अफसोस ही अफसोस! इतना अफसोस!
प्रफुल्ल कोलख्यान
ऐसा लग रहा है कि भारत के प्रधानमंत्री को बहुत अफसोस है! अफसोस कि वे बाबा बागेश्वर नहीं हैं। हो सकता है बाबा बागेश्वर को भी अफसोस हो कि वे भारत के प्रधानमंत्री नहीं हैं।
भारत को बहुत-बहुत ज्यादा अफसोस है कि प्रधानमंत्री नॉन-बायोलॉजिकल होने के मनोभाव में कुछ देर के लिए चले जरूर गये थे, लेकिन टिके नहीं रह सके!
बाबा बागेश्वर ज्ञानी हैं, बल्कि सर्वज्ञानी हैं!! ऐसा ही बताया गया, बुझाया गया। इस बीच राम मंदिर चंदा-चढ़ावा चोरी का मामला तूल पकड़ लिया। ताक-झांक शुरू हो गया। जांच-पड़ताल यानी ताम-झाम से ताक-झांक शुरू करना पड़ गया। हमें जांच-पड़ताल की टीम पर तो कम ही भरोसा रहता है। तब य जरूर है कि दिव्य-ज्ञान पर बहुत ज्यादा भरोसा रहता है।
सर्वज्ञानी बाबा बागेश्वर की तरफ लोग ताकने लगे। ताकना हमारा अपना स्वभाव है। झांकना हमारी अपनी मति। शक की निगाह से नहीं खुलासा के निगाह से! खुलासा का अपना भीतरी दबाव बढ़ने लगा! खुलासा करने की नौबत आई तो जान का डर सामने आ गया। जान के लाले पड़ते दिखने लगे!
जान और ज्ञान एक दूसरे के खिलाफ हो जाने पर क्रांतिकारी जान की परवाह नहीं किया करते हैं। दिव्य-ज्ञानी और सर्वज्ञानी तो बड़ी बात है। उनकी तो बात ही क्या कामचलाऊ समझदार भी ज्ञान की गठरी को आस्तीन के कॉकरोच की तरह से झटक देते हैं। क्रांतिकारियों और सर्व-ज्ञानियों का फर्क सभी जानते हैं हालांकि सर्वज्ञानी की तुलना में क्रांतिकारी कम ही होते हैं। इधर दिव्य-क्रांति का जो नया दौर आया तो दिव्य-क्रांतिकारी तो बहुतायत में दिखने लगे हैं। यह बात अलग है।
चेतक हवा से भी बाग हिलने पड़ सवार को लेकर उड़ जाता था! अबकी जो हवा से बाग हिला तो सत्ता का बागडोर लेकर विपक्ष उड़ गया! ऐसा लगता है कि जैसे सब-कुछ बेलगाम हो गया है। अफसोस तो इसी का है। अफसोस ही अफसोस! इतना अफसोस!
