टीचर्स डे पर गुरुजी का बदला

समय समाज

टीचर्स डे पर गुरुजी का बदला

डॉ रीटा अरोड़ा

 

टीचर्स डे वाले दिन सुबह-सुबह मैंने फेसबुक खोला।

हर कोई अपने शिक्षक के साथ फोटो डाल रहा था।

कोई लिख रहा था-

“मेरे गुरुजी मेरे जीवन के मार्गदर्शक हैं।”

कोई लिख रहा था-

“आज जो भी हूं, अपने शिक्षकों की वजह से हूं।”

मुझे भी अपने प्रिय शिक्षक **शर्मा जी** याद आ गए। मैंने उन्हें शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं देते हुए उनको पोस्ट किया-

*”मेरे गुरुजी इतने महान हैं कि उन्होंने मुझे पढ़ाने के लिए जितनी बार डांटा है, उतनी बार तो मेरे घरवालों ने भी नहीं डांटा होगा!”*

पोस्ट वायरल हो गई। दोस्त हंस-हंसकर कमेंट करने लगे। मैं खुशी से फूला नहीं समा रहा था।

तभी मोबाइल बजा। स्क्रीन पर नाम चमका-

*”शर्मा सर”*

मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। मैंने कांपते हुए फोन उठाया।

उधर से आवाज आई-

“बहुत बड़े लेखक बन गए हो बेटा?”

मैं समझ गया…

पोस्ट गुरुजी पढ़ चुके थे।

मैंने सोचा अब फोन पर ही क्लास लगने वाली है। लेकिन उन्होंने केवल इतना कहा-

“शाम को स्कूल आ जाना।”

बस।

फोन कट गया।

पूरे दिन मैं सोचता रहा कि आखिर होने क्या वाला है। शाम को स्कूल पहुंचा तो देखा कि पुरानी कक्षा में मेरे साथ पढ़ने वाले कई छात्र पहले से मौजूद थे।

मैंने पूछा-

“क्या बात है?”

किसी को कुछ पता नहीं था। तभी शर्मा सर अंदर आए। हाथ में एक पुरानी फाइल थी। चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान।

उन्होंने कहा-

“आज टीचर्स डे है। तुम लोगों ने मेरे बारे में बहुत कुछ लिखा है।”

“अब मेरी भी बारी है।”

हम सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। सर ने फाइल खोली।पहला पन्ना निकाला और पढ़ना शुरू किया-

*”मैं बड़ा होकर अंतरिक्ष यात्री बनूंगा और चांद पर पराठे बेचूंगा।”*

पूरी कक्षा हंसी से गूंज उठी।मैं शर्म से लाल हो गया। वह मेरा पांचवीं कक्षा का निबंध था।

फिर सर ने दूसरे छात्र की कॉपी निकाली। उसमें गणित के सवाल की जगह क्रिकेट टीम बनाई हुई थी।

तीसरे की कॉपी में अध्यापक का कार्टून बना था।

पूरा माहौल ठहाकों से भर गया। सर भी हंस रहे थे। हम भी हंस रहे थे।फिर अचानक उन्होंने फाइल बंद कर दी।

कमरे में शांति छा गई।

उन्होंने धीरे से कहा-

“मजाक बहुत हो गया।”

फिर हमारी तरफ देखकर बोले-

“तुम लोगों को शायद याद नहीं होगा…”

“लेकिन मुझे तुम सबका पहला दिन आज भी याद है।”

“कोई रो रहा था।”

“कोई मां का हाथ नहीं छोड़ रहा था।”

“कोई स्कूल के गेट से वापस भाग रहा था।”

हम सब मुस्कुरा दिए।

उन्होंने आगे कहा-

“तुम्हें केवल अपनी रिपोर्ट कार्ड याद है…”

“मुझे तुम्हारे संघर्ष याद हैं।”

“किसी के घर में फीस भरने के पैसे नहीं थे।”

“कोई पढ़ाई छोड़ने वाला था।”

“कोई खुद को सबसे कमजोर समझता था।”

अब माहौल बदल चुका था। सर की आवाज भर्रा गई।

उन्होंने कहा-

“जब तुम लोग परीक्षा देते थे, तब केवल तुम नहीं जागते थे…”

“तुम्हारे साथ हम भी जागते थे।”

“तुम्हारे अच्छे नंबरों पर जितनी खुशी तुम्हें होती थी, उससे कम हमें भी नहीं होती थी।”

फिर उन्होंने मेरी तरफ देखा।

और बोले-

“याद है बारहवीं का रिजल्ट?”

मैंने सिर हिलाया।

उन्होंने मुस्कुराकर कहा-

“जिस दिन तुम्हारा चयन हुआ था, उस दिन सबसे पहले मिठाई मैंने खरीदी थी।”

मेरी आंखें भर आईं।

फिर उन्होंने अपनी मेज की दराज खोली और एक पुराना कागज निकाला। मैं हैरान रह गया।

वह मेरी दसवीं कक्षा की उत्तर-पुस्तिका थी।

उसके ऊपर लाल स्याही में लिखा था-

*”तुम बहुत आगे जाओगे। खुद पर विश्वास रखना।”*

मैंने पूछा-

“सर, आपने इसे इतने सालों तक संभालकर रखा?”

उन्होंने हंसते हुए कहा-

“शिक्षक किताबें नहीं संभालते बेटा…”

“वे सपने संभालते हैं।”

अब किसी की आंखें सूखी नहीं थीं। मैं उठकर उनके चरणों में झुक गया ।उन्होंने तुरंत मुझे उठाया और गले लगा लिया।

फिर मेरे कान में धीरे से बोले-

“और सुनो…”

मैंने कहा-

“जी सर?”

वे मुस्कुराए और बोले-

“फेसबुक पर लिख देना कि शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाता।”

“वह कई बार अपने विद्यार्थियों के सपनों पर तब भी विश्वास करता है, जब विद्यार्थी खुद पर विश्वास नहीं कर पाता।”

मैंने नम आंखों से उनकी ओर देखा।

तभी उन्होंने हंसते हुए कहा-

“और हां, अगली बार फेसबुक पर कुछ लिखना तो पहले मुझे दिखा देना।”

पूरा कमरा फिर से हंसी से गूंज उठा।

उस रात मैंने फेसबुक पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी-

*”बचपन में लगता था गुरुजी केवल गलतियां निकालते हैं… आज समझ आया, वे मेरी कमियों नहीं, मेरी संभावनाओं को देख रहे थे।”*

और यकीन मानिए…

उस पोस्ट पर सबसे पहला लाइक मेरे गुरुजी का था।

**शिक्षक केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाते, वे जीवन का पाठ पढ़ाते हैं। वे केवल अंक नहीं देते, आत्मविश्वास देते हैं। वे केवल विद्यार्थी नहीं बनाते, व्यक्तित्व गढ़ते हैं।**

**मेरे जीवन के ऐसे ही प्रेरणास्रोत, आदरणीय शर्मा जी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।**

डॉ रीटा अरोड़ा , सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

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