मंज़िल के बाद भी सफ़र

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

मंज़िल के बाद भी सफ़र

डॉ. रीटा अरोड़ा

इच्छाओं का स्वभाव तृप्ति नहीं, विस्तार है; इसलिए शांति प्राप्ति से नहीं, स्वीकार्यता से जन्म लेती है।

एक दिन पार्क में एक व्यक्ति मिले। उनके चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, “बस इस बार बेटी का विवाह अच्छे से हो जाए, फिर जीवन में कोई चिंता नहीं रहेगी।”

मैं मुस्कुरा दी। क्योंकि कुछ वर्ष पहले यही सज्जन कह रहे थे, “बस अपना घर बन जाए, फिर सब ठीक हो जाएगा।” उससे पहले उनकी चिंता बच्चों की पढ़ाई थी और उससे पहले नौकरी में पदोन्नति की।

घर लौटी तो मन में एक प्रश्न उठता रहा-क्या सचमुच हमारी चिंताएँ समाप्त होती हैं, या केवल उनका विषय बदलता रहता है?

शायद मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह शांति को अगली उपलब्धि के साथ जोड़ देता है।

एक संत ने अपने शिष्य को एक कटोरा दिया और कहा, “इसे नदी के पानी से भरकर लाओ।”

शिष्य पानी भर लाया।

संत ने उसमें एक छोटा-सा छेद कर दिया। पानी धीरे-धीरे बहने लगा।

शिष्य बोला, “गुरुदेव, यह तो कभी भरा नहीं रहेगा।”

संत मुस्कुराए, “इच्छाओं का पात्र भी ऐसा ही होता है। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी निकल पड़ती है। इसलिए जो व्यक्ति केवल भरने में लगा रहता है, वह कभी तृप्त नहीं होता।”

हम अपने जीवन में भी यही देखते हैं। बचपन में खिलौनों की चाह होती है। युवावस्था में करियर और प्रतिष्ठा की। फिर बड़ा घर, बेहतर गाड़ी, अधिक सुविधाएँ और अधिक सुरक्षा की।

इच्छाएँ बदलती रहती हैं, पर उनका स्वभाव नहीं बदलता।

समस्या इच्छाओं में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब हम यह मान लेते हैं कि हमारी खुशी केवल उनकी पूर्ति पर निर्भर है।

एक किसान खेत में बीज बोता है। वह पूरी मेहनत करता है, लेकिन उसे यह भी पता होता है कि वर्षा उसके नियंत्रण में नहीं है। इसलिए वह प्रयास करता है, पर परिणाम को लेकर जिद नहीं करता।

जीवन भी कुछ ऐसा ही है। हमें अपने कर्म पूरे मन से करने चाहिए, लेकिन परिणाम को अनिवार्यता नहीं बनाना चाहिए।

अधिकांश दुख तब जन्म लेते हैं जब हम जीवन से कहते हैं-“ऐसा ही होना चाहिए।”

और अधिकांश शांति तब मिलती है जब हम स्वीकार करते हैं-“ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी।”

इच्छाएँ रखना स्वाभाविक है। सपने देखना भी आवश्यक है। लेकिन हर इच्छा के साथ यदि हम मन में एक छोटा-सा स्थान स्वीकार्यता के लिए भी छोड़ दें, तो जीवन बहुत हल्का हो जाता है।

फंडा यह है कि इच्छाओं का अंत नहीं होता, लेकिन उनके पीछे भागने की गति को नियंत्रित किया जा सकता है। शांति तब नहीं मिलती जब सब कुछ मिल जाए, शांति तब मिलती है जब जो नहीं मिला, उसे भी सहजता से स्वीकार करना सीख जाएँ।

– डॉ. रीटा अरोड़ा,सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
0