पर्वतीय हितों को समझना होगा

पर्यावरण

पर्वतीय हितों को समझना होगा

कुलभूषण उपमन्यु

हिमालय, गंगा-सिंध और उनकी सहायक नदियों का मायका, अपने गगनचुंबी पर्वत शिखरों पर आधे समुद्र को सिर पर उठाए जनहित में संलग्न तपस्वी, पर्वतीय ढलानों पर फैले घास के सुंदर चरागाह, अनेक जीव जंतुओं को आश्रय और भोजन प्रदान करने वाले विविधतापूर्ण वन क्षेत्र, सेब, अनार और अन्य फलों से लदी घाटियां, सुंदर आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित पर्यटक आवास व्यवस्थाएं, बेमौसम सब्जियों और और दुर्लभ जड़ी बूटियों के भंडार, सीधे सादे मिलनसार पर्वत वासी, कुछ ऐसा ही चित्र हिमालय को याद करने पर बनता है, जिसके दर्शन करने को मन सहज ही लालायित हो जाता है।

भरपूर गर्मी में शीतल मंद समीर मानो निमंत्रण संदेश दे रही हो कि मैदानी संघर्षों और थकन से राहत पाने और प्रकृति के सुंदर नजारों से अपने अस्तित्व को तरोताजा बनाने के लिए आईए। यह हिमालय का सहज प्रकट पक्ष है, किंतु एक दूसरा पक्ष भी है कि पर्वत दूर से ही सुंदर लगते हैं।

हालांकि, वे सुंदर तो पास से भी लगते हैं किंतु पर्वतीय जीवन की कठिनाइयों से दो चार भी होना पड़ता है। खास कर जब पर्वत की तासीर का अनुभव न हो। जैसे-जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में आवागमन की कठिनाइयों को सुगम बनाने की होड़ शुरू हुई है, तब से पर्यटकों की भीड़ लगने लगी है, जो लोग पर्यटक सेवा व्यवसाय में लगे हैं वे तो अच्छी कमाई करने के कारण प्रसन्न हो रहे हैं ।

किंतु अति पर्यटन एक समस्या भी बनने लग पड़ा है, जिससे एक ओर स्थानीय निवासियों को कई बार नागरिक सुविधाओं तक पंहुच में बाधा पैदा हो जाति है, तो कई बार कुछ गैर जिम्मेदार पर्यटकों के कारण कानून व्यवस्था की समस्या भी झेलनी पड़ जाति है।

किंतु सबसे ज्यादा समस्या गाड़ियों की भीड़ के धुंए से यहां की शुद्ध वायु को हानि पंहुचने से होती है जिसके कारण स्थानीय स्तर पर तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन में अप्रत्याशित बदलाव होने के हालात बनते जा रहे हैं। हिमालय में राष्ट्रीय औसत से ज्यादा तापमान वृद्धि दर्ज की जा रही है, जिसके चलते ग्लेशियर पिघलने की गति बढती जा रही है।

ग्लेशियर पिघलने से पहाड़ी घाटियों में टूट कर मलबा गिर कर ऐसी झीलें बनती जारही हैं, जो अचानक टूटकर अप्रत्याशित बाढ़ का कारण बन रही हैं। उत्तराखंड और हिमाचल ऐसी त्रासदियां पिछले तीन सालों से लगातार झेल चुके हैं। अब बरसात आने वाली है तो पहले ही डर लगना शुरू हो गया है।

अधिक भीड़ भाड़ के कारण सूखा और प्लास्टिक कचरा भी बड़ी समस्या बन गया है। हिमाचल प्रदेश में प्रतिदिन 342.35 टन नगर निकायों में सूखा कचरा पैदा होता है, जिसका वैज्ञानिक तौर पर निपटारा नहीं हो पाता। लगभग 60% कचरा लैंड फिल में जाता है, जिससे मीथेन पैदा होती है जो कार्बन डाईऑक्साइड से कई गुणा ज्यादा ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा करती है। यह कचरा खुले में जलाया भी जाता है जो जहरीली गैसें पैदा करता है और नदी नालों में जल प्रदूषण का कारण बनता है। मिट्टी में जाकर उपजाऊपन को हानि पंहुचाता है।

ढांचागत विकास की अन्य गतिविधियां भी पर्वतीय क्षेत्रों की नाजुकता को ध्यान में रख कर नहीं की जाती हैं। चौड़ी सडकें और उनको बनाने की अवैज्ञानिक तकनीक, बांधों के लिए नदियों का अत्यधिक दोहन, वनों का विनाश और वन भूमि का बड़ी परियोजनाओं के लिए लगातार भूमि उपयोग में बदलाव करके हस्तांतरण बादल फटने की घटनाओं में वृद्धि कर रहा है और उससे होने वाली तबाही को भी बढ़ा रहा है।

इस तरह हिमालय के विकास के लिए की जा रही गतिविधियां भी हिमालय के जनजीवन और आजीविका के लिए संकट भी पैदा कर रही हैं। वन्यजीवों और खेती में टकराव बढ़ता जा रहा है जिससे कई गांव खेती से तौबा करते जा रहे हैं। हिमालय क्षेत्र बड़ी दुविधाजनक स्थिति में फंसे हुए हैं, जिसमें एक ओर कुआं है और दूसरी ओर खाई है।

इसमें से उबरने का तरीका तो पर्वत विशिष्ट विकास के मॉडल विकसित करना जिसके लिए नवाचार और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाना जरूरी हो गया है। इसके लिए अतिरिक्त निर्माण धन की जरूरत होगी। किंतु दुर्भाग्य यह भी है कि हम व्यवस्था चलाने पर ही अपने बजट का 76% धन खर्च कर देते हैं।

इसलिए पर्वतीय हितों को समझना और उसके लिए वैकल्पिक मॉडल का विकास करने का साहस करना होगा, वरना पर्वतीय क्षेत्र हर साल मानव निर्मित प्राकृतिक आपदाओं का शिकार होते रहेंगे। हिमाचल के पिछले तीन साल से लंबित आपदा ग्रस्त लोगों के पुनर्वास का काम अभी तक भी लटका ही है।

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