शासन के नैतिक खोखलेपन के ख़िलाफ़ छात्रों का विद्रोह

शासन के नैतिक खोखलेपन के ख़िलाफ़ छात्रों का विद्रोह

प्रभात पटनायक

छात्रों की जिस बगावत ने हाल ही में देश को हिलाकर रख दिया, उसकी व्याख्या करते हुए आम तौर पर जो बेरोजगारी चौतरफा फैली है और जो घोर भ्रष्टाचार व्याप्त है, जिसके चलते पर्चे लीक हो रहे हैं तथा जिसके चलते, जो थोड़ा-बहुत रोजगार उपलब्ध भी है, उसके भी उनके मौके मारे जाते हैं, इस सब पर जेन-ज़ी का गुस्सा केंद्र में रहता है। बेशक, यह सब सही है। लेकिन, यह इसकी व्याख्या के लिए पर्याप्त नहीं है।

जब एक पंद्रह वर्षीया किशोरी यह कबूल करती है कि वह अपनी मां से झूठ बोलकर जंतर-मंतर पर पहुंची थी, जाहिर है कि उसे सिर्फ अपने लिए रोजगार के मौकों की स्थिति बेचैन नहीं कर रही थी, बल्कि कोई और गहरी चीज बेचैन कर रही थी। इसी प्रकार, जब जेन-ज़ी का आंदोलन स्वत:स्फूर्त रूप से देश भर में अनगिनत शहरों तक फैल गया, इसके पीछे कोई अधिक गहरी भावना काम कर रही थी, जिसे सत्ताधारी पार्टी और सरकार तो समझ तक नहीं सकते हैं।

यह साफ तौर पर कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं है। साफ है कि इस आंदोलन के कोई ‘‘नेता’’ नहीं हैं। भारतीय जनता पार्टी ‘‘नेताओं’’ से निपटने में माहिर है। वह ‘‘नेताओं’’ को बांटकर निपटा देती है, बदनाम कर के निपटा देती है, भ्रष्ट बनाकर निपटा देती है, खरीद कर निपटा देती है और उन्हें प्रवर्तन निदेशालय तथा विदेशी अंशदान (नियमन) कानून का डर दिखाकर, निपटा देती है।

अगर इस आंदोलन का नेतृत्व भी ‘‘नेताओं’’ द्वारा किया जा रहा होता, तो यह उस मुकाम पर नहीं जा पाता, जहां तक पहुंच गया। सत्ताधारी पार्टी की ओर से सारे आज़मूदा हथकंडे आजमाए गए थे, लेकिन वे पूरी तरह से विफल रहे, क्योंकि यह आंदोलन किसी के ‘‘नेतृत्व’’ के आसरे नहीं था। सोनम वांगचुक के अनशन तोड़ देने का आंदोलन पर कोई असर नहीं पड़ा। इसी प्रकार, कॉकरोच जनता पार्टी के दो सदस्यों का बातचीत करने के लिए केंद्रीय मंत्री, जेपी नड्डा के घर चले जाना छात्रों को पसंद नहीं आया। उनकी नापसंदगी के चलते, पहले से तय शर्तों के बिना आगे किसी बातचीत पर रोक लग गयी, जो इस आंदोलन की गैर-पारंपरिक प्रकृति का संकेतक है।

यह सामान्य आंदोलनों जैसा नहीं था, जहां ‘‘नेता’’ ही ‘‘अनुयाइयों’’ की ओर से कदम उठाते हैं। वास्तव में ये छात्र किन्हीं ‘‘नेताओं’’ के पीछे एकजुट नहीं हुए थे बल्कि कुछ (तीन) मांगों पर एकजुट हुए थे और इन मांगों पर उन्होंने किसी समझौते की इजाजत नहीं दी।

इस आंदोलन के इतने थोड़े से समय में इतना व्यापक और स्वत:स्फूर्त समर्थन हासिल करने के पीछे एक कहीं गहरा कारण है और यह कारण है वर्तमान निजाम के नैतिक खोखलेपन को लेकर छात्रों तथा युवाओं के बीच मोहभंग।

