हूबनाथ की कविता – एक चोर का हलफ़नामा

कविता

एक चोर का हलफ़नामा

हूबनाथ

 

प्रभु के चरणों में

साष्टांग दंडवत!

 

प्रभु!

आपसे कुछ छिपा तो नहीं

फिर भी

मन हलका कर लेना

चाहता हूं

 

यह सच है कि

मैंने आपके यहां से

कुछ द्रव्य चुराया है

 

किंतु प्रभु!

क्या दुनिया में

कुछ ऐसा भी है

जो आपका न हो

 

जब सब कुछ

आप ही का है

तो धरती पर की गई

हर चोरी

आप ही के घर की गई

चोरी होगी न!

 

सर्वज्ञ प्रभु!

आपसे अधिक

कौन जानेगा

कि जहां स्वर्ण होता है

वहां रावण भी होता है

और मैं नहीं चाहता था

कि आपके घर

चरण पड़ें रावण के

इसलिए थोड़ा सा स्वर्ण

हटा दिया

 

आप ही कहो

कुछ बुरा किया !

 

एक बात

मेरी समझ में नहीं आती

कि तीनों लोक के स्वामी

के घर

ये तुच्छ सोने-चांदी

रुपए पैसे

हीरे जवाहरात

किसलिए प्रभु!

 

ये तथाकथित भक्त

आपको समझ क्या रहे हैं

जिसने अपना

भरा-पूरा राज्य

ठुकरा दिया हो

 

सोने की लंका

अपने भक्त को

दान कर दी हो

 

वह इस टुच्चे-से

स्वार्थप्रेरित दान (?) से

बिक जाएगा ?

 

प्रभु आपका यह अपमान

मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ

सो थोड़ा-सा धन

उड़ा दिया

 

और प्रभु

एक बात पूछना चाहता हूं

कि जिन लोगों ने भी

ये द्रव्य चढ़ाए

वे सभी

उनके खून-पसीने

ईमानदारी और

गाढ़ी कमाई के थे ?

 

यदि हां!

तो मैं उनकी भक्ति को

प्रणाम करता हूं

कि उन्होंने

किसी अस्पताल

विद्यालय

अनाथालय

वृद्धाश्रम

या आत्महत्या को विवश

किसानों की बजाय

अपनी मेहनत का धन

आपको दिया

क्योंकि आप

उन सबसे ज़्यादा

ज़रूरतमंद लगे

अपने प्रिय भक्तों को

उन्हें फिर से

प्रणाम!

 

करुणानिधान प्रभु!

आप जानते ही हैं

कि मैं कितना छोटा

और नगण्य चोर हूं

 

सारे बड़ों पर तो

आपकी कृपा अपरंपार है

 

मछुआरे भी तो

मझोंली मछलियां ही

जाल में पकड़ते हैं

 

शार्क और व्हेल

पकड़ने की औकात

किस मछुआरे में है

 

और आप

बड़ी मछलियों से

परिचित न हों

यह तो मैं

मान ही नहीं सकता

 

फिर भी

मैं अपनी चोरी

स्वीकार करता हूं

 

इस धरती पर

सिर्फ़ कमज़ोर और

छोटा चोर ही

अपने अपराध स्वीकारता है

 

बड़ों की पहुंच तो

बहुत ऊपर तक है

 

अब आपकी शरण में हूं

जो भी दंड देंगे

सिर माथे पर

 

पर प्रभु!

 

एक आखिरी शंका है

 

शार्क और व्हेल पर

आपकी दृष्टि

कब वक्र होगी ?

 

या आप भी

उनके आगे

हथियार डाल चुके हैं!

 

प्रणाम प्रभु!