कोविड 19 के बाद से केंद्र सरकार ने अपने राजनीतिक हित के लिए पाठ्यक्रमों में निरंतर बदलाव किया है। कभी कोविड का बहाना कर पाठ्यक्रम से कुछ अध्याय यह कहते हुए हटा दिए कि पुस्तक को छोटा करना है। अब ताजा प्रकरण है पाठ्यक्रम में धार्मिक ग्रंथों को सामाजिक विज्ञान के नाम पर पढ़ाने का। लेखक ओमप्रकाश तिवारी ने तर्क रखे हैं, जो बहस तलब हैं। इस पर खुली बहस की जानी चाहिए। आपके विचार आमंत्रित है। संपादक
विचार विमर्श
क्या सामाजिक विज्ञान के नाम पर धार्मिक ग्रंथ पढ़ाना उचित है?
ओमप्रकाश तिवारी
एनसीईआरटी की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और अन्य धार्मिक-दार्शनिक ग्रंथों को शामिल किए जाने पर बहस स्वाभाविक है। सवाल केवल यह नहीं है कि भारतीय परंपरा को पढ़ाया जाए या नहीं, बल्कि यह है कि सामाजिक विज्ञान का उद्देश्य क्या है और उसमें किस प्रकार का ज्ञान शामिल होना चाहिए।
सामाजिक विज्ञान का मूल उद्देश्य समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था, इतिहास और मानव व्यवहार को वैज्ञानिक तथा आलोचनात्मक दृष्टि से समझना है। इसका लक्ष्य विद्यार्थियों में तथ्यों की जांच करने, तर्क करने, प्रश्न पूछने और विभिन्न विचारों का तुलनात्मक अध्ययन करने की क्षमता विकसित करना होता है। यदि सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों में धार्मिक ग्रंथों को सांस्कृतिक या ऐतिहासिक स्रोत के रूप में पढ़ाया जाए तो यह एक अलग बात है, लेकिन यदि उन्हें किसी विशेष सत्य, आदर्श या जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो यह सामाजिक विज्ञान की मूल प्रकृति से टकरा सकता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और धार्मिक शिक्षा का प्रश्न
भारत के संविधान के अनुच्छेद 51(क)(h) में प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बताया गया है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा सुधार की भावना का विकास करे। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ केवल विज्ञान पढ़ना नहीं है, बल्कि हर दावे को प्रमाण, तर्क और परीक्षण की कसौटी पर परखना है।
विज्ञान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह स्वयं को गलत सिद्ध किए जाने की संभावना को स्वीकार करता है। कोई भी वैज्ञानिक सिद्धांत अंतिम सत्य नहीं होता। नए प्रमाण मिलने पर उसे बदला जा सकता है। न्यूटन के सिद्धांतों को आइंस्टीन ने आगे बढ़ाया, और आइंस्टीन के सिद्धांतों की भी लगातार जांच होती रहती है।
इसके विपरीत धर्म सामान्यतः आस्था पर आधारित होता है। धार्मिक ग्रंथों के मूल दावों को प्रायः अंतिम और पवित्र सत्य माना जाता है। वहां प्रश्न पूछने और निष्कर्षों को बदलने की गुंजाइश सीमित होती है। यही कारण है कि विज्ञान और धर्म की कार्यप्रणाली मूल रूप से अलग है।
इसका अर्थ यह नहीं कि धर्म का कोई महत्व नहीं है। धर्म समाज, संस्कृति, नैतिकता और इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत हो सकता है। लेकिन धर्म और विज्ञान की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। जब दोनों के बीच की सीमाएं धुंधली होने लगती हैं, तब शिक्षा का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
क्या धार्मिक अध्ययन से विज्ञान विरोधी सोच पैदा होती है?
यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि धार्मिक ग्रंथ पढ़ते ही कोई विद्यार्थी विज्ञान से दूर हो जाएगा। दुनिया में अनेक वैज्ञानिक धार्मिक भी रहे हैं। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब धार्मिक विचारों को वैज्ञानिक तथ्यों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगे।
इतिहास बताता है कि जिन समाजों ने तर्क, प्रयोग और आलोचनात्मक चिंतन को महत्व दिया, वहीं वैज्ञानिक क्रांतियां हुईं। यूरोप का पुनर्जागरण, प्रबोधन काल (Enlightenment), औद्योगिक क्रांति और आधुनिक तकनीकी विकास इसी वैज्ञानिक सोच की उपज थे।
दार्शनिक कार्ल पॉपर ने कहा था कि किसी विचार को वैज्ञानिक तभी माना जा सकता है जब उसे गलत साबित करने की संभावना हो। वहीं धार्मिक आस्थाएं सामान्यतः इस कसौटी पर नहीं परखी जातीं।
बर्ट्रेंड रसेल ने भी शिक्षा में आलोचनात्मक चिंतन को सबसे महत्वपूर्ण बताया था। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को यह सिखाना होना चाहिए कि वे किसी भी विचार को केवल इसलिए स्वीकार न करें क्योंकि उसे किसी प्राधिकरण ने कहा है।
सामाजिक विज्ञान में धर्म की जगह क्या होनी चाहिए?