जंतर-मंतर पर जमा हुई विशाल भीड़ को सिर्फ रोजगार की संभावनाएं बहुत कम हो जाने या पेपर लीक की लानत ने ही एकजुट नहीं किया था। उन्हें एकजुट किया था इस तथ्य ने कि इस व्यवस्था में कोई जवाबदेही ही नहीं थी। वर्तमान व्यवस्था की भयावह विफलताओं के लिए किसी पर भी नैतिक जिम्मेदारी नहीं आने वाली थी, जो नैतिक खोखलेपन को दर्शाता था।

सत्ताधारियों से नैतिक आचरण की मांग

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कोई इसलिए नहीं की जा रही थी कि इस इस्तीफे से प्रश्नपत्र लीक होने की समस्या दूर हो जाएगी या बिगड़ी हुई शिक्षा व्यवस्था सुधर जाएगी। जंतर-मंतर पर जमा हुआ हरेक शख्स इस बात को जानता था। फिर भी उनके इस्तीफे की मांग को ऐसी मांग बना दिया गया, जिस पर प्रदर्शनकारी समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे। यह था इस नैतिक खोखलेपन को खत्म करने के लिए, यह सुनिश्चित करने के लिए कि परीक्षा में घोटाले के लिए सिर्फ किन्हीं नौकरशाहों या अधीनस्थों को नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिष्ठान में किसी को जवाबदेह बनाया जाएगा।

यही इसकी भी वजह थी कि प्रश्नपत्र लीक होने के दोषियों से निपटने के लिए फास्ट ट्रैक अदालतें बनाने का मोदी का वादा पूरी तरह से फुस्स हो गया।

संक्षेप में, सत्ताधारियों से नैतिक आचरण की ही मांग थी, जो इन छात्रों और युवाओं को एकजुट कर रही थी, जिनमें उस पंद्रह साल की बच्ची से लेकर, जो घर से भागकर जंतर-मंतर पर आयी थी, पैलेट गनों का सामना करने वाले निर्भीक युवक-युवतियां तक शामिल थे।

वास्तव में नैतिक खोखलापन मौजूदा निजाम के केंद्र में है और इसने राजनीतिक व्यवस्था के बड़े हिस्से में इसे फैला दिया है। लाखों ऐसे मतदाताओं के मताधिकार छीने जा रहे हैं, जिनके संबंध में मौजूदा निजाम को लगता है कि वे उसके खिलाफ वोट दे सकते हैं और यह भी किया गया है एक ऐसे चुनाव आयोग का इस्तेमाल कर के, खुद जिसका गठन एक ऐसी प्रक्रिया के जरिए हुआ है, जो अनैतिक है (इसे मूलत: प्रधानमंत्री और उनके नामजद किए एक मंत्री द्वारा ही चुना गया है।) और चुनाव नतीजों को ही अप्रासांगिक बना दिया जा रहा है और यह किया जा रहा है विपक्ष के निर्वाचित सदस्यों को खरीदने या धमकाने के जरिए, उनसे पाला बदलवाने तथा उन्हें सत्ताधारी पार्टी में लाने के जरिए।

इस तरह मौजूदा निजाम, जनतंत्र के नाम पर पूरा स्वांग ही करता आ रहा है। छात्र और युवा इस स्वांग के खिलाफ अपना विक्षोभ जता रहे थे।

जहां ज्यादातर गोदी मीडिया इस स्वांग पर तालियां बजाता आ रहा था और लोगों की विशाल संख्या को, जो इस स्वांग को पहचानती थी, डराकर चुप करा दिया गया था, वहीं छात्रों ने इस स्वांग के खिलाफ खुलकर आवाज उठाने की हिम्मत दिखाई। पोस्टरों तथा कार्टूनों आदि के जरिए मोदी पंथ की खिल्ली उड़ाना, इस विरोध की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन गया। और इसका असर यह हुआ कि इसने बहुत सारे लोगों को उस डर से मुक्ति दिला दी, जिसने उन्हें पंगु कर रखा था।

