घुँघरू की तरह बजती ही रही हूँ मैं…

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

घुँघरू की तरह बजती ही रही हूँ मैं…

डॉ. रीटा अरोड़ा

 

कार में धीमी आवाज़ में गीत बज रहा था – “घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं…”

“मम्मी, आप रो रही हो?” बेटी ने पूछा।

उसने जल्दी से शीशे की तरफ़ देखा – “नहीं बेटा, आँख में कुछ चला गया।”

“आप हमेशा यही कहती हो।”

वह चुप हो गई।

गीत की पंक्तियाँ जैसे वर्षों पुराना हिसाब खोल रही थीं।

कभी पति की पसंद, कभी परिवार की उम्मीदें, कभी बच्चों की जरूरतें – वह सबकी ताल पर चलती रही।

कभी टूट गई, कभी तोड़ी गई। कभी बिखरी, फिर रात के अँधेरे में खुद ही अपने टुकड़े समेटती रही।

किसी ने कभी यह नहीं पूछा कि उन टुकड़ों को जोड़ते-जोड़ते उसके हाथ कितनी बार लहूलुहान हुए थे। शायद इसलिए कि खून दिखाई नहीं देता था।

बेटी ने धीरे से पूछा – “मम्मी, आपको क्या पसंद है?”

वह जवाब नहीं दे पाई।

इतने वर्षों में शायद वह अपनी पसंद ही भूल चुकी थी।

गीत खत्म हो गया।

लेकिन कार में खामोशी बनी रही।

बेटी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

उसने शीशे में खुद को देखा, फिर बेटी को।

होंठ कुछ कहने के लिए खुले… मगर आवाज़ नहीं निकली।

रेडियो पर अगला गाना शुरू हो चुका था।

और वह फिर चुपचाप सुनने लगी।

 

डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
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