रत्ना भदौरिया की एक कविता

कभी आदेश बाहर से आता था, अब कई बार भीतर से उठता है। कभी कोई सत्ता हमारी सीमाएँ तय करती थी, अब अनेक बार हमारी इच्छाएँ, भय और पूर्वाग्रह स्वयं हमारे चारों ओर दीवारें खड़ी कर देते हैं।

रत्ना भदौरिया की एक कविता

 

एक बूँद ने

सड़क की नब्ज़ छू ली—

और शहर

घुटनों के बल बैठ गया

कंधों पर काँवरें थीं

हथेलियों में जल

आँखों में

एक सामूहिक उन्माद

दूर

लोहे का एक पक्षी

लगातार पंख फड़फड़ाता रहा—

उसकी आवाज़

भीड़ की जयकार में

धीरे-धीरे मरती रही

किसी शीशे के भीतर

बाईस वर्ष

अचानक अँधेरा हो गया

बाहर

हजारों हथेलियाँ

एक बोतल को

पवित्र किये जा रही थीं

सड़क पर

पानी बचा रहा

रास्ता नहीं

सायरन बजता रहा—

जैसे मृत्यु

मनुष्य होने की

आख़िरी भाषा बोल रही हो

और हम

अपने हाथों में देवत्व लिये

उस भाषा से

बहरे होकर

नाचते रहे

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