वास्तव में पुलिस की बर्बरता, पैलेट गनों का उपयोग, कील जड़ी लाठियां, आंसू गैस और धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षामंत्री के पद पर बनाए रखने की साफ तौर पर बेतुकी जिद, सब का मकसद लोगों के दिमागों में उसी आतंक को बनाए रखना था। लोगों के मन में यह धारणा बनाए रखना था कि यह सरकार टस से मस होने वाली नहीं है।

इसका मकसद पुन: यही था कि लोगों को अणुओं की तरह बिखेर दिया जाए, उन्हें अकेली-अकेली इकाइयों में बांट दिया जाए, जिससे हरेक शख्स यही मानता रहे कि वह शक्तिहीन है और उसे यह समझाया जा सके कि सरकार को इतना भारी समर्थन हासिल है कि वह तो अब भी अपराजेय है।

फ़ासीवाद की निशानी है नैतिक खोखलापन

यह नैतिक खोखलापन, वाकई सभी फासीवादी निजामों की निशानी होता है। जर्मनी में 1930 के दशक का नाजी आंदोलन, शुरू तो हुआ था इजारेदार पूंजी के खिलाफ गर्जन-तर्जन के साथ, जबकि पीछे-पीछे से कुछ इजारेदार उसकी मदद भी कर रहे थे, लेकिन सत्ता हासिल होते ही उसने इजारेदार पूंजी के साथ समझौता कर लिया। इस सौदे को अमल में लाने के लिए उसने अपने ही समर्थकों की एक बड़ी संख्या का, जिनका नेता अर्न्स्ट रॉम था, कत्लेआम तक करा दिया। इस प्रकरण को ‘बड़े छुरों वाली रात’ (नाइट आफ लांग नाइव्स) के नाम से जाना गया। इजारेदारी विरोध के नैतिक आसन को छोड़कर उसने, इजारेदार पूंजी के साथ गठजोड़ के साथ जुड़े नैतिक खोखलेपन को अपना लिया। आज के नव-फासीवादी तो सत्ता में आने से भी पहले से, इजारेदार पूंजी के साथ और खासतौर पर उसके एक नवोदित हिस्से के साथ, खुल्लमखुल्ला सौदा कर लेते हैं। और इस तरह का सौदा, तो इजारेदारों को जनता को लूटने की खुली छूट देता है, अनिवार्य रूप से एक नैतिक खोखलापन भी पैदा करता है।

अगर ऐसा नैतिक खोखलापन नहीं होता, तो फासीवादियों को गोयबल्सीय प्रचार की जरूरत ही नहीं होती। और अगर मौजूदा निजाम भीतर से नैतिक रूप से खोखला ही नहीं होता, तो इस खोखलेपन को ढांपने के लिए उसे बॉलीवुड के सितारों पर दबाव डालकर (जैसा कि उनमें से एक ने कबूल भी किया है) उनसे ‘‘मोदी है तो मुमकिन है’’ जैसी तुकबंदियां गवाने की भी जरूरत नहीं होती।

छात्र आंदोलन: विशिष्टता और सीमाएं

छात्र ही वास्तव में वह सामाजिक तबका है, जो इस नैतिक खोखलेपन का मुकाबला करने के लिए आदर्श स्थिति में होता है। वे निर्दोष होते हैं, आदर्शवादी होते हैं, जानकार होते हैं, विचारवान होते हैं तथा निर्भीक होते हैं और नैतिकता पूर्ण आचरण में गहरी निष्ठा रखते हैं तथा उसका सम्मान करते हैं। ये सभी गुण उन्हें ऐसे निजामों के नैतिक खोखलेपन के खिलाफ लड़ने की क्षमता से लैस करते हैं, जो निजाम गोयबल्सीय प्रचार के जरिए सनक भरे तरीके से जनता को भ्रमित करने के बल पर फलते-फूलते हैं।

