जसवीर त्यागी की पांच कविताएं

जसवीर त्यागी की पांच कविताएं

1

अवज्ञा

 

शिमला माल रोड पर घूमते हुए

मैं थक कर

पत्थर की एक बैंच पर बैठ गया

कुछ समय बाद

एक सुंदर नव विवाहित युगल

आकर मेरी बगल विराज गया

जो शब्दों से कम

अपनी रंग-आभा से अधिक बोल रहा था

कुछ देर

मैं बैंच पर ही टिका रहा

युगल के आते ही

तुरंत उठ कर जाना

शायद यह प्रेम की अवज्ञा होता।

 

■

 

2

राजा की परछाई

 

कुछ ख़ास लोग

हर वक़्त

राजा के साथ होते हैं

राजा के राजत्व में

अडिग स्तंभ की तरह होते हैं वे

राजा के एक इशारे पर

अपना सर्वस्व लगा सकते हैं दाँव पर

राजा की परछाई बनकर

वे हर घड़ी साथ रहते हैं

राजा का गर्व-गौरव बनते हैं

ऐसे लोग

राजा इतना तो जानता होगा

कि प्रकाश में परछाई साथ चलती है

और अंधकार होने पर

साथ छोड़ देती है।

 

■

 

3

 प्रकाश को प्रणाम

 

बचपन में देखा

सांझ होने पर

जब कोई दीप जलाता

बड़े-बुजुर्ग हाथ जोड़कर

प्रणाम करते दीये को

हम बच्चे विस्मय से देखते सब

फिर जब घरों में बिजली आयी

दीपक की जगह जलने लगे बल्ब

तब भी बड़े-बुजुर्गों को

बल्ब की ओर प्रणाम करते देखा

बहुत बर्षों बाद

हम जब बालपन की बगिया से बाहर आये

तब जान पाये

बुजुर्ग किसी दीपक या बल्ब को नहीं

प्रकाश को प्रणाम करते थे।

 

■

 

4

राजा और प्रजा

 

राजा

किसी काल का हो

राजा होता है

राजा का वैभव-ऐश्वर्य

राजा का होता है

प्रजा का नहीं

प्रजा

किसी समय की हो

प्रजा होती है

प्रजा का दुःख-दर्द

प्रजा का होता है

राजा का नहीं।

 

■

 

5

संबंध

 

कैसी अजीब दुनिया

हमने अपने इर्द-गिर्द बना ली है

हम साहचर्य में कम

स्मृतियों में ज्यादा जीते हैं।

 

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One thought on “जसवीर त्यागी की पांच कविताएं”

  1. मुझे लगता है कि कविता के टेक्स्ट को इसी फॉन्ट में बोल्ड कर दिया जाए तो ज्यादा आकर्षक और पठनीय होगा?
    2. दूसरे,हर कविता के अंत में एक ब्लैक-वर्ग दिख रहा है। उसके और अंतिम लाइन के बीच का स्पेस घटकर सामान्य कर दिया जाए तो सुंदर लगेगा।

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