कविता
एक ही सड़क पर
रत्ना भदौरिया
आज
एक ही सड़क पर
दो स्त्रियाँ खड़ी थीं—
एक के माथे पर
देश की सलवटें थीं
दूसरी की हथेली में
आटे की आख़िरी मुट्ठी
पहली ने
सत्ता के महल की ओर
अपनी मुट्ठी उठाई—
उसकी नसों में
कोई पुराना इंक़लाब
अब भी जीवित था
दूसरी ने
उसी महल की ओर देखा
फिर अपने घर की ओर—
जहाँ चूल्हा
तीन दिनों से
राख का कटोरा बना पड़ा था
एक ने
भूखी जनता के लिए
अपना स्वर जला दिया
दूसरी ने
अपनी ही आवाज़
रोटी के बदले गिरवी रख दी
एक के भीतर
भगत सिंह था—
फाँसी से भी ऊँचा
एक स्वप्न
दूसरी के भीतर
सावरकर नहीं
एक माँ थी—
जिसके सामने
विचारधाराएँ नहीं
बच्चों के खाली कटोरे थे
फिर भी
सड़क ने दोनों को
एक ही रोशनी में देखा—
एक
इतिहास से लड़ रही थी
दूसरी
इतिहास की बनाई भूख से
और सत्ता
दोनों के बीच
उसी तरह खड़ी थी—
एक के विद्रोह से डरती हुई
दूसरी की मजबूरी पर
अपना सिंहासन टिकाए हुए
रत्ना भदौरिया के फेसबुक वॉल से साभार
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