नीलाभ अश्क की कविता – बस, मैं रह जाऊँ

जन्मदिन पर विशेष

कविता

बस, मैं रह जाऊँ

नीलाभ अश्क

 

भागे जा रहे हैं लोग

गठरियाँ उठाए, जेब में रखे पैसों,

परिचय-पत्रों और प्रतिभूतियों को सँभालते,

नाक की सीध में देखते,

अपने-अपने कम्प्यूटरों पर

लगाते हुए आने वाली दुनिया का हिसाब

अजीब हड़बड़ है

किसी को होश नहीं है दूसरे का

ज़रा-सी रुकावट पड़ते ही कुहनियों से

ठेला-ठाली शुरू हो जाती है

चिंता बस इतनी है कि पार हो जाएँ किसी तरह

बीसवीं सदी की वैतरणी जो पीछे छूट जाएँ

दहेज और दौलत और दमन की बलि-वेदी पर

तो उनका भाग्य

सुहृद सहयात्रियो,

क्या ऐसा नहीं हो सकता

चली जाए इक्कीसवीं सदी में सारी दुनिया

गाती-बजाती, शोर मचाती, एक-दूसरे पर गिरती-पड़ती

बस, मैं रह जाऊँ अपनी इस बेचारी, बेग़ैरत, बेरहम,

बीसवीं सदी में।

कविता संग्रह – कुल जमा -3 से साभार

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