लेकिन, इसीलिए किसी एक प्रकरण में नैतिक आचरण जैसा कुछ थोपने में उनकी सफलता, जैसे कि वर्तमान मामले में, उसी प्रकार व्यवस्था में किसी बदलाव के आने की सूचक नहीं है, जैसे कि तेंदुए को पकड़ भी लिया जाए तो, उसकी त्वचा के चकत्ते नहीं बदलने वाले हैं।

छात्रों की मांगों में व्यवस्था में किसी बदलाव या किसी संस्थागत बदलाव की मांग शामिल नहीं थी। अगर छात्रों ने ऐसी मांगों को शामिल किया होता, तो इन मांगों पर काफी बहस हुई होती और यह आंदोलन इतनी तेजी से या स्वत:स्फूर्त तरीके से देश भर में नहीं फैला होता। इसकी तुलना किसान आंदोलन से की जाए, तो काफी आंखें खोलने वाली होगी। चूंकि किसान आंदोलन, नैतिक आचरण लागू कराने के लिए छात्रों के इस आंदोलन से भिन्न, एक वर्गीय आंदोलन था, जो एक बुनियादी वर्ग के हितों की रक्षा के लिए छेड़ा गया था, इसकी मांगें अनिवार्यत: संस्थागत थीं — उन संस्थागत बदलावों के वापस लिए जाने की मांग, जो साम्राज्यवाद के इशारे पर लाए जा रहे थे। यही साम्राज्यवाद उस नव-उदारवादी व्यवस्था का संचालक है, जिसके साथ भारतीय इजारेदार पूंजी पूरी तरह से एकीकृत हो चुकी है।

दूसरी ओर, इस छात्र आंदोलन के मामले में किसी भी प्रकार के संस्थागत बदलाव लागू करने का कोई सवाल ही नहीं था। इसीलिए नव-फासीवादी निजाम, जिसकी छवि को ,और उसने इतनी मेहनत से आतंक का जो माहौल बनाया है, उसे धक्का लगने के बाद, अपनी खिसकी जमीन फिर से हासिल करने के लिए और ज्यादा मेहनत करेगा।

राजनीतिक चुनौती के लिए रास्ता खुला

इसके लिए नव-फासीवादी निजाम आने वाले दिनों में बहुसंख्यक समुदाय के लिए अपनी सांप्रदायिक दुहाइयों को और तेज कर सकता है। इसके लिए वह सांप्रदायिक वारदातें करा सकता है। वह सीमाओं पर अंतर्राष्ट्रीय टकराव भी करा सकता है (हालांकि इस आखिरी हथियार का उपयोग कहीं मुश्किल हो गया है, क्योंकि डोनाल्ड ट्रम्प को दक्षिण एशिया के मामलों में टांग फंसाने का शौक है)। और वह छात्र आंदोलन के नेताओं को (क्योंकि वह किसी भी आंदोलन को उसके नेताओं के माध्यम से ही समझ सकता है) अपने पाले में खींचने की या दूसरे-दूसरे तरीकों से उनका कद घटाने की कोशिशें कर सकता है।

फिर भी इस छात्र आंदोलन ने नव-फासीवाद की तिकड़मों को और सबसे बढ़कर सांप्रदायिकता के उसके सनक भरे इस्तेमाल को बेनकाब करने में ; ‘‘सर्वोच्च नेता’’ के नाकामी से परे होने के मिथक को चूर-चूर करने में और देश में इतने वर्ष से छाए डर के माहौल को तार-तार करने में, एक शानदार भूमिका अदा की है। इसने अब नव-फासीवाद के सामने राजनीतिक चुनौती पेश करने के लिए, रास्ता खोल दिया है।

अंग्रेजी से अनुवाद : राजेंद्र शर्मा

(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं। अनुवादक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *