा

खुदा के नाम से ही अब डर लगता है

अपनी गुज़र बसर नहीं इस बस्ती में

बस्ती के नाम से ही अब डर लगता है

चलो बस्ती बसाएँ कहीं आसमान पर

ज़मीं की बस्ती से अब डर लगता है

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