उपन्यास के लेखक – बलराम
पुस्तक चर्चा
विभाजन और आतंकवाद की त्रासदी की गांठें खोलता ‘अनस्पोकन वाउंड्स’
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सुविख्यात पत्रकार, लेखक बलराम सैनी के उपन्यास पर जयपाल की पाठकीय टिप्पणी
जयपाल
Unspoken wounds(मौन जख्म/अनबोले जख्म/ गिरती दिवार) उपन्यास पढ़ रहा हूँ..हालांकि मुझे अंग्रेजी में पढ़ने का अभ्यास नहीं है लेकिन उपन्यास का रोचक कथानक इस समस्या को हल करने में काफी मदद करता है । भारत पाक- विभाजन की त्रासदी और पंजाब के आतंकवाद की वास्तविकता को समाज के सामने लाने में यह उपन्यास पूरी तरह से सफल रहा है। लेखक अपने सामाजिक अनुभव से साम्प्रदायिकता के रहस्यों को ही नहीं खोलते बल्कि पूरे राजनीतिक सिस्टम को भी बेनकाब कर देते हैं।
उपन्यास की कहानी एक ट्रक ड्राइवर मोहन सिंह, रामधन और जमील अहमद के आपसी संवाद से प्रारम्भ होती है और भारत पाक-विभाजन के बाद अविश्वास की जो दीवार बनी उसे टूटने में एक ज़माना गुजर गया उसके बाद पंजाब में आतंकवाद, गोल्डन टैंपल पर हमला, इंदिरा गांधी की हत्या, सिखों का कत्ले-आम, गुजरात के सुनियोजित दंगे आदि तो मुख्य हैं ही..इसके अलावा भी देश भर में साम्प्रदायिक दंगों का सिलसिला आज तक जारी है।
उपन्यास में भले ही अविश्वास की यह दीवार अंत में जाकर टूट जाती है लेकिन देश की कुत्सित राजनीति नहीं चाहती कि यह दीवार टूटे और सभी धर्मों और जातियों के लोग मिलजुल कर रहें। devide and rule की नीति से ही ब्रिटिश शासक यहां शासन कर पाए..उसे अनुकरण करते हुए भारतीय शासकों ने वही नीति अपनाई।
लेखक बलराम सैनी ने उपन्यास के भाग 39 और 40 में राज्य और केंद्रीय सरकारों के कुटिल राजनीतिक एजेंडे को बेपर्दा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। इसका निष्कर्ष यही है कि देश भर के जहरीले साम्प्रदायिक तनाव के पीछे आम लोगों को धर्म, संस्कृति, भाषा,पहचान के आधार पर बांटकर वोटों का ध्रुवीकरण करना और सत्ता पर कब्जा करना ही केन्द्रीय सरकारों का मकसद रहा है । इसकी कीमत आम आदमी को चुकानी पड़ी हैं…अपनी जान देकर, अपना घर-बार, परिवार, जमीन जायदाद व्यापार, इज्जत-मान ..सब कुछ लुटाकर ।
इस उपन्यास को पढ़ते हुए माचिस , गर्म हवा जैसी फ़िल्में, तमस जैसे उपन्यास और मंटो, इस्मत चुगताई, कुर्तुल-एन-हैदर,कृष्णा सोबती, भीष्म साहनी,कृश्न चन्द्र, जैसे कहानीकारों की कहानियाँ भी याद आती हैं।
उपन्यासकार बलराम सैनी ने इस उपन्यास में मानव मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास किया है l यह सिद्ध किया है कि भारत-पाक विभाजन और पंजाब के आतंकवाद दोनों के पीछे कुटिल राजनीति और सत्ता की भूख जिम्मेदार थी l एक तरफ जहां कत्ल, बलात्कार, लूट और विध्वंस की चित्कार थी वहां इन सब के बीच प्यार, करुणा,सहानुभूति, मदद जैसे वैश्विक मानव मूल्य भी बचे हुए थे।
समाज में कुछ लोगों ने अपनी धर्म,जाति,नस्ल, भाषा आदि से ऊपर उठकर इंसानियत को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी तक लगा दी अर्थात आदमी और आदमी के बीच बनाई गई दीवार को गिरा दिया।
उपन्यास का अंत जमील अहमद, मोहन सिंह और रामधन के आंसुओ से होता है l ये आँसू इंसानियत के आंसू हैं..उस दीवार के गिरने की खुशी के आंसू है जो सदियों से हमारे बीच एक सरहद की तरह खड़ी हुई है।
मानव मूल्यों की स्थापना और अमानवीय प्रवृत्तियों के बहिष्कार के लिए लेखक बलराम सैनी इस उपन्यास के माध्यम से एक लड़ाई लड़ते हुए दिखाई देते हैं..उनकी लड़ाई धर्म/ जाति के नाम पर देश भर में फैलाई गई साम्प्रदायिकता, आतंकवाद, दंगों आदि के खिलाफ है। वे इनके पीछे छिपी शैतानी काली ताकतों को बेनकाब करना चाहते हैं..निश्चित ही वे इसमें सफल हुए हैं।
बेहतर और स्वस्थ समाज की स्थापना के लिए किए गए इस साहित्यिक प्रयास के लिए उपन्यासकार बलराम सैनी को बहुत- बहुत बधाई !
आशा लेखक इसका हिंदी संस्करण भी उपलब्ध करायेंगे।