धर्म को पूरी तरह शिक्षा से बाहर करना भी उचित नहीं होगा। धर्म मानव सभ्यता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारतीय इतिहास, कला, साहित्य, राजनीति और समाज को धर्म की भूमिका समझे बिना नहीं समझा जा सकता।
लेकिन इसका तरीका अलग होना चाहिए।
धर्म को सामाजिक विज्ञान में आस्था के रूप में नहीं, अध्ययन के विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। विद्यार्थियों को बताया जाना चाहिए कि विभिन्न धर्मों का उद्भव कैसे हुआ, उनके सामाजिक प्रभाव क्या रहे, उन्होंने समाज को कैसे प्रभावित किया, उनके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्ष क्या रहे।
उदाहरण के लिए—
हिंदू दर्शन
बौद्ध दर्शन
जैन दर्शन
इस्लामी दर्शन
ईसाई दर्शन
सिख दर्शन
आधुनिक मानवतावादी और नास्तिक दर्शन
इन सभी का तुलनात्मक अध्ययन कराया जा सकता है। इससे विद्यार्थी किसी एक विचारधारा के अनुयायी नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र चिंतक के रूप में विकसित होगा।
धार्मिक शिक्षा उच्च शिक्षा में अधिक उपयुक्त क्यों?
नौवीं कक्षा का विद्यार्थी अभी बौद्धिक रूप से विकास की प्रक्रिया में होता है। वह जटिल दार्शनिक बहसों को पूरी गहराई से समझने की स्थिति में नहीं होता।
इसके विपरीत विश्वविद्यालय स्तर पर विद्यार्थी विभिन्न विचारधाराओं का आलोचनात्मक विश्लेषण कर सकता है। इसलिए धार्मिक और दार्शनिक अध्ययन को उच्च शिक्षा में अधिक विस्तार से पढ़ाया जाना अधिक उपयुक्त माना जा सकता है।
विश्व के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में “रिलिजन स्टडीज” या “कम्पेरेटिव रिलीजन” पढ़ाया जाता है, लेकिन वहां किसी धर्म का प्रचार नहीं किया जाता। बल्कि धर्मों का समाजशास्त्रीय, ऐतिहासिक और दार्शनिक विश्लेषण कराया जाता है।
भारत को किस प्रकार की शिक्षा चाहिए?
भारत आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, जैव प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अनुसंधान और उन्नत विनिर्माण के युग में प्रवेश कर रहा है। आने वाले दशकों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा का आधार धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि ज्ञान, तकनीक और नवाचार होगा।
ऐसे समय में शिक्षा का केंद्रीय उद्देश्य होना चाहिए—
वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास
आलोचनात्मक चिंतन
तार्किक विश्लेषण
नवाचार की क्षमता
लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्य
धर्म और संस्कृति का अध्ययन भी आवश्यक है, लेकिन उन्हें वैज्ञानिक शिक्षा का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
वेद, उपनिषद, रामायण या अन्य धार्मिक ग्रंथ भारतीय सभ्यता की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। उनका अध्ययन होना चाहिए, लेकिन सामाजिक विज्ञान में उनकी प्रस्तुति सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ में होनी चाहिए, न कि किसी विशेष सत्य या आदर्श के रूप में।
शिक्षा का लक्ष्य आस्था का निर्माण नहीं, बल्कि समझ का निर्माण होना चाहिए। यदि विद्यार्थियों को सभी धर्मों, सभी दर्शन परंपराओं और आधुनिक वैज्ञानिक सोच का तुलनात्मक अध्ययन कराया जाए, तो वे अधिक स्वतंत्र, तार्किक और जागरूक नागरिक बन सकते हैं। यही विद्यार्थी के हित में होगा, और अंततः समाज तथा राष्ट्र के हित में भी